CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना कार्रवाई की मांग, अटॉर्नी जनरल से मांगी गई मंजूरी
नई दिल्ली, 24 सितंबर 2026 — मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता ब्रजेश सिंह ने भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को पत्र लिखकर कथित आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए आवश्यक सहमति मांगी है। यह मांग Election Commission of India यानी ECI के कामकाज को लेकर सामने आई उन रिपोर्टों के बाद की गई है, जिनमें चुनाव आयुक्तों के बीच कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर मतभेद का दावा किया गया था।
LiveLaw की 24 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, अधिवक्ता ने Contempt of Courts Act, 1971 की Section 15(1)(b), Section 2(c) और सुप्रीम कोर्ट की अवमानना कार्यवाही से संबंधित नियमों का हवाला दिया है। यह ध्यान रखना जरूरी है कि फिलहाल यह अवमानना की मांग है, अदालत द्वारा दोष सिद्ध किया जाना नहीं। आगे की कार्रवाई अटॉर्नी जनरल की सहमति और उसके बाद न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
इस घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में 23 सितंबर 2026 को प्रकाशित एक रिपोर्ट है, जिसमें दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 मौकों पर चुनाव आयोग के कुछ निर्णयों को लेकर लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट में Form 6 में बदलाव, मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया तथा electoral-roll database तक पहुंच के केंद्रीकरण जैसे विषयों का उल्लेख किया गया।
अधिवक्ता ब्रजेश सिंह ने अपने पत्र में इन रिपोर्टों के आधार पर आरोप लगाया है कि यदि किसी निर्णय को आयोग के सभी सदस्यों की भागीदारी के बिना लिया गया और उसे पूरे आयोग के निर्णय के रूप में प्रस्तुत किया गया, तो यह संवैधानिक व्यवस्था और सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए सिद्धांतों के संदर्भ में गंभीर प्रश्न खड़े कर सकता है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का 1995 का T.N. Seshan v. Union of India फैसला भी चर्चा में है। याचिका की ओर से इस फैसले का हवाला देते हुए चुनाव आयोग के बहु-सदस्यीय स्वरूप और CEC की भूमिका पर जोर दिया गया है। हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण तथ्यात्मक सावधानी जरूरी है। उपलब्ध मूल फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा था कि CEC और अन्य Election Commissioners की संवैधानिक स्थिति समान नहीं है और CEC को “distinctly higher position” में रखा गया था। इसलिए “CEC हमेशा primus inter pares यानी बराबरों में प्रथम है” को उस फैसले का सीधा निष्कर्ष बताना सही नहीं होगा।
याचिका में 2023 के Anoop Baranwal v. Union of India फैसले का भी उल्लेख किया गया है। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने Election Commission की स्वतंत्रता और चुनावों की निष्पक्षता से जुड़े संवैधानिक प्रश्नों पर विचार किया था। उस समय कोर्ट ने कहा था कि जब तक संसद नियुक्ति प्रक्रिया पर कानून नहीं बनाती, CEC और Election Commissioners की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली समिति की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी।
इसके बाद संसद ने 2023 में CEC और अन्य Election Commissioners की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल से संबंधित कानून बनाया। इसी कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर 23 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में दो न्यायाधीशों की पीठ ने मतभेद के बाद मामले को बड़ी पीठ के समक्ष रखने का निर्देश दिया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, जस्टिस दीपांकर दत्ता ने नियुक्ति व्यवस्था की स्वतंत्रता को लेकर प्रथमदृष्टया चिंताएं व्यक्त कीं, जबकि मामले की अंतिम संवैधानिक वैधता पर अभी निर्णय बाकी है।
वर्तमान विवाद में Election Commission ने हालांकि उन रिपोर्टों में बताए गए “rift” यानी आंतरिक टकराव के संकेतों को खारिज किया है। ECI के अनुसार, संबंधित मुद्दे draft-stage पर operational queries, inputs और suggestions थे तथा आयोग द्वारा लिए गए निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे। इसलिए इस पूरे प्रकरण में एक पक्ष द्वारा लगाए गए आरोपों और निर्वाचन आयोग के स्पष्टीकरण—दोनों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
कानूनी प्रक्रिया की दृष्टि से भी यह समझना जरूरी है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ criminal contempt की मांग किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने अवमानना सिद्ध कर दी है। Contempt of Courts Act की Section 15 के अनुसार, Supreme Court में criminal contempt की कार्यवाही किसी अन्य व्यक्ति द्वारा शुरू करने के लिए संबंधित वैधानिक सहमति की आवश्यकता होती है; कानून में Supreme Court के संदर्भ में Attorney General या Solicitor General को संबंधित भूमिका दी गई है।
अब इस मामले में अगला महत्वपूर्ण चरण अटॉर्नी जनरल की प्रतिक्रिया होगी। यदि सहमति दी जाती है तो उसके बाद संबंधित प्रक्रिया के तहत सुप्रीम कोर्ट में कार्यवाही शुरू किए जाने का रास्ता खुल सकता है। यदि सहमति नहीं दी जाती, तो इस विशेष रास्ते से criminal contempt petition आगे बढ़ने की स्थिति अलग होगी।
इस बीच, Election Commission की आंतरिक कार्यप्रणाली, चुनावी डेटा तक पहुंच, मतदाता सूची से जुड़े प्रशासनिक फैसले और CEC तथा अन्य Election Commissioners की संवैधानिक भूमिका को लेकर बहस जारी है। मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव आयोग भारतीय चुनाव व्यवस्था का संवैधानिक संस्थान है और उसके कामकाज से जुड़े प्रश्न सीधे चुनावी प्रशासन, पारदर्शिता और संस्थागत स्वतंत्रता से जुड़े होते हैं।
Hindi Window की संपादकीय सावधानी: इस समय उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अवमानना सिद्ध हो चुकी है या सुप्रीम कोर्ट ने उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई शुरू कर दी है। फिलहाल उपलब्ध तथ्य यह हैं कि एक सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता ने अटॉर्नी जनरल से criminal contempt proceedings के लिए सहमति मांगी है। आरोपों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी सामने नहीं आया है।











