सोनिया गांधी ने मोदी सरकार पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया। जानिए SIR विवाद, चुनावी निष्पक्षता और उनकी नई किताब से जुड़ी अहम बातें।
कांग्रेस और विपक्ष को समान राजनीतिक अवसर नहीं मिलने का आरोप; चुनाव आयोग और मीडिया की भूमिका पर उठाए सवाल। 10 नवंबर को प्रकाशित होगी सोनिया गांधी की संस्मरण-पुस्तक Belonging: A Journey of Love।
नई दिल्ली, 7 नवंबर 2026। कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष और पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर तीखा राजनीतिक हमला बोला है। द हिंदू को दिए एक लिखित साक्षात्कार में उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेतृत्व वाली राजनीतिक व्यवस्था के पिछले 12 वर्षों के दौरान देश के लोकतांत्रिक ढांचे और संस्थाओं को बड़ा नुकसान पहुंचा है। उन्होंने कहा कि भविष्य में सत्ता परिवर्तन होने पर भी संस्थाओं को पहले जैसी स्थिति में लाने के लिए समय और व्यापक प्रयास की जरूरत पड़ेगी।
सोनिया गांधी की ये टिप्पणियां उनकी नई संस्मरण-पुस्तक Belonging: A Journey of Love के प्रकाशन से पहले सामने आई हैं। पुस्तक भारत में 10 नवंबर 2026 को हार्परकॉलिन्स इंडिया द्वारा प्रकाशित की जानी है। साक्षात्कार में उन्होंने अपने निजी जीवन, राजीव गांधी के साथ संबंध, राजनीति में प्रवेश, कांग्रेस के भविष्य और भारतीय लोकतंत्र की स्थिति जैसे विषयों पर विचार रखे।
विपक्ष को समान अवसर नहीं मिलने का आरोप
सोनिया गांधी ने कहा कि 2014 में भाजपा के केंद्र की सत्ता में आने के बाद से कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को समान राजनीतिक अवसर नहीं मिले हैं। उन्होंने अपनी बात के समर्थन में चुनाव आयोग सहित प्रमुख संस्थाओं की स्वतंत्रता, मुख्यधारा के मीडिया पर प्रभाव, चुनावी राजनीति में धनबल और धर्म के इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई।
ये सोनिया गांधी के राजनीतिक आरोप और आकलन हैं। इन्हें चुनावी प्रक्रिया में अनियमितता या संस्थागत नियंत्रण के स्वतंत्र रूप से सिद्ध निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इन आरोपों का समुचित मूल्यांकन करने के लिए संबंधित घटनाओं, दस्तावेजों, आधिकारिक प्रतिक्रियाओं और उपलब्ध साक्ष्यों को अलग-अलग देखना आवश्यक है।
SIR विवाद के बीच चुनाव आयोग पर बहस
सोनिया गांधी की टिप्पणियां मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के बीच आई हैं। विपक्षी दलों ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए आशंका जताई है कि इससे पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हट सकते हैं।
द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, विपक्ष ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं और मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं का मुद्दा उठाया है। विपक्ष की आशंकाओं और चुनाव आयोग की प्रक्रिया के वास्तविक प्रभाव के बीच अंतर करना जरूरी है। किसी मतदाता का नाम हटाए जाने, जोड़े जाने या संशोधित होने के मामले में संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड, निर्धारित प्रक्रिया और शिकायतों के निपटारे की स्थिति देखना आवश्यक है।
मतदाता सूची का पुनरीक्षण अपने आप में मतदाता सूची को अद्यतन करने की एक प्रशासनिक प्रक्रिया है। लेकिन किसी विशेष पुनरीक्षण में पात्र मतदाताओं के नाम हटने, त्रुटियों या प्रक्रियागत समस्याओं के आरोपों की जांच ठोस आंकड़ों और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर होनी चाहिए।
कांग्रेस के भविष्य को लेकर क्या बोलीं सोनिया गांधी ?
कांग्रेस की मौजूदा राजनीतिक स्थिति और भविष्य की संभावनाओं पर पूछे जाने पर सोनिया गांधी ने निराशावादी रुख अपनाने से इनकार किया। उनका कहना था कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद पार्टी संघर्ष कर रही है और आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है।
उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं के राजनीतिक संघर्ष का उल्लेख करते हुए कहा कि पार्टी के लोग देश के विभिन्न हिस्सों में संवैधानिक मूल्यों के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने यह भी विश्वास जताया कि समान विचारधारा वाले दलों के साथ सहयोग से विपक्ष की संभावनाएं बेहतर हो सकती हैं।
हालांकि, कांग्रेस के भविष्य का आकलन केवल किसी वरिष्ठ नेता के बयान के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए चुनावी प्रदर्शन, संगठनात्मक स्थिति, राज्यों में पार्टी की मौजूदगी, गठबंधन की प्रभावशीलता और मतदाताओं के रुझान जैसे कारकों को भी देखना होगा।
मोदी, RSS और मनमोहन सिंह पर टिप्पणी
साक्षात्कार में सोनिया गांधी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक उदय और उनकी विचारधारा से कांग्रेस को मिलने वाले संभावित सबक के बारे में भी पूछा गया। रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा कि मोदी की वैचारिक पृष्ठभूमि कांग्रेस से अलग है और कांग्रेस के भीतर राजनीतिक सफलता के अपने उदाहरण मौजूद हैं। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का उल्लेख किया तथा RSS से सीखने की आवश्यकता पर असहमति जताई।
सोनिया गांधी ने 2004 के आम चुनाव के बाद प्रधानमंत्री पद स्वीकार न करने के अपने निर्णय पर भी बात की। उन्होंने कहा कि उन्हें इस फैसले पर दोबारा विचार करने की जरूरत महसूस नहीं हुई। उनके अनुसार, उस समय सरकार का नेतृत्व मनमोहन सिंह कर रहे थे और वह पार्टी का नेतृत्व कर रही थीं। उन्होंने दोनों भूमिकाओं को अलग-अलग बताते हुए उस कार्यकाल के अनुभव को कुल मिलाकर सकारात्मक बताया ।

सोनिया-गांधी-का-लोकतंत्र-पर-सवाल
‘Belonging: A Journey of Love’ में निजी जीवन और राजनीति
सोनिया गांधी की संस्मरण-पुस्तक Belonging: A Journey of Love 10 नवंबर को प्रकाशित होने वाली है। पुस्तक में उनके निजी जीवन, भारत से जुड़ाव और सार्वजनिक जीवन की यात्रा को राजनीतिक घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में प्रस्तुत किया गया है।
साक्षात्कार में उनके जीवन के कई महत्वपूर्ण पड़ावों का संदर्भ सामने आया—राजीव गांधी से उनका संबंध, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के जीवन से जुड़े अनुभव, कांग्रेस की जिम्मेदारी स्वीकार करना और 2004 में प्रधानमंत्री पद से दूर रहने का फैसला। इस तरह पुस्तक केवल व्यक्तिगत स्मृतियों तक सीमित नहीं है; इसमें उनके जीवन के साथ-साथ भारतीय राजनीति के कई निर्णायक दौर भी शामिल हैं।
हालांकि, संस्मरण किसी व्यक्ति के अनुभवों और दृष्टिकोण का विवरण होता है। उसमें प्रस्तुत घटनाओं, व्याख्याओं और राजनीतिक आकलनों को समझते समय ऐतिहासिक दस्तावेजों, दूसरे प्रत्यक्ष विवरणों और स्वतंत्र स्रोतों से तुलना करना उपयोगी होता है।
लोकतंत्र और संस्थाओं पर बहस क्यों महत्वपूर्ण है ?
लोकतंत्र में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, मतदाता सूची की विश्वसनीयता, मीडिया की भूमिका और राजनीतिक दलों के लिए समान अवसर जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हैं। इन विषयों पर विपक्ष के सवालों के साथ-साथ संस्थागत प्रक्रियाओं, सरकारी पक्ष और उपलब्ध प्रमाणों को भी सार्वजनिक चर्चा में स्थान मिलना चाहिए।
सोनिया गांधी का बयान इस बहस को फिर सामने लाता है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता को कैसे परखा जाए और राजनीतिक आरोपों की जांच किन मानकों पर हो। इस सवाल का जवाब केवल राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि पारदर्शी प्रक्रियाओं, विश्वसनीय आंकड़ों और जवाबदेही से मिल सकता है।
निष्कर्ष: सोनिया गांधी के ताजा बयान में केंद्र सरकार की नीतियों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थिति पर विपक्ष की चिंता प्रमुख है। वहीं, उनकी आगामी पुस्तक निजी जीवन और राजनीतिक अनुभवों को उनके दृष्टिकोण से समझने का अवसर देगी। इन बयानों और दावों का मूल्यांकन करते समय पाठकों के लिए आरोप, तथ्य और राजनीतिक राय के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है।
हिंदी विंडो | हिंदी में दुनिया, दुनिया में हिंदी..!













Leave a Reply