मोहन भागवत बोले—दुनिया की समस्याओं का संतुलित समाधान भारत की ज्ञान परंपरा में :
मुंबई में अखिल भारतीय विहार सेवा समूह के 14वें सम्मेलन में RSS प्रमुख ने विकास-पर्यावरण, व्यक्तिगत स्वतंत्रता-परिवार और आस्था-संघर्ष के बीच संतुलन की जरूरत पर जोर दिया !
मुंबई: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि आज दुनिया कई तरह के विरोधाभासों और असंतुलन से जूझ रही है और इन चुनौतियों के समाधान में भारत की ज्ञान, दर्शन और आध्यात्मिक परंपराएं महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। उन्होंने कहा कि भारत के संदर्भ में धर्म और राष्ट्र को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
भागवत ने शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026 को मुंबई में आयोजित अखिल भारतीय विहार सेवा समूह के 14वें सम्मेलन को संबोधित करते हुए ये बातें कहीं। इस कार्यक्रम में उन्होंने दुनिया के सामने मौजूद कई सामाजिक और वैचारिक चुनौतियों का उल्लेख किया। PTI की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने विकास और पर्यावरण संरक्षण, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पारिवारिक जीवन तथा धार्मिक आस्था और संघर्ष के बीच पैदा होने वाले तनाव को प्रमुख उदाहरणों के रूप में रखा।
भागवत ने कहा कि जब किसी एक पक्ष को दूसरे की कीमत पर प्राथमिकता दी जाती है, तो संतुलन बिगड़ सकता है। उनके अनुसार, दुनिया में आज ऐसी स्थितियां दिखाई देती हैं, जहां विकास की आवश्यकता और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन चुनौती बन गया है। इसी तरह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और परिवार तथा धार्मिक आस्था और कट्टरता या संघर्ष के बीच भी तनाव देखा जा सकता है। उन्होंने इन विरोधाभासों को संतुलित दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता पर जोर दिया।
‘धर्म और राष्ट्र अलग नहीं’
अपने संबोधन में RSS प्रमुख ने कहा कि भारत के संदर्भ में धर्म और राष्ट्र अलग-अलग नहीं हैं। उन्होंने दोनों को परस्पर निर्भर बताते हुए कहा कि राष्ट्र का उद्देश्य धर्म से जुड़ा है और धर्म राष्ट्र के अस्तित्व को बनाए रखने में सहायक है। यह भागवत द्वारा व्यक्त किया गया वैचारिक दृष्टिकोण है, न कि भारतीय संविधान में राष्ट्र और धर्म के संबंध की कोई नई कानूनी व्यवस्था।
इस संदर्भ में ‘धर्म’ शब्द की व्याख्या भी महत्वपूर्ण है। भागवत ने अपने विभिन्न सार्वजनिक संबोधनों में धर्म को केवल पूजा-पद्धति या धार्मिक पहचान तक सीमित न मानते हुए कर्तव्य और जीवन-मूल्यों से जोड़कर समझाया है। 19 सितंबर 2026 को उज्जैन में दिए गए एक संबोधन में भी उन्होंने कहा था कि भारत में ‘धर्म’ की अवधारणा पश्चिमी अर्थ में प्रयुक्त ‘रिलिजन’ से अलग है।
भारत की ज्ञान परंपरा को लेकर क्या कहा ?
भागवत ने भारत की प्राचीन ज्ञान परंपराओं का उल्लेख करते हुए वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, भगवद्गीता, जैन आगम, त्रिपिटक, गुरु ग्रंथ साहिब और संतों की शिक्षाओं को भारत की व्यापक ज्ञान विरासत का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि इस ज्ञान को केवल पुस्तकों में संरक्षित रखने के बजाय उसे जीवन और आचरण में आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि इन परंपराओं को आगे बढ़ाने वाले संतों और आध्यात्मिक परंपराओं के संरक्षण का महत्व केवल किसी एक धार्मिक समुदाय तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक, ऐसी ज्ञान परंपराओं का संरक्षण मानवता के व्यापक हित से जुड़ा हुआ है।
‘करीब 3,000 साल तक भारत ने शांति का मार्ग दिखाया’—क्या है संदर्भ ?
अपने संबोधन में भागवत ने कहा कि करीब 3,000 वर्षों तक भारत ने किसी दूसरे देश पर विजय हासिल किए बिना, किसी का धर्म परिवर्तन कराए बिना और किसी पर हमला किए बिना दुनिया को सुख और शांति का रास्ता दिखाया। उन्होंने इसी संदर्भ में कहा कि दुनिया भारत से समाधान की उम्मीद करती है। TV9 और PTI दोनों की रिपोर्टों में यह कथन दर्ज है।
हालांकि, 3,000 वर्षों वाला आंकड़ा भागवत के भाषण में किया गया दावा है। इसे स्वतंत्र रूप से स्थापित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। भारत के प्राचीन इतिहास में विभिन्न राजवंशों, राज्यों, युद्धों, राजनीतिक संघर्षों और क्षेत्रीय विस्तार के अनेक प्रमाण मिलते हैं। इसलिए इस हिस्से को समाचार में स्पष्ट रूप से ‘भागवत ने कहा’ या ‘भागवत के अनुसार’ के रूप में ही लिखना तथ्यात्मक रूप से अधिक सावधानीपूर्ण है।
ऐसा दावा भागवत पहले भी सार्वजनिक मंचों पर कर चुके हैं। सितंबर 2025 में इंदौर में एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में भी उन्होंने भारत के लगभग 3,000 वर्षों तक विश्व नेतृत्व और गैर-विजयकारी भूमिका का उल्लेख किया था।
विहार सेवा समूह के संदर्भ में संदेश
भागवत ने सम्मेलन में जैन आध्यात्मिक परंपरा और उसे आगे बढ़ाने वाले लोगों के संरक्षण पर भी बात की। उन्होंने कहा कि इस परंपरा को संरक्षित करना व्यापक मानवता की सेवा से जुड़ा कार्य है। उन्होंने जैन समुदाय के सदस्यों से स्थानीय RSS स्वयंसेवकों के साथ संपर्क बनाए रखने की अपील भी की, ताकि आवश्यकता पड़ने पर स्वयंसेवक व्यवस्थाओं में सहयोग कर सकें।
निष्कर्ष
मोहन भागवत के मुंबई संबोधन का केंद्रीय विषय भारत की ज्ञान और आध्यात्मिक परंपरा को वर्तमान वैश्विक चुनौतियों के संदर्भ में देखना था। उन्होंने विकास, पर्यावरण, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, परिवार और धार्मिक आस्था जैसे क्षेत्रों में संतुलन की आवश्यकता पर जोर दिया।
उनके वक्तव्य में भारत की ऐतिहासिक भूमिका को लेकर कुछ व्यापक दावे भी शामिल रहे हैं। इनमें लगभग 3,000 वर्षों तक भारत द्वारा बिना विजय या धर्मांतरण के शांति का मार्ग दिखाने का दावा प्रमुख है। उपलब्ध रिपोर्टिंग इसे भागवत का कथन दर्ज करती है; इसलिए इसे स्वतंत्र ऐतिहासिक निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उसी रूप में रिपोर्ट करना अधिक उपयुक्त है।
HindiWindow Fact Check Note:
इस खबर में प्रत्यक्ष रूप से सत्यापित घटनाक्रम, भागवत के सार्वजनिक वक्तव्य और उनके ऐतिहासिक दावों को अलग-अलग रखा गया है। जहां कोई बात वक्ता का दावा है, वहां उसे तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।
















