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युद्ध की भेंट चढ़ता पर्यावरण: जंगलों से जलस्रोतों तक तबाही, दुनिया के सामने दीर्घकालिक संकट

युद्ध में पर्यावरण की तबाही

दूषित नदियां, बर्बाद जंगल, जहरीली मिट्टी और खाद्य सुरक्षा पर खतरा—युद्ध के पर्यावरणीय प्रभावों से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग क्यों जरूरी है ?

नई दिल्ली। युद्ध की कीमत केवल सैनिकों और नागरिकों की जान, उजड़े शहरों तथा विस्थापित परिवारों तक सीमित नहीं रहती। इसका एक गंभीर, लेकिन अक्सर कम चर्चा में रहने वाला परिणाम पर्यावरणीय विनाश भी है। बमबारी, आगजनी, औद्योगिक प्रतिष्ठानों पर हमलों और सैन्य गतिविधियों के कारण जंगल, नदियां, कृषि भूमि तथा वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास प्रभावित हो सकते हैं। इसका असर युद्ध समाप्त होने के बाद भी वर्षों तक बना रह सकता है।

इसी गंभीर विषय पर दुनिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए हर साल 6 नवंबर को युद्ध और सशस्त्र संघर्ष में पर्यावरण के शोषण को रोकने का अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 5 नवंबर 2001 को प्रस्ताव A/RES/56/4 के माध्यम से इस दिवस की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य सशस्त्र संघर्षों के दौरान पर्यावरण को होने वाली क्षति और उसके मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।

युद्ध के दौरान प्रकृति कैसे बनती है निशाना ?

सशस्त्र संघर्षों में पर्यावरण को नुकसान कई तरीकों से पहुंच सकता है। बमबारी और विस्फोटों से जंगलों में आग लग सकती है, वनस्पति नष्ट हो सकती है और मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत प्रभावित हो सकती है। सैन्य वाहनों की आवाजाही जमीन को नुकसान पहुंचा सकती है, जबकि तेल भंडारों, रासायनिक इकाइयों और औद्योगिक संयंत्रों पर हमलों से खतरनाक पदार्थ पर्यावरण में फैलने का जोखिम पैदा होता है।

ऐसी घटनाओं का प्रभाव केवल हमले वाले स्थान तक सीमित रहना जरूरी नहीं है। प्रदूषक हवा और पानी के माध्यम से दूसरे क्षेत्रों तक पहुंच सकते हैं। हालांकि, किसी खास घटना में नुकसान कितनी दूर तक फैला और कितने समय तक रहा, इसका निर्धारण वैज्ञानिक जांच और स्थानीय परिस्थितियों के आकलन से ही किया जाना चाहिए।

दूषित पानी और मिट्टी से बढ़ता स्वास्थ्य संकट

युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में पेयजल व्यवस्था को नुकसान पहुंचना गंभीर मानवीय संकट पैदा कर सकता है। जल शोधन संयंत्रों, पाइपलाइनों, पंपिंग स्टेशनों और बिजली आपूर्ति में व्यवधान से लोगों को सुरक्षित पानी मिलना मुश्किल हो सकता है।

यदि तेल, औद्योगिक रसायन या अन्य खतरनाक पदार्थ नदियों, झीलों अथवा भूजल में पहुंच जाएं, तो पानी की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। ऐसे पानी का उपयोग पीने, सिंचाई और पशुपालन के लिए करने से अतिरिक्त जोखिम पैदा हो सकता है। वास्तविक स्वास्थ्य प्रभाव इस बात पर निर्भर करते हैं कि कौन-सा प्रदूषक मौजूद है, उसकी मात्रा कितनी है और लोग कितने समय तक उसके संपर्क में रहते हैं।

मिट्टी भी युद्ध का लंबे समय तक असर झेल सकती है। विस्फोटों के अवशेष, धातुएं, ईंधन और अन्य प्रदूषक कृषि भूमि की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए युद्ध समाप्त होने के बाद केवल बुनियादी ढांचे का पुनर्निर्माण पर्याप्त नहीं है; प्रभावित जमीन और जलस्रोतों की वैज्ञानिक जांच भी जरूरी है।

जंगल, वन्यजीव और जैव विविधता पर प्रभाव

जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं हैं। वे कार्बन को अवशोषित करने, मिट्टी के कटाव को रोकने, जलचक्र को सहारा देने और वन्यजीवों को आवास उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाते हैं। संघर्ष के दौरान जंगलों का नष्ट होना या उनका खंडित हो जाना अनेक प्रजातियों के भोजन, प्रजनन और प्रवास को प्रभावित कर सकता है।

वन्यजीवों के सामने खतरा केवल विस्फोटों या आग से नहीं होता। शोर, मानवीय गतिविधियों में अचानक बदलाव, अवैध शिकार और प्राकृतिक आवास का नुकसान भी उनकी आबादी पर दबाव डाल सकते हैं। यदि किसी क्षेत्र का पारिस्थितिकी तंत्र गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो जाए, तो उसकी बहाली के लिए लंबे समय तक संरक्षण और निगरानी की जरूरत पड़ सकती है।

प्राकृतिक संसाधनों पर संघर्ष का संबंध

युद्ध और पर्यावरण का रिश्ता केवल संघर्ष के दौरान होने वाले नुकसान तक सीमित नहीं है। कई बार प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण, उनका दोहन और उनके लाभों का असमान वितरण भी संघर्षों को बढ़ावा देने वाले कारकों में शामिल होते हैं।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, पिछले छह दशकों में हुए आंतरिक संघर्षों में कम-से-कम 40 प्रतिशत का संबंध प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से रहा है। इनमें तेल, गैस, खनिज, लकड़ी और हीरे जैसे मूल्यवान संसाधनों के साथ पानी तथा उपजाऊ भूमि जैसे आवश्यक संसाधन भी शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र यह भी बताता है कि प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े संघर्षों में शांति समझौते के बाद फिर से हिंसा भड़कने की आशंका अधिक हो सकती है।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। यह आंकड़ा सभी युद्धों में पर्यावरणीय क्षति का प्रतिशत नहीं है। यह प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से जुड़े आंतरिक संघर्षों के बारे में है। इसलिए इसे इस दावे के रूप में पेश करना गलत होगा कि दुनिया के 40 प्रतिशत युद्ध पर्यावरणीय विनाश के कारण हुए हैं।

The River on the Brink of Collapse by Borja Abargues | World Photography Organisation

युद्ध खत्म होने के बाद भी बना रहता है खतरा

युद्धविराम या शांति समझौता होने से पर्यावरणीय संकट तुरंत समाप्त नहीं हो जाता। बारूदी सुरंगें और बिना फटे गोला-बारूद नागरिकों, किसानों, राहतकर्मियों और वैज्ञानिकों के लिए खतरा बने रह सकते हैं। इससे खेती, पुनर्वास और प्रभावित क्षेत्रों में पर्यावरणीय सर्वेक्षण का काम बाधित हो सकता है।

इसी तरह प्रदूषित मिट्टी और पानी की सफाई, जंगलों का पुनर्विकास तथा वन्यजीवों के आवासों की बहाली के लिए पर्याप्त संसाधन, विशेषज्ञता और समय चाहिए। युद्ध से प्रभावित समुदायों के लिए यह चुनौती आजीविका की बहाली से भी जुड़ी होती है। किसान तभी सुरक्षित रूप से खेती शुरू कर सकते हैं, जब भूमि की स्थिति और विस्फोटक अवशेषों से जुड़े जोखिमों का आकलन हो जाए।

पर्यावरण संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून

सशस्त्र संघर्ष के दौरान पर्यावरण की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून में महत्वपूर्ण प्रावधान मौजूद हैं। 1977 के जिनेवा कन्वेंशन के अतिरिक्त प्रोटोकॉल-I के अनुच्छेद 35(3) और 55 प्राकृतिक पर्यावरण को व्यापक, दीर्घकालिक और गंभीर क्षति पहुंचाने वाले युद्ध के तरीकों पर प्रतिबंध से संबंधित हैं। इन प्रावधानों का दायरा और लागू होने की शर्तें संबंधित कानूनी संदर्भ में समझी जानी चाहिए।

इसके अतिरिक्त, 1976 में अपनाया गया ENMOD कन्वेंशन पर्यावरणीय बदलाव की तकनीकों के सैन्य या अन्य शत्रुतापूर्ण उपयोग को प्रतिबंधित करता है, जब संधि में निर्धारित शर्तें पूरी होती हैं। अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय की रोम संविधि में भी कुछ विशेष परिस्थितियों में पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुंचाने वाले हमलों को युद्ध अपराध माना जा सकता है। हालांकि, हर पर्यावरणीय नुकसान अपने आप युद्ध अपराध नहीं बन जाता। इसके लिए लागू कानून के विशिष्ट तत्वों और परिस्थितियों का परीक्षण आवश्यक है।

शांति और पुनर्निर्माण में पर्यावरण को मिले प्राथमिकता

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं पर्यावरण संरक्षण को संघर्ष की रोकथाम, शांति निर्माण और युद्ध के बाद पुनर्वास से जोड़ने पर जोर देती हैं। इस दृष्टिकोण के अनुसार, प्राकृतिक संसाधनों का न्यायपूर्ण प्रबंधन, जलस्रोतों की सुरक्षा और स्थानीय समुदायों की भागीदारी दीर्घकालिक स्थिरता में योगदान दे सकती है।

युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्निर्माण की योजनाओं के अंतर्गत मिट्टी और पानी की जांच, विस्फोटक अवशेषों को सुरक्षित तरीके से हटाना, जंगलों की बहाली और जैव विविधता का संरक्षण शामिल होना चाहिए। महिलाओं, बच्चों, किसानों और विस्थापित परिवारों की जरूरतों को ध्यान में रखना भी आवश्यक है, क्योंकि सुरक्षित पानी, भोजन और आजीविका की उपलब्धता सीधे पर्यावरणीय परिस्थितियों से जुड़ी है।

निष्कर्षतः, युद्ध की तबाही का आकलन केवल नष्ट इमारतों, विस्थापित लोगों या तत्काल आर्थिक नुकसान से नहीं किया जा सकता। जंगलों, नदियों, मिट्टी और जैव विविधता को हुई क्षति भी मानवीय संकट का हिस्सा है। स्थायी शांति के लिए हथियारों का शांत होना जरूरी है, लेकिन उसके साथ जीवन को सहारा देने वाले प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा और बहाली भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

स्रोत एवं तथ्य-जांच: डीडी न्यूज़ का मूल लेख; संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय दिवस संबंधी दस्तावेज; संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम; अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस समिति के अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून संबंधी संदर्भ।

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