लालकृष्ण आडवाणी के 99वें जन्मदिन पर पीएम नरेंद्र मोदी ने उनके राजनीतिक सफर, भाजपा के निर्माण, अटल बिहारी वाजपेयी के साथ सहयोग और देश में योगदान को याद किया।
नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता, पूर्व उपप्रधानमंत्री और भारत रत्न से सम्मानित लालकृष्ण आडवाणी 8 नवंबर 2026 को 99 वर्ष के हो गए। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके जीवन, राजनीतिक यात्रा और देश की राजनीति में उनके योगदान को याद करते हुए एक लेख लिखा। प्रधानमंत्री ने आडवाणी के जीवन के विभिन्न पड़ावों का उल्लेख करते हुए जनसंघ को मजबूत बनाने, भारतीय जनता पार्टी के निर्माण और संगठन के विस्तार में उनकी भूमिका को रेखांकित किया।
प्रधानमंत्री के अनुसार, आडवाणी का जीवन विभाजन की त्रासदी से लेकर राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाने तक कई ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ा रहा है। उनके राजनीतिक सफर में संगठन निर्माण, संसदीय कार्य, अटल बिहारी वाजपेयी के साथ लंबे समय तक सहयोग और केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर काम करना शामिल है।
विभाजन की त्रासदी से नई शुरुआत तक का सफर
लालकृष्ण आडवाणी का जन्म 8 नवंबर 1927 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के सिंध क्षेत्र के कराची में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। वर्ष 1947 में देश के विभाजन के दौरान उन्हें अपना घर और परिचित परिवेश छोड़ना पड़ा। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने लेख में इस अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि आडवाणी ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद नए सिरे से जीवन और सार्वजनिक कार्य की शुरुआत की।
विभाजन के बाद भारत आए अनेक लोगों की तरह आडवाणी के जीवन में भी यह घटना एक निर्णायक मोड़ बनी। प्रधानमंत्री ने उनके जीवन को इस बात के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया कि कठिन परिस्थितियों के बाद भी संगठन और सार्वजनिक जीवन में लंबे समय तक योगदान दिया जा सकता है।
जनसंघ से भाजपा के निर्माण तक
आडवाणी भारतीय जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख संगठनात्मक नेताओं में रहे। भाजपा की स्थापना 1980 में हुई थी। पार्टी के विस्तार, कार्यकर्ताओं को संगठित करने और उसकी राजनीतिक पहचान बनाने में आडवाणी की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने लेख में उनके संगठनात्मक कौशल, वैचारिक स्पष्टता और कार्यकर्ताओं की कई पीढ़ियों को तैयार करने की क्षमता की सराहना की। उनके अनुसार, आडवाणी ने पार्टी के संगठनात्मक आधार को मजबूत करने में लंबा समय लगाया।
1980 और 1990 के दशक में भाजपा के राजनीतिक विस्तार के दौरान आडवाणी पार्टी के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे। वर्ष 1989 के लोकसभा चुनाव के बाद राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा बदलाव दिखाई दिया और 1990 के दशक में भाजपा की संसदीय स्थिति मजबूत हुई। हालांकि, इन बदलावों को केवल किसी एक नेता के योगदान के रूप में देखना राजनीतिक इतिहास की जटिलता को सरल बना देना होगा।
अटल बिहारी वाजपेयी के साथ लंबा राजनीतिक सहयोग
आडवाणी और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जोड़ी भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित राजनीतिक सहयोगों में गिनी जाती है। दोनों ने कई दशकों तक एक साथ काम किया और भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने लेख में दोनों नेताओं के बीच विश्वास, सम्मान और सहयोग को विशेष रूप से रेखांकित किया। उनके मुताबिक, लंबे राजनीतिक जीवन में दोनों नेताओं का एक-दूसरे के साथ बने रहना भारतीय राजनीति में सहयोग की एक उल्लेखनीय मिसाल है।
वाजपेयी ने जहां गठबंधन राजनीति और संवाद के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई, वहीं आडवाणी को पार्टी संगठन के विस्तार, चुनावी रणनीति और वैचारिक राजनीति के प्रमुख नेताओं में गिना जाता है। दोनों की भूमिकाएं अलग-अलग होने के बावजूद उनके राजनीतिक सहयोग ने भाजपा के विकास को प्रभावित किया।
राम रथ यात्रा और राष्ट्रीय राजनीति
आडवाणी के राजनीतिक जीवन का एक प्रमुख अध्याय 1990 की सोमनाथ से अयोध्या तक की राम रथ यात्रा रही। इस यात्रा ने राम जन्मभूमि आंदोलन को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके साथ ही देश में धार्मिक पहचान, धर्मनिरपेक्षता, राजनीतिक लामबंदी और सामाजिक संबंधों पर व्यापक बहस भी तेज हुई।
इस दौर का मूल्यांकन करते समय इसके राजनीतिक प्रभाव के साथ-साथ इससे जुड़े सामाजिक और संवैधानिक प्रश्नों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। आडवाणी की भूमिका को भाजपा के विस्तार और राम जन्मभूमि आंदोलन के संदर्भ में समझा जाता है, जबकि इस आंदोलन के प्रभावों को लेकर भारतीय समाज और राजनीति में विभिन्न मत रहे हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने लेख में आडवाणी की इस राजनीतिक यात्रा को उनके सार्वजनिक जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों में शामिल किया।
गृह मंत्री और उपप्रधानमंत्री के रूप में भूमिका
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार में आडवाणी ने महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। वे 1999 से 2004 तक केंद्रीय गृह मंत्री रहे और 2002 से 2004 तक उपप्रधानमंत्री के पद पर भी रहे।
गृह मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल देश की आंतरिक सुरक्षा और राष्ट्रीय राजनीति के महत्वपूर्ण दौर से जुड़ा था। इन जिम्मेदारियों के अतिरिक्त उन्होंने लंबे समय तक संसद में भी सक्रिय भूमिका निभाई। वे लोकसभा और राज्यसभा, दोनों सदनों के सदस्य रहे और विपक्ष के नेता के रूप में भी कार्य किया।
भारत रत्न से सम्मानित
लालकृष्ण आडवाणी को वर्ष 2024 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। यह भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। यह सम्मान उनके लंबे सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन के संदर्भ में दिया गया।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने लेख में आडवाणी के राजनीतिक योगदान के अलावा उनकी पढ़ने की रुचि, लेखन, संस्कृति और सिनेमा के प्रति लगाव का भी उल्लेख किया। इससे उनके सार्वजनिक व्यक्तित्व के उन पहलुओं पर ध्यान जाता है जो चुनावी राजनीति से परे हैं।
भारतीय राजनीति में आडवाणी की विरासत
आडवाणी का राजनीतिक जीवन भारतीय लोकतंत्र के कई महत्वपूर्ण दौरों से जुड़ा रहा है—विभाजन के बाद का भारत, जनसंघ का विकास, भाजपा का गठन और विस्तार, राम जन्मभूमि आंदोलन तथा केंद्र में गठबंधन सरकारों का दौर।
उनके समर्थक उन्हें भाजपा के संगठनात्मक विस्तार और राष्ट्रीय राजनीति में पार्टी की भूमिका बढ़ाने वाले नेताओं में गिनते हैं। दूसरी ओर, उनके राजनीतिक सफर से जुड़े कुछ आंदोलनों और विचारधारात्मक मुद्दों पर आलोचनात्मक बहस भी भारतीय राजनीति का हिस्सा रही है। किसी भी ऐतिहासिक नेता का संतुलित मूल्यांकन करते समय उपलब्ध तथ्यों, राजनीतिक योगदान और विवादित पहलुओं को अलग-अलग समझना जरूरी है।
प्रधानमंत्री मोदी का लेख आडवाणी के जीवन और योगदान पर एक प्रशंसात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। हिंदी विंडो के पाठकों के लिए इस अवसर का महत्व केवल जन्मदिन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय राजनीति के उन अध्यायों को समझने का अवसर भी है जिन्होंने देश की राजनीतिक दिशा को प्रभावित किया।
स्रोत: DD News, प्रधानमंत्री कार्यालय की सूचना (PIB), भाजपा की आधिकारिक जीवनी और राज्यसभा के जीवनी संबंधी अभिलेख।












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