रांची: झारखंड लोक सेवा आयोग यानी JPSC की प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की जांच अब केवल परीक्षा परिणामों और कथित गड़बड़ियों तक सीमित नहीं रह गई है। आपराधिक जांच विभाग यानी CID की कार्रवाई के बाद जांच का फोकस उन लोगों और संस्थाओं पर है, जिनकी भूमिका परीक्षा प्रक्रिया, डेटा प्रोसेसिंग और उम्मीदवारों तक कथित पहुंच से जुड़ी रही है।
इस पूरे मामले में अभय कुमार तिवारी उर्फ मनोज कुमार तिवारी का नाम विशेष रूप से सामने आया है। तिवारी को जुलाई 2026 में CID ने गिरफ्तार किया था। वह गोड्डा जिले के पोड़ैयाहाट में ब्लॉक सप्लाई ऑफिसर के पद पर कार्यरत था। इससे पहले वह TSR Data Processing Private Limited यानी TDPL से जुड़ा रहा था—वही निजी एजेंसी जिसका नाम JPSC की परीक्षा प्रक्रिया से जुड़े विवाद में जांच के केंद्र में आया है।
13 साल में 12 परीक्षाओं में सफलता ने खींचा जांचकर्ताओं का ध्यान
जांच के दौरान तिवारी का परीक्षा रिकॉर्ड सामने आया। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार उसने लगभग 13 वर्षों के दौरान करीब 12 प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता हासिल की थी।
इनमें पुलिस सब-इंस्पेक्टर, भारतीय नौसेना, BARC, शिक्षक भर्ती, CRPF हेड कांस्टेबल, Northern Coalfields, JSSC की विभिन्न परीक्षाओं और JPSC से संबंधित कुछ परीक्षाओं के नाम बताए गए हैं। कुछ रिपोर्टों में PGTTCE-2023, JSSC CGL-2023, ACF तथा FSO जैसी परीक्षाओं में उसकी सफलता का उल्लेख है।
सिर्फ इतनी परीक्षाएं पास करना अपने आप में अपराध का प्रमाण नहीं है। लेकिन जांच एजेंसी इस बात की पड़ताल कर रही है कि परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसी से उसके संबंध और उसके असाधारण परीक्षा रिकॉर्ड के बीच कोई आपराधिक या अनुचित संबंध था या नहीं।
TDPL से सरकारी नौकरी तक—जांच का अहम कनेक्शन
तिवारी की भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि सरकारी रिकॉर्ड में वह अभय कुमार तिवारी के नाम से दर्ज था, जबकि TDPL से जुड़े समय में उसका नाम मनोज कुमार तिवारी के रूप में सामने आया है।
TDPL JPSC की परीक्षा प्रक्रिया से संबंधित कार्यों में शामिल रही थी। CID ने इसी मामले में TDPL के निदेशक रामवीर सिंह और कंपनी से जुड़े अन्य लोगों को भी गिरफ्तार किया है। 24 जुलाई तक गिरफ्तारियों की संख्या आठ पहुंचने की रिपोर्ट सामने आई थी, जबकि बाद की रिपोर्टों में यह संख्या और बढ़ी।
उम्मीदवारों से पैसे लेने का आरोप
जांच से जुड़े मीडिया रिपोर्टों में आरोप सामने आया है कि तिवारी कथित तौर पर अपनी खुद की परीक्षा सफलताओं का इस्तेमाल उम्मीदवारों के बीच भरोसा पैदा करने के लिए करता था।
आरोपों के मुताबिक, उम्मीदवारों को भर्ती प्रक्रिया में मदद या चयन का भरोसा दिलाकर उनसे बड़ी रकम मांगी जाती थी। अलग-अलग रिपोर्टों में कथित रकम अलग-अलग बताई गई है। इसलिए इन रकमों को फिलहाल जांच में सामने आए आरोप या कथित दर के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
कुछ हालिया रिपोर्टों में FRO और ACF जैसी परीक्षाओं के लिए कथित तौर पर क्रमशः 25 लाख और 35 लाख रुपये के ‘रेट’ का उल्लेख किया गया है। हालांकि, इन दावों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया में होना बाकी है।
OMR और परीक्षा प्रक्रिया में कथित हेरफेर की जांच
जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू परीक्षा की OMR शीट और डिजिटल डेटा से जुड़ा है। एजेंसी कथित तौर पर यह जांच कर रही है कि क्या परीक्षा के बाद उत्तरों या डेटा में किसी तरह का बदलाव किया गया।
कुछ रिपोर्टों में OMR शीट में कथित हेरफेर, उत्तर कुंजी से संबंधित अनियमितताओं और इंटरव्यू में अंकों को प्रभावित करने जैसे आरोपों का उल्लेख है।
हालांकि, इन आरोपों को अभी अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। जांच एजेंसियों को डिजिटल रिकॉर्ड, परीक्षा दस्तावेजों और अन्य सबूतों के आधार पर यह तय करना होगा कि वास्तव में किसी स्तर पर परीक्षा प्रक्रिया से छेड़छाड़ हुई थी या नहीं।
पूर्व JPSC अध्यक्ष एल. खियांग्ते भी जांच के दायरे में
मामला अब JPSC के शीर्ष स्तर तक पहुंच चुका है। पूर्व JPSC अध्यक्ष एल. खियांग्ते से CID ने कई घंटे पूछताछ की थी। बाद में अगस्त 2026 में उनकी गिरफ्तारी की खबर सामने आई।
उन पर मुख्य आरोपों में एक ब्लैकलिस्टेड कंपनी को परीक्षा संबंधी काम सौंपने की प्रक्रिया से जुड़े सवाल शामिल हैं। CID ने उनसे TDPL और परीक्षा प्रक्रिया से जुड़े निर्णयों के बारे में भी पूछताछ की।
खियांग्ते की गिरफ्तारी इस मामले को और गंभीर बना देती है, क्योंकि जांच अब केवल परीक्षा एजेंसी के कर्मचारियों या कुछ उम्मीदवारों तक सीमित नहीं रह गई है।
JPSC ने कई परीक्षाएं स्थगित कीं
जांच और विवाद के बीच JPSC ने कई महत्वपूर्ण परीक्षाओं को स्थगित किया। इनमें 25 से 27 जुलाई 2026 के बीच प्रस्तावित संयुक्त सिविल सेवा मुख्य परीक्षा भी शामिल थी। बाद में 2026 के परीक्षा कैलेंडर में शामिल कई अन्य परीक्षाओं को भी आगे के आदेश तक टाल दिया गया।
इस घटनाक्रम ने उन हजारों अभ्यर्थियों की चिंता बढ़ा दी है, जो लंबे समय से सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं।
छात्र CBI जांच की मांग कर रहे हैं
रांची में अभ्यर्थियों और छात्र संगठनों ने मामले की CBI जांच की मांग भी उठाई है। छात्रों का कहना है कि केवल विभागीय या राज्य स्तरीय जांच से उन्हें पूरी पारदर्शिता का भरोसा नहीं मिल रहा।
अब सबसे बड़ा सवाल क्या है?
JPSC विवाद अब केवल एक परीक्षा के परिणाम पर सवाल नहीं रह गया है।
जांच के सामने कई बड़े सवाल हैं—
क्या परीक्षा प्रक्रिया में वास्तव में संगठित तरीके से हेरफेर हुआ?
क्या किसी निजी एजेंसी के कर्मचारियों को परीक्षा डेटा तक अनुचित पहुंच मिली?
क्या उम्मीदवारों से पैसे लेकर चयन का भरोसा दिलाया गया?
क्या परीक्षा प्रक्रिया में शामिल किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति ने इस कथित नेटवर्क को मदद पहुंचाई?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या अभय तिवारी की कई परीक्षाओं में सफलता महज असाधारण प्रतिभा का परिणाम थी या इनमें से किसी परीक्षा में कथित अनियमितता की भूमिका थी?
इन सवालों के जवाब जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही सामने आएंगे।
महत्वपूर्ण: अभय तिवारी सहित इस मामले में गिरफ्तार किए गए अन्य लोगों पर लगे आरोप अभी जांच के अधीन हैं। किसी आरोपी को अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने से पहले उसे दोषी के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।










