सिंधु जल संधि: 80:20 के पुराने समीकरण से भारत की नई जल रणनीति तक
नई दिल्ली। भारत और पाकिस्तान के बीच छह दशक से अधिक समय से चली आ रही सिंधु जल संधि एक बार फिर दोनों देशों के बीच रणनीतिक तनाव के केंद्र में है। वर्ष 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई इस संधि ने सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों—सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज—के पानी के इस्तेमाल का ढांचा तय किया था।
संधि के तहत पूर्वी नदियों—रावी, ब्यास और सतलुज—के पानी पर भारत को व्यापक उपयोग-अधिकार दिया गया, जबकि पश्चिमी नदियों—सिंधु, झेलम और चिनाब—का अधिकांश पानी पाकिस्तान के लिए निर्धारित किया गया। भारत को पश्चिमी नदियों पर घरेलू, सीमित कृषि उपयोग तथा निर्धारित शर्तों के तहत रन-ऑफ-द-रिवर हाइड्रोपावर परियोजनाओं की अनुमति भी दी गई थी।
आखिर 80:20 का मतलब क्या है ?
आम तौर पर जिस 80:20 जल अनुपात का उल्लेख किया जाता है, वह संधि में लिखे किसी सीधे “80 प्रतिशत बनाम 20 प्रतिशत” नियम से नहीं, बल्कि नदियों के औसत प्रवाह से जुड़ा है।
भारत सरकार के अनुसार पूर्वी नदियों का औसत प्रवाह लगभग 33 मिलियन एकड़-फीट (MAF) और पश्चिमी नदियों का लगभग 135 MAF है। इस लिहाज से सिंधु नदी प्रणाली के कुल औसत प्रवाह का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा पश्चिमी नदियों में और लगभग 20 प्रतिशत पूर्वी नदियों में आता है।
यानी सरल भाषा में कहें तो संधि की व्यवस्था ने कम मात्रा वाले पूर्वी नदी समूह पर भारत का व्यापक अधिकार और बड़े पश्चिमी नदी समूह पर पाकिस्तान का प्रमुख अधिकार निर्धारित किया।
क्या भारत पश्चिमी नदियों का पानी बिल्कुल इस्तेमाल नहीं कर सकता ?
ऐसा कहना सही नहीं होगा।
संधि भारत को पश्चिमी नदियों पर कुछ सीमित उपयोग की अनुमति देती है। इनमें घरेलू उपयोग, गैर-उपभोगात्मक उपयोग, निर्धारित कृषि उपयोग और संधि की तकनीकी शर्तों के अनुरूप रन-ऑफ-द-रिवर हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर शामिल हैं। संधि में कुछ सीमित भंडारण की व्यवस्था भी निर्धारित है।
यही वजह है कि जलविद्युत परियोजनाओं और उनके डिजाइन को लेकर भारत-पाकिस्तान के बीच लंबे समय से विवाद रहे हैं।
2025 के बाद क्यों बदला पूरा समीकरण ?
22 अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत सरकार ने कई कदम उठाए। इनमें सिंधु जल संधि को तत्काल प्रभाव से ‘abeyance’ में रखने का निर्णय भी शामिल था। भारत ने इसे पाकिस्तान द्वारा सीमा-पार आतंकवाद के समर्थन को समाप्त करने की शर्त से जोड़ा।
यहाँ एक महत्वपूर्ण शब्द है—“abeyance” यानी स्थगन/निलंबित स्थिति। इसे सीधे “संधि समाप्त हो गई” कहना तकनीकी रूप से अधिक सरल और भ्रामक होगा। भारत का आधिकारिक रुख इसे abeyance में रखने का रहा है।
अब फोकस सिर्फ संधि नहीं, जल-संसाधनों के बेहतर उपयोग पर भी
2026 में भारत की ओर से रावी बेसिन में लंबे समय से अटकी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने पर जोर दिखाई दिया है।
केंद्र सरकार के अनुसार शाहपुरकंडी परियोजना, जिसे 2019 में पुनर्जीवित किया गया था, लगभग पूरी हो चुकी है। वहीं उझ बहुउद्देशीय परियोजना को 2026 में पुनर्जीवित किया गया। सरकार के मुताबिक उझ परियोजना लगभग 186–212 मेगावाट बिजली उत्पादन और करीब 90,000 हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा देने में मदद कर सकती है।
इसका अर्थ यह है कि भारत की रणनीति केवल पाकिस्तान को पानी रोकने की घोषणा तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने हिस्से के पानी का अधिकतम और प्रभावी उपयोग करने के लिए बुनियादी ढांचे का विकास भी उसका महत्वपूर्ण हिस्सा बन रहा है।
पाकिस्तान की चिंता क्यों बढ़ी ?
पाकिस्तान की कृषि और जल व्यवस्था सिंधु नदी प्रणाली पर अत्यधिक निर्भर है। भारत सरकार के एक दस्तावेज के अनुसार सिंधु नदी प्रणाली पाकिस्तान की लगभग 16 मिलियन हेक्टेयर कृषि भूमि के 80 प्रतिशत हिस्से और उसके कुल जल उपयोग के करीब 93 प्रतिशत से जुड़ी है।
यही निर्भरता सिंधु जल विवाद को केवल नदी-पानी के बंटवारे का मामला नहीं रहने देती। यह कृषि, खाद्य सुरक्षा, बिजली, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा विषय बन जाता है।
पाकिस्तान लगातार संधि को लागू रखने की मांग करता रहा है और भारत के रुख को चुनौती देता रहा है। दूसरी ओर भारत का कहना है कि सीमा-पार आतंकवाद और सामान्य जल-सहयोग को एक साथ जारी नहीं रखा जा सकता। 2026 में दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर कूटनीतिक और कानूनी टकराव भी जारी रहा।
निष्कर्ष
सिंधु जल विवाद को केवल इस सवाल से नहीं समझा जा सकता कि “किस देश को कितना पानी मिला ?”
असल कहानी तीन स्तरों की है—
पहला, 1960 की संधि ने नदी प्रणाली को पूर्वी और पश्चिमी नदियों के आधार पर बांटा।
दूसरा, भारत को पश्चिमी नदियों पर कुछ सीमित लेकिन महत्वपूर्ण उपयोग-अधिकार दिए गए।
तीसरा, 2025 के बाद भारत ने संधि को abeyance में रखते हुए अपने जल-संसाधनों के उपयोग और लंबित परियोजनाओं पर अधिक रणनीतिक जोर देना शुरू किया है।
इसलिए इसे केवल “पानी रोकने की नीति” कहना अधूरा होगा। इसे भारत की जल-सुरक्षा, जल-प्रबंधन और रणनीतिक संसाधन नीति में बदलाव के रूप में देखना अधिक सटीक है।
— हिंदी विंडो न्यूज़ डेस्क
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