CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका SIR प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की जांच और धारा 32 के तहत कार्रवाई की मांग
नई दिल्ली, 25 सितंबर 2026। मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) से जुड़े निर्वाचन आयोग के फैसलों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि आयोग के कुछ फैसले तीन सदस्यीय निर्वाचन आयोग के अन्य सदस्यों की सहमति या बहुमत की राय के विपरीत लिए गए। याचिका में ऐसे फैसलों को असंवैधानिक और शून्य घोषित करने के साथ-साथ संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है।
याचिका अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दाखिल की गई है और इसमें CEC ज्ञानेश कुमार के अलावा वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त मनीष/मनीश गर्ग तथा निर्वाचन आयोग की सूचना प्रौद्योगिकी व्यवस्था से जुड़े अधिकारी सीमा खन्ना समेत अन्य अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है। रिपोर्टों के अनुसार याचिका में सक्षम प्राधिकारी को Representation of the People Act, 1950 की धारा 32 के तहत शिकायत दर्ज करने और अभियोजन की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश देने की मांग की गई है।
धारा 32 को लेकर महत्वपूर्ण तथ्य
यहां एक जरूरी तथ्य स्पष्ट करना आवश्यक है। उपलब्ध रिपोर्टों में याचिका को CrPC की धारा 32 से नहीं, बल्कि Representation of the People Act, 1950 की Section 32 से जोड़ा गया है। इसलिए खबर में इसे “CrPC की धारा 32” लिखना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। याचिका में आरोपित अधिकारियों द्वारा चुनावी मतदाता सूची की तैयारी, संशोधन या सुधार से संबंधित कथित आधिकारिक कर्तव्य के उल्लंघन को लेकर कार्रवाई की मांग की गई है।
SIR और मतदाता सूची का विवाद
इस मामले की पृष्ठभूमि में निर्वाचन आयोग की SIR प्रक्रिया है। SIR का उद्देश्य मतदाता सूचियों की समीक्षा और अद्यतन करना है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में SIR प्रक्रिया के दौरान ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने का मुद्दा सामने आया है। हालांकि यह आंकड़ा ड्राफ्ट रोल में हटाए गए नामों से संबंधित है और इसे सीधे तौर पर “13 करोड़ मतदाताओं को स्थायी रूप से वोट देने से वंचित कर दिया गया” के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
याचिका में इन कथित विलोपनों की जांच के लिए न्यायिक जांच आयोग या Special Investigation Team (SIT) गठित करने की मांग की गई है। इसके अलावा याचिकाकर्ता ने मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 को उसके मूल वैधानिक स्वरूप में बहाल करने की मांग भी की है।
दो निर्वाचन आयुक्तों की आपत्तियों का मुद्दा
याचिका ऐसे समय दाखिल हुई है जब The Indian Express की एक जांच रिपोर्ट में दावा किया गया कि निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने लगभग 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर औपचारिक आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट के अनुसार इनमें मतदाता जोड़ने और हटाने, Form 6 में बदलाव, मतदाता डेटा तक पहुंच तथा निर्वाचन आयोग की IT व्यवस्था से संबंधित मुद्दे शामिल थे।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने Form 6 में किए गए एक बदलाव पर सवाल उठाया था। इस बदलाव के तहत नए मतदाता के आवेदन में उसके या उसके माता-पिता/दादा-दादी के पिछले SIR रोल में मौजूद होने से संबंधित जानकारी मांगी गई थी। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने मई 2026 में इस बदलाव के लिए संबंधित नियमों में संशोधन की आवश्यकता का मुद्दा उठाया था।
निर्वाचन आयोग का पक्ष भी महत्वपूर्ण
इस विवाद में निर्वाचन आयोग का पक्ष भी खबर का अनिवार्य हिस्सा है। आयोग के सूत्रों ने रिपोर्टों में कहा है कि SIR सहित आयोग के फैसले पूरे आयोग की सहमति से लिए गए और विभिन्न अधिकारियों द्वारा उठाए गए सवाल प्रक्रिया के ड्राफ्ट या प्रशासनिक विचार-विमर्श के स्तर के थे। आयोग ने एक बयान में यह भी कहा कि पिछले एक वर्ष में लिए गए फैसले पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत निर्णयों का परिणाम थे।
इसलिए अभी यह कहना कि CEC ने निश्चित रूप से कानून का उल्लंघन किया है या सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई तय कर दी है, तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। फिलहाल मामला एक दायर याचिका और उसमें लगाए गए आरोपों/मांगी गई राहतों तक सीमित है।
बहुमत के फैसले का कानूनी संदर्भ
याचिका में Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023 की धारा 18 का भी हवाला दिया गया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार इस प्रावधान में आयोग के कामकाज को यथासंभव सर्वसम्मति से चलाने और मतभेद की स्थिति में बहुमत की राय के आधार पर निर्णय लेने की व्यवस्था है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि यदि आयोग के कुछ फैसले अन्य निर्वाचन आयुक्तों की बहुमत राय के विपरीत लिए गए हैं, तो उन फैसलों की वैधता की न्यायिक समीक्षा होनी चाहिए। इस मांग पर अंतिम फैसला अदालत की सुनवाई और उसके समक्ष रखे गए रिकॉर्ड के आधार पर होगा।
आगे क्या होगा ?
अब मुख्य सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर क्या रुख अपनाता है। याचिका में कई राहतें मांगी गई हैं—CEC और अन्य अधिकारियों के खिलाफ कथित आधिकारिक कर्तव्य उल्लंघन पर कार्रवाई, SIR से जुड़े फैसलों की वैधता की जांच, SIT या न्यायिक जांच और Form 6 को मूल स्वरूप में बहाल करने जैसे मुद्दे।
फिलहाल यह एक विकासशील न्यायिक मामला है। इसलिए पाठकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि याचिका में लगाए गए आरोपों, निर्वाचन आयोग के जवाब और अदालत के किसी संभावित आदेश—इन तीनों को अलग-अलग समझा जाए। याचिका दाखिल होना अपने आप में आरोपों के सिद्ध होने के बराबर नहीं है।
Hindi Window Fact Check:
स्थिति — मामला सुप्रीम कोर्ट में याचिका के रूप में सामने आया है। आरोपों की न्यायिक पुष्टि नहीं हुई है।
धारा — उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार Representation of the People Act, 1950 की Section 32; CrPC Section 32 नहीं।
SIT — याचिकाकर्ता ने मांग की है; SIT जांच गठित होने की पुष्टि नहीं है।
13 करोड़ — SIR के दौरान ड्राफ्ट रोल से हटाए गए नामों से संबंधित दावा; इसे स्थायी रूप से मतदान अधिकार समाप्त होना नहीं माना जाना चाहिए।











