राजतरंगिणी, महाभारत और अर्थशास्त्र को UNESCO के एशिया-प्रशांत Memory of the World क्षेत्रीय रजिस्टर में शामिल किए जाने की रिपोर्ट। जानिए तीनों प्राचीन कृतियों का ऐतिहासिक महत्व।
कश्मीर के इतिहास से लेकर महाभारत के नैतिक विमर्श और प्राचीन भारत की शासन-व्यवस्था तक—तीन अलग-अलग ज्ञान परंपराओं को मिली नई अंतरराष्ट्रीय दृश्यता
नई दिल्ली, 6 नवंबर 2026 | हिंदी विंडो डेस्क
भारत की ऐतिहासिक, साहित्यिक और बौद्धिक विरासत से जुड़ी तीन महत्वपूर्ण कृतियों—कल्हण की राजतरंगिणी, महाभारत और कौटिल्य के नाम से संबद्ध अर्थशास्त्र—को UNESCO के एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय ‘Memory of the World Register’ में शामिल किए जाने की खबर सामने आई है। द टाइम्स ऑफ इंडिया की 5 नवंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, इस संबंध में निर्णय इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में आयोजित Memory of the World Committee for Asia and the Pacific (MOWCAP) के 11वें सत्र में लिया गया।
इस उपलब्धि का महत्व केवल तीन प्राचीन ग्रंथों को मिली पहचान तक सीमित नहीं है। ये कृतियाँ इतिहास-लेखन, दर्शन, नैतिक प्रश्नों, राजनीति, प्रशासन और राज्य-व्यवस्था जैसे अलग-अलग विषयों में भारतीय ज्ञान परंपरा की विविधता को सामने रखती हैं। हालांकि, इस मान्यता को UNESCO के अंतरराष्ट्रीय रजिस्टर में प्रविष्टि के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा। उपलब्ध रिपोर्ट इसे एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय रजिस्टर से जोड़ती है।
क्या है UNESCO का Memory of the World कार्यक्रम ?
UNESCO का Memory of the World Programme वर्ष 1992 में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य महत्वपूर्ण दस्तावेजी विरासत का संरक्षण करना, उसे व्यापक रूप से उपलब्ध कराना और उसके ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।
दस्तावेजी विरासत में केवल पुस्तकें ही नहीं, बल्कि पांडुलिपियाँ, ऐतिहासिक अभिलेख, तस्वीरें, फिल्में, ध्वनि रिकॉर्डिंग और अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज भी शामिल हो सकते हैं। ऐसी सामग्री अतीत के समाजों, उनके विचारों, संस्थाओं और सांस्कृतिक विकास को समझने में मदद करती है।
इस कार्यक्रम के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर अलग-अलग रजिस्टर संचालित होते हैं। एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय रजिस्टर का उद्देश्य इस क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेजी विरासत की पहचान, संरक्षण और उपलब्धता को बढ़ावा देना है। इसलिए क्षेत्रीय मान्यता का अर्थ यह नहीं है कि किसी दस्तावेज को UNESCO की विश्व धरोहर स्थलों वाली सूची में शामिल कर लिया गया है। न ही इसे अपने-आप अंतरराष्ट्रीय Memory of the World Register में प्रवेश माना जाना चाहिए।
1. राजतरंगिणी: कश्मीर के अतीत का ऐतिहासिक वृत्तांत
राजतरंगिणी संस्कृत में रचित एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कृति है, जिसके लेखक कल्हण माने जाते हैं। इसका संबंध 12वीं शताब्दी से है और इसमें कश्मीर के शासकों, राजनीतिक घटनाक्रमों तथा सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का विवरण मिलता है।
भारतीय इतिहास-लेखन की चर्चा में राजतरंगिणी का विशेष स्थान है, क्योंकि इसमें राजाओं और उनके शासन से संबंधित घटनाओं को क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया। इसमें पूर्ववर्ती परंपराओं, कथाओं, उपलब्ध विवरणों और लेखक की आलोचनात्मक दृष्टि का मेल दिखाई देता है।
हालांकि, इस ग्रंथ को आधुनिक अर्थों में पूरी तरह दस्तावेजी प्रमाणों पर आधारित इतिहास की पुस्तक मान लेना उचित नहीं होगा। इसके अलग-अलग विवरणों का अध्ययन अन्य ऐतिहासिक स्रोतों, पुरातात्त्विक साक्ष्यों और आधुनिक शोध के साथ मिलाकर किया जाता है।
राजतरंगिणी का महत्व इस बात में भी है कि यह कश्मीर के अतीत को समझने के लिए एक प्रमुख साहित्यिक और ऐतिहासिक स्रोत उपलब्ध कराती है। इसके अध्ययन से क्षेत्र की राजनीतिक परंपराओं, राजसत्ता, सामाजिक संबंधों और सांस्कृतिक स्मृतियों के बारे में जानकारी मिलती है।
2. महाभारत: धर्म, कर्तव्य और सत्ता के प्रश्न
महाभारत भारतीय सभ्यता के सबसे महत्वपूर्ण महाकाव्यों में से एक है। इसकी कथा कुरु वंश, पांडवों और कौरवों के संघर्ष के इर्द-गिर्द विकसित होती है, लेकिन इसका दायरा युद्ध और राजवंशीय विवाद से कहीं आगे जाता है।
इसमें धर्म, कर्तव्य, न्याय, सत्ता, रिश्तों, नैतिक दुविधाओं और मनुष्य के निर्णयों से जुड़े अनेक प्रश्न उठाए गए हैं। भगवद्गीता सहित महाभारत के विभिन्न अंशों ने भारतीय दार्शनिक, धार्मिक और साहित्यिक परंपराओं पर गहरा प्रभाव डाला है।
महाभारत को केवल एक धार्मिक ग्रंथ या केवल एक ऐतिहासिक विवरण के रूप में सीमित करना इसके बहुआयामी स्वरूप को कम कर देगा। यह एक विकसित होती साहित्यिक परंपरा का हिस्सा है, जिसमें कथा, दर्शन, नीति और सामाजिक विचारों की अनेक परतें मौजूद हैं।
दक्षिण एशिया के विभिन्न समाजों में इसकी कथाओं के अनेक भाषाई और सांस्कृतिक रूप विकसित हुए हैं। इसके पात्रों और प्रसंगों ने साहित्य, नाटक, लोककला, चित्रकला और आधुनिक दृश्य माध्यमों को भी प्रभावित किया है।
इसकी क्षेत्रीय रजिस्टर में कथित प्रविष्टि का महत्व इस विरासत के दस्तावेजी संरक्षण और अध्ययन को बढ़ावा देने के संदर्भ में समझा जाना चाहिए।
3. अर्थशास्त्र: शासन, कूटनीति और प्रशासन की परंपरा
कौटिल्य के नाम से संबद्ध अर्थशास्त्र प्राचीन भारतीय राजनीतिक और प्रशासनिक चिंतन की एक महत्वपूर्ण कृति है। इसमें राज्य के संचालन, प्रशासन, राजस्व, आर्थिक गतिविधियों, कूटनीति, सुरक्षा और राजनीतिक रणनीति जैसे विषयों पर विचार मिलता है।
यह ग्रंथ शासन को केवल राजा के अधिकारों तक सीमित नहीं रखता, बल्कि राज्य की संस्थाओं, संसाधनों के प्रबंधन, अधिकारियों की भूमिका और बाहरी संबंधों जैसे विषयों पर भी चर्चा करता है।
आधुनिक पाठकों के लिए अर्थशास्त्र का अध्ययन इस दृष्टि से उपयोगी है कि इससे प्राचीन भारत में राज्य और प्रशासन के बारे में विकसित विचारों की जानकारी मिलती है। लेकिन इसे आधुनिक लोकतांत्रिक शासन, अर्थशास्त्र या विदेश नीति का सीधा विकल्प मानना ऐतिहासिक संदर्भों की उपेक्षा होगी।
इसके विचारों को उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों, सामाजिक संरचना और ज्ञान परंपराओं के संदर्भ में समझना आवश्यक है। साथ ही, ग्रंथ के लेखकत्व, रचना-काल और पाठ के विकास से संबंधित विद्वत् चर्चाओं को भी ध्यान में रखना चाहिए।

राजतरंगिणी, महाभारत और अर्थशास्त्र को UNESCO की क्षेत्रीय मान्यता
2024 में भी भारतीय कृतियों को मिली थी क्षेत्रीय पहचान
UNESCO के आधिकारिक विवरण के अनुसार, वर्ष 2024 में भारत की तीन साहित्यिक कृतियों—रामचरितमानस, पंचतंत्र और सहृदयालोक-लोचन—को Memory of the World Committee for Asia and the Pacific के क्षेत्रीय रजिस्टर में शामिल किया गया था।
UNESCO ने 22 मई 2024 को प्रकाशित अपने विवरण में इन कृतियों की प्रविष्टि की पुष्टि की थी। इस संदर्भ में 2026 की रिपोर्ट में उल्लिखित तीन नई कृतियाँ भारत की दस्तावेजी और साहित्यिक विरासत पर ध्यान आकर्षित करने वाली एक और महत्वपूर्ण खबर हैं।
हालांकि, 2024 और 2026 की प्रविष्टियों की संख्या, रजिस्टर में भारत की कुल प्रविष्टियों और संबंधित पांडुलिपियों की स्थिति को अंतिम रूप से प्रकाशित करने से पहले संबंधित आधिकारिक सूची से मिलाना आवश्यक है। किसी कृति का नाम रजिस्टर में दर्ज होने और उसके किसी विशेष प्राचीन हस्तलिखित संस्करण के दर्ज होने के बीच अंतर भी हो सकता है।
संरक्षण और डिजिटलीकरण क्यों महत्वपूर्ण हैं ?
ऐतिहासिक ग्रंथों का महत्व तभी व्यापक समाज तक पहुँच सकता है, जब उनका संरक्षण, वैज्ञानिक सूचीकरण, प्रामाणिक पाठ-निर्धारण और अध्ययन लगातार जारी रहे। पांडुलिपियों की स्थिति, उनकी सामग्री, लिपि, भाषा, रचना-काल और उपलब्ध प्रतियों का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण है।
डिजिटलीकरण से दुर्लभ दस्तावेजों की प्रतियों को अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद मिल सकती है। लेकिन डिजिटल प्रतियाँ मूल पांडुलिपियों के भौतिक संरक्षण का विकल्प नहीं हैं। उनके लिए उचित तापमान, नमी नियंत्रण, प्रशिक्षित संरक्षण विशेषज्ञों और दीर्घकालीन अभिलेखीय प्रबंधन की आवश्यकता बनी रहती है।
द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में ज्ञान भारतम् मिशन का भी उल्लेख है, जिसका उद्देश्य भारत की पांडुलिपि विरासत की पहचान, संरक्षण और डिजिटलीकरण को बढ़ावा देना है। इस पहल के कार्यान्वयन, उपलब्धियों और संरक्षित पांडुलिपियों की संख्या के बारे में ठोस आंकड़े प्रकाशित करते समय संबंधित सरकारी स्रोतों से पुष्टि आवश्यक होगी।
निष्कर्ष: पहचान के साथ संरक्षण की जिम्मेदारी
राजतरंगिणी, महाभारत और अर्थशास्त्र तीन अलग-अलग विषयों के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा की व्यापकता को सामने रखते हैं। एक कृति कश्मीर के ऐतिहासिक वृत्तांत से जुड़ी है, दूसरी नैतिक और दार्शनिक प्रश्नों की विस्तृत परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि तीसरी शासन और राज्य-व्यवस्था के विचारों से संबंधित है।
यदि इनकी क्षेत्रीय रजिस्टर में प्रविष्टि की रिपोर्ट की आधिकारिक पुष्टि होती है, तो इससे इन कृतियों के दस्तावेजी महत्व, संरक्षण और अध्ययन की दिशा में नई दृश्यता मिल सकती है। लेकिन किसी सूची में नाम दर्ज होना अपने-आप संरक्षण की सभी समस्याओं का समाधान नहीं है। इसके लिए संस्थागत सहयोग, शोध, सार्वजनिक पहुँच और पांडुलिपियों की दीर्घकालीन सुरक्षा आवश्यक है।
भारत की विरासत को वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत करने का सबसे विश्वसनीय तरीका उत्सव के साथ-साथ प्रमाण, ऐतिहासिक संदर्भ और आलोचनात्मक अध्ययन को महत्व देना है। यही दृष्टिकोण प्राचीन ग्रंथों को वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवंत ज्ञान-स्रोत बनाए रख सकता है।
स्रोत: The Times of India, 5 नवंबर 2026; UNESCO का Memory of the World Programme संबंधी आधिकारिक विवरण; UNESCO की 22 मई 2024 की क्षेत्रीय रजिस्टर घोषणा।
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