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चीन-पाकिस्तान के नए बॉर्डर कमीशन पर भारत की आपत्ति, 1963 के सीमा समझौते को भी नहीं मानता भारत

China-Pakistan Boundary Commission: 1963 के समझौते पर भारत का रुख फिर साफ, कहा- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न हिस्सा

चीन-पाकिस्तान Boundary Joint Commission सक्रिय होने के बाद भारत ने आपत्ति जताई है। जानिए 1963 के China-Pakistan Boundary Agreement, शक्सगाम घाटी और भारत के आधिकारिक रुख से जुड़ी पूरी जानकारी।

चीन-पाकिस्तान के बॉर्डर कमीशन पर भारत ने जताई आपत्ति, 1963 के समझौते को बताया अवैध और अमान्य

नई दिल्ली, 18 सितंबर 2026: चीन और पाकिस्तान द्वारा सीमा प्रबंधन से जुड़ा संयुक्त आयोग सक्रिय किए जाने के बाद भारत ने इस कदम पर कड़ी आपत्ति जताई है। भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि इस आयोग का कोई कानूनी आधार नहीं है और जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख भारत के अभिन्न और अविभाज्य हिस्से हैं। भारत ने एक बार फिर 1963 में चीन और पाकिस्तान के बीच हुए तथाकथित सीमा समझौते को मान्यता देने से इनकार किया है।

भारत की आपत्ति ऐसे समय सामने आई है जब चीन और पाकिस्तान ने Pakistan-China Boundary Joint Commission को सक्रिय किया है। पाकिस्तान के अनुसार, आयोग की पहली बैठक 16-17 सितंबर को इस्लामाबाद में हुई। बैठक में सीमा प्रबंधन, संयुक्त सीमा सर्वेक्षण, लोगों और सामान की आवाजाही तथा संपर्क से जुड़े मुद्दों पर सहयोग के लिए रूपरेखा पर चर्चा हुई।

भारत ने क्या कहा ?

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत की स्थिति इस मामले में स्पष्ट और लगातार एक जैसी रही है। भारत ने पाकिस्तान-चीन सीमा संयुक्त आयोग को कानूनी आधार से रहित बताया है। साथ ही भारत ने दोहराया कि वह 1963 के चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते को कभी मान्यता नहीं देता।

भारत के आधिकारिक रुख के मुताबिक, पाकिस्तान को उन क्षेत्रों के संबंध में किसी अन्य देश के साथ व्यवस्था करने का कानूनी अधिकार नहीं है, जिन्हें भारत अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है और जो पाकिस्तान के नियंत्रण में हैं।

1963 में क्या हुआ था ?

2 मार्च 1963 को चीन और पाकिस्तान के बीच एक सीमा समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। समझौते का उद्देश्य चीन के शिनजियांग क्षेत्र और पाकिस्तान के नियंत्रण वाले जम्मू-कश्मीर से लगे क्षेत्र के बीच सीमा का निर्धारण करना था। भारत ने इस समझौते को कभी स्वीकार नहीं किया।

भारत के अनुसार, इस समझौते के तहत पाकिस्तान ने शक्सगाम घाटी के लगभग 5,180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को चीन के हवाले किया। भारत इस क्षेत्र को अपने संप्रभु क्षेत्र का हिस्सा मानता है।

शक्सगाम घाटी को Trans-Karakoram Tract भी कहा जाता है और यह काराकोरम क्षेत्र में सियाचिन के उत्तर में स्थित है। इस क्षेत्र को लेकर भारत और चीन के दावे अलग-अलग हैं।

2013 के समझौते से जुड़ा है नया आयोग

मौजूदा बॉर्डर जॉइंट कमीशन की पृष्ठभूमि 2013 के चीन-पाकिस्तान समझौते से जुड़ी बताई जाती है। उस समझौते में सीमा प्रबंधन के लिए संयुक्त तंत्र का प्रावधान किया गया था। अब दोनों देशों ने उस व्यवस्था को औपचारिक रूप से सक्रिय किया है।

पाकिस्तानी पक्ष के अनुसार, आयोग सीमा प्रबंधन, सीमा पार व्यापार और लोगों की आवाजाही तथा संबंधित संपर्क व्यवस्था में समन्वय बढ़ाने के लिए काम करेगा।

भारत के लिए मामला क्यों महत्वपूर्ण है ?

भारत की आपत्ति का मुख्य आधार क्षेत्रीय संप्रभुता का उसका दावा है। नई दिल्ली का कहना है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न हिस्सा हैं और पाकिस्तान के नियंत्रण वाले भारतीय क्षेत्र के संबंध में पाकिस्तान द्वारा किसी तीसरे देश के साथ किया गया कोई समझौता भारत के अधिकारों को प्रभावित नहीं कर सकता।

इसलिए भारत की आपत्ति केवल मौजूदा संयुक्त आयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें 1963 के चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते तक जाती हैं। भारत दशकों से उस समझौते को कानूनी मान्यता देने से इनकार करता रहा है। विदेश मंत्रालय के उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेजों में भी भारत की यही स्थिति दर्ज है।

निष्कर्ष

चीन और पाकिस्तान के बीच सीमा प्रबंधन के लिए संयुक्त आयोग का सक्रिय होना इस पुराने क्षेत्रीय विवाद को फिर चर्चा में ले आया है। पाकिस्तान और चीन इसे अपने द्विपक्षीय सीमा प्रबंधन और संपर्क व्यवस्था के हिस्से के रूप में देखते हैं, जबकि भारत का कहना है कि इस व्यवस्था का उन क्षेत्रों पर कोई कानूनी प्रभाव नहीं पड़ सकता जिन्हें भारत अपना क्षेत्र मानता है।