नसीरुद्दीन शाह, अमोल पालेकर समेत 92 हस्तियों ने AIMPLB के ‘सेव इंडिया, सेव शरीयत’ अभियान पर उठाए सवाल
संयुक्त बयान में लैंगिक समानता, संवैधानिक अधिकार और मुस्लिम समुदाय के सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर ध्यान देने की अपील; AIMPLB का कहना है कि अभियान धार्मिक स्वतंत्रता, संविधान और मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़ी चिंताओं को सामने रखने के लिए है।
नई दिल्ली। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड यानी AIMPLB के ‘सेव इंडिया, सेव शरीयत’ अभियान को लेकर मुस्लिम समाज और नागरिक अधिकारों से जुड़े संगठनों के बीच बहस तेज हो गई है। अभिनेता नसीरुद्दीन शाह, अमोल पालेकर, रत्ना पाठक और मल्लिका साराभाई समेत कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों, लेखकों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस अभियान की आलोचना करते हुए एक संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर किए हैं। ThePrint की 23 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, इस पहल में मुस्लिम पर्सनल लॉ, लैंगिक समानता, संवैधानिक अधिकार और समुदाय से जुड़े सामाजिक-आर्थिक मुद्दों को केंद्र में रखने की मांग की गई है।
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब AIMPLB ने देशव्यापी स्तर पर ‘Save India, Save Shariat’ अभियान शुरू किया है। बोर्ड ने 31 अगस्त 2026 को अभियान की घोषणा की थी और इसे 17 सितंबर से तीन महीने तक चलाने की बात कही थी। बोर्ड के अनुसार, इस अभियान के जरिए समान नागरिक संहिता (UCC), धार्मिक स्वतंत्रता और कानूनों के कथित चयनात्मक प्रवर्तन से जुड़ी चिंताओं को सामने लाया जाना है।
AIMPLB भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े मामलों पर लंबे समय से सक्रिय संगठन है। बोर्ड की अपनी वेबसाइट पर दिए गए उद्देश्यों के मुताबिक, उसका एक प्रमुख उद्देश्य भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ की सुरक्षा और शरीयत अधिनियम को बनाए रखने के लिए प्रयास करना है। बोर्ड यह भी कहता है कि वह उन कानूनों और न्यायिक फैसलों का विरोध करता है जिन्हें वह मुस्लिम पर्सनल लॉ में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप मानता है।
दूसरी ओर, हालिया संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर करने वाले समूहों ने अभियान के फोकस पर सवाल उठाए हैं। बयान की पहल Indian Muslims for Secular Democracy (IMSD), Bharatiya Muslim Mahila Andolan (BMMA), Muslim Satyashodhak Mandal और Roshni से जुड़े कार्यकर्ताओं ने की। इसमें जावेद आनंद, फिरोज मिथीबोरवाला, जकिया सोमन, नूरजहां सफिया नियाज, शम्सुद्दीन तांबोली और बदर सईद जैसे नाम शामिल हैं।
बयान में कहा गया कि धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन इसके साथ संविधान में दिए गए समानता और भेदभाव-रोधी अधिकारों को भी महत्व मिलना चाहिए। बयान में संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लेख करते हुए व्यक्तिगत कानूनों में महिलाओं के अधिकारों पर विशेष ध्यान देने की मांग की गई।
हस्ताक्षरकर्ताओं ने मुस्लिम महिलाओं से जुड़े विवाह, तलाक, विरासत, बच्चों की अभिरक्षा और गोद लेने जैसे मुद्दों पर समान अधिकारों की बात उठाई। उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार और उसके संभावित संहिताकरण पर भी चर्चा की मांग की। बयान में पाकिस्तान, बांग्लादेश, ट्यूनीशिया और मोरक्को जैसे देशों में मुस्लिम पर्सनल लॉ में हुए अलग-अलग सुधारों का उदाहरण दिया गया।
संयुक्त बयान में AIMPLB के 2016 के उस हलफनामे का भी संदर्भ दिया गया जो शायरा बानो मामले के दौरान सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया गया था। हस्ताक्षरकर्ताओं ने दावा किया कि उस हलफनामे में पर्सनल लॉ पर पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचनाओं के प्रभाव को स्वीकार किया गया था। हालांकि, इस संदर्भ की व्याख्या और उससे निकाले गए निष्कर्ष बयान पर हस्ताक्षर करने वाले समूहों के हैं।
इस विवाद का एक दूसरा पहलू भी है। AIMPLB के अभियान की आलोचना केवल गैर-मुस्लिम या बाहरी समूहों की ओर से नहीं हुई है। सितंबर की शुरुआत में ऑल इंडिया पासमांदा मुस्लिम महाज से जुड़े नेताओं ने भी अभियान को लेकर चिंता जताई थी। Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, संगठन ने आशंका व्यक्त की कि धार्मिक नारों पर केंद्रित ऐसा अभियान राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ा सकता है।

रिप्रेजेंटेटिव इमेज | मुंबई के बांद्रा स्टेशन पर ईद-उल-अज़हा सेलिब्रेशन के दौरान एक बच्चा भारतीय झंडा पकड़े हुए | PTI
हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि AIMPLB अपने अभियान को केवल धार्मिक कानून के सवाल के रूप में नहीं रख रहा है। बोर्ड ने इसे संविधान, धार्मिक स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों से जुड़ा विषय बताया है। बोर्ड की आधिकारिक उद्देश्यों की सूची में मुस्लिम पर्सनल लॉ की रक्षा, मुस्लिम समुदाय में संबंधित कानूनों के प्रति जागरूकता और जरूरत पड़ने पर देशव्यापी अभियान चलाना शामिल है।
इस पूरे विवाद का केंद्र अब यह सवाल बन गया है कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत कानून, लैंगिक समानता और समान नागरिक संहिता के बीच संवैधानिक संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। एक पक्ष धार्मिक और व्यक्तिगत कानूनों की सुरक्षा को महत्वपूर्ण मानता है, जबकि दूसरे पक्ष का जोर व्यक्तिगत कानूनों में लैंगिक समानता और संवैधानिक अधिकारों पर है।
फिलहाल दोनों पक्षों के तर्क सार्वजनिक बहस का हिस्सा हैं। इसलिए इस विवाद को केवल किसी एक समुदाय या संगठन के पक्ष-विपक्ष के रूप में देखने के बजाय इसके संवैधानिक, कानूनी और सामाजिक पहलुओं को समझना महत्वपूर्ण है।











