मजिस्ट्रेट के आदेश में हाई कोर्ट को नहीं मिली कोई कानूनी खामी; छह सप्ताह तक कार्यवाही स्थगित, सुप्रीम कोर्ट जाने का मिला अवसर
मुंबई/नई दिल्ली, 8 सितंबर 2026: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ की गई कथित आपत्तिजनक टिप्पणी से जुड़े मानहानि मामले में कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बॉम्बे हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली है। अदालत ने 2019 में उनके खिलाफ जारी समन को रद्द करने की मांग वाली याचिका मंगलवार को खारिज कर दी।
न्यायमूर्ति एन. आर. बोरकर की एकल पीठ ने मजिस्ट्रेट अदालत के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार किया, जिसके जरिए राहुल गांधी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का रास्ता खुला था। अदालत ने कहा कि उसे निचली अदालत के आदेश में ऐसी कोई कानूनी खामी या अनियमितता नहीं मिली, जिसके आधार पर उसमें हस्तक्षेप किया जाए।
क्या है पूरा मामला ?
यह मामला वर्ष 2018 में राजस्थान में राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर की गई ‘कमांडर-इन-थीफ’ टिप्पणी से जुड़ा है। यह टिप्पणी राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री मोदी पर राहुल गांधी के राजनीतिक हमलों के दौरान की गई थी।
इसके बाद एम. एच. श्रीश्रीमल नामक व्यक्ति ने राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि की शिकायत दायर की। शिकायतकर्ता ने स्वयं को भारतीय जनता पार्टी का सदस्य बताया था। गिरगांव स्थित मजिस्ट्रेट अदालत ने 28 अगस्त 2019 को शिकायत पर संज्ञान लेते हुए राहुल गांधी के खिलाफ आपराधिक प्रक्रिया आगे बढ़ाने का आदेश दिया था।
राहुल गांधी ने इसी आदेश को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी थी और मांग की थी कि उनके खिलाफ जारी समन तथा निचली अदालत की कार्यवाही को रद्द किया जाए।
राहुल गांधी की ओर से क्या दलील दी गई ?
हाई कोर्ट में राहुल गांधी की ओर से अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि शिकायतकर्ता इस मामले में प्रत्यक्ष रूप से पीड़ित पक्ष नहीं हैं और इसलिए उन्हें ऐसी मानहानि शिकायत दायर करने का कानूनी अधिकार नहीं था।
उनकी ओर से यह भी दलील दी गई कि शिकायत निराधार है और निचली अदालत द्वारा उनके खिलाफ कार्यवाही शुरू करने का आदेश उचित नहीं था।
शिकायतकर्ता की ओर से इन दलीलों का विरोध किया गया। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि राहुल गांधी की टिप्पणी प्रधानमंत्री मोदी के साथ-साथ भाजपा के सदस्यों और उनसे जुड़े भारतीय नागरिकों के बारे में भी अपमानजनक आरोपों का संकेत देती थी। शिकायत में राहुल गांधी द्वारा अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर कथित तौर पर इसी टिप्पणी से संबंधित वीडियो पोस्ट किए जाने का भी उल्लेख किया गया था।
हाई कोर्ट ने क्या कहा ?
न्यायमूर्ति एन. आर. बोरकर की पीठ ने राहुल गांधी की याचिका खारिज करते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट अदालत के आदेश में ऐसी कोई खामी नहीं मिली जिसके कारण हाई कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़े।
अदालत के आदेश का सार यह है कि निचली अदालत के आदेश में कोई ऐसी ‘त्रुटि और अवैधता’ नहीं पाई गई, जिसके आधार पर उसे रद्द किया जा सके।
क्या राहुल गांधी को तुरंत मजिस्ट्रेट के सामने पेश होना होगा ?
नहीं। इस मामले में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि हाई कोर्ट ने अपने नवंबर 2021 के उस निर्देश को जारी रखा है, जिसके तहत मजिस्ट्रेट अदालत में मानहानि शिकायत की सुनवाई छह सप्ताह के लिए स्थगित रहेगी।
इसका उद्देश्य राहुल गांधी को हाई कोर्ट के ताजा फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का अवसर देना है। यानी हाई कोर्ट ने समन रद्द करने से इनकार किया है, लेकिन निचली अदालत की कार्यवाही पर तत्काल आगे बढ़ने की स्थिति भी नहीं बनाई है।
मामले का महत्व
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक राजनीतिक बयान से जुड़े आपराधिक मानहानि विवाद और न्यायिक प्रक्रिया के बीच के संबंध को सामने लाता है।
हाई कोर्ट का मौजूदा फैसला राहुल गांधी को दोषी ठहराने वाला फैसला नहीं है। अदालत ने केवल 2019 में जारी समन और मजिस्ट्रेट अदालत की कार्यवाही को चुनौती देने वाली उनकी याचिका को खारिज किया है। अब छह सप्ताह की अवधि में राहुल गांधी के पास सुप्रीम कोर्ट में इस आदेश को चुनौती देने का विकल्प मौजूद है।
हिंदी विंडो फैक्ट नोट:
इस खबर को प्रकाशित करते समय ‘दोषी’, ‘सजा’ या ‘मानहानि साबित’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार यह मामला अभी न्यायिक प्रक्रिया में है और हाई कोर्ट का आदेश समन रद्द करने की याचिका से संबंधित है।
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