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भारत का थोरियम मास्टरप्लान: 70 साल पुरानी परमाणु रणनीति अब क्यों पहुंची निर्णायक मोड़ पर ? कलपक्कम PFBR से थोरियम युग की राह हुई मजबूत

भारत का थोरियम मास्टरप्लान: PFBR से क्यों जुड़ी है 70 साल पुरानी ऊर्जा रणनीति ?

भारत की परमाणु ऊर्जा कहानी केवल बिजली बनाने की कहानी नहीं है। इसके पीछे करीब सात दशक पुरानी ऐसी रणनीति है, जिसका उद्देश्य देश के सीमित यूरेनियम संसाधनों का अधिकतम उपयोग करते हुए धीरे-धीरे थोरियम आधारित परमाणु ऊर्जा चक्र तक पहुंचना है। इस रणनीति को भारत के तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के रूप में जाना जाता है, जिसकी वैचारिक नींव वैज्ञानिक डॉ. होमी जहांगीर भाभा के नेतृत्व में रखी गई थी।

आज इस रणनीति की चर्चा फिर तेज है, क्योंकि अप्रैल 2026 में तमिलनाडु के कलपक्कम स्थित 500 मेगावाट क्षमता वाले Prototype Fast Breeder Reactor यानी PFBR ने First Criticality हासिल की। परमाणु ऊर्जा विभाग के अनुसार, 6 अप्रैल 2026 को रात 8 बजकर 25 मिनट पर PFBR ने नियंत्रित परमाणु विखंडन की श्रृंखला अभिक्रिया की शुरुआत की। यह भारत के तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम के दूसरे चरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धि है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है—First Criticality का अर्थ यह नहीं है कि रिएक्टर तुरंत व्यावसायिक बिजली उत्पादन शुरू कर चुका है या भारत ने थोरियम से बिजली बनाना शुरू कर दिया है। Criticality एक महत्वपूर्ण commissioning milestone है। इसके बाद रिएक्टर को आगे की परीक्षण, power-raising और regulatory प्रक्रियाओं से गुजरना होता है। खुद परमाणु ऊर्जा विभाग ने PFBR के बारे में बताया है कि criticality के बाद बिजली उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ा जाएगा।

आखिर थोरियम इतना महत्वपूर्ण क्यों है ?

भारत के पास थोरियम के बड़े संसाधन हैं, लेकिन थोरियम को सीधे उसी तरह रिएक्टर में ईंधन की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता जैसे fissile uranium-235 को किया जाता है। Thorium-232 एक fertile material है, fissile fuel नहीं। इसका मतलब है कि यह अपने आप निरंतर श्रृंखला अभिक्रिया बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं है।

न्यूट्रॉन को अवशोषित करने के बाद Thorium-232 कई चरणों से गुजरकर Uranium-233 में बदल सकता है। Uranium-233 fissile है और परमाणु ऊर्जा उत्पादन में ईंधन की भूमिका निभा सकता है। भारत की तीन-चरणीय रणनीति इसी वैज्ञानिक चुनौती का समाधान तैयार करती है। BARC के अनुसार, भारत का कार्यक्रम थोरियम को Uranium-233 में बदलने और फिर उस fissile material के इस्तेमाल की दिशा में विकसित किया गया है।

तीन चरणों में कैसे आगे बढ़ता है भारत ?

पहला चरण—PHWR:
पहले चरण में Pressurised Heavy Water Reactors यानी PHWR का इस्तेमाल होता है। इनमें प्राकृतिक यूरेनियम ईंधन के रूप में उपयोग किया जाता है। परमाणु ऊर्जा विभाग के अनुसार, इस चरण से बिजली उत्पादन के साथ-साथ आगे के fuel cycle के लिए जरूरी plutonium प्राप्त किया जाता है।

दूसरा चरण—Fast Breeder Reactor:
दूसरे चरण में इसी plutonium को Uranium-Plutonium Mixed Oxide यानी MOX fuel के साथ fast breeder reactors में इस्तेमाल किया जाता है। PFBR इसी चरण का प्रमुख भारतीय reactor है। इसके core में uranium-plutonium MOX fuel इस्तेमाल होता है और uranium-238 blanket में neutron capture के जरिए plutonium-239 तैयार किया जा सकता है। भविष्य में thorium-232 को blanket के रूप में इस्तेमाल करने की योजना है, जिससे Uranium-233 तैयार किया जा सके।

यही कारण है कि PFBR को भारत के थोरियम कार्यक्रम की दिशा में एक महत्वपूर्ण पुल माना जाता है।

तीसरा चरण—Thorium-based reactors:
तीसरे चरण का उद्देश्य Uranium-233 और Thorium के fuel cycle के जरिए बड़े पैमाने पर थोरियम उपयोग की तकनीक को स्थापित करना है। BARC ने Advanced Heavy Water Reactor यानी AHWR का डिजाइन और विकास इसी उद्देश्य से किया है। AHWR करीब 300 MWe का reactor concept है, जिसमें Thorium-Uranium-233 और Thorium-Plutonium आधारित fuel configurations का इस्तेमाल प्रस्तावित है।

क्या भारत के पास दुनिया का 25 प्रतिशत थोरियम है ?

भारत के थोरियम संसाधनों को लेकर अक्सर यह आंकड़ा सामने आता है कि भारत के पास दुनिया के कुल थोरियम संसाधनों का करीब 25 प्रतिशत है। हाल की एक सरकारी विश्लेषणात्मक सामग्री में भारत के थोरियम संसाधन को लगभग 1.07 मिलियन टन बताया गया है और इसे विश्व संसाधनों का करीब 25 प्रतिशत बताया गया है।

BARC की सामग्री में Atomic Minerals Directorate द्वारा पहचाने गए 12.47 मिलियन टन monazite deposits का उल्लेख है, जिनसे करीब 1 मिलियन टन thorium oxide संबंधित है। यह अंतर महत्वपूर्ण है क्योंकि monazite और thorium एक ही चीज नहीं हैं।

इसी संदर्भ में भारत के थोरियम संसाधनों से लगभग 500 GW बिजली करीब 400 वर्षों तक पैदा करने का अनुमान कई स्रोतों में उद्धृत किया जाता रहा है। लेकिन इसे मौजूदा उपलब्धि या निश्चित भविष्यवाणी के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा। यह अनुमान reactor technology, recoverable resources, fuel-cycle efficiency, reprocessing और भविष्य की बिजली मांग जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है।

2026 में असली बदलाव क्या आया ?

सबसे बड़ा बदलाव यह है कि PFBR ने First Criticality हासिल कर ली है। परमाणु ऊर्जा विभाग के मुताबिक PFBR का डिजाइन और तकनीकी विकास IGCAR ने किया और निर्माण तथा commissioning BHAVINI ने की। परियोजना में 200 से अधिक भारतीय उद्योगों और MSMEs का योगदान भी रहा है।

इसके साथ भारत अब दूसरे चरण की तकनीक को वास्तविक reactor operation के स्तर पर आगे बढ़ा रहा है। सरकार ने Kalpakkam में 2×500 MW Fast Breeder Reactor projects के pre-project activities को भी मंजूरी दी है।

लेकिन चुनौती अभी बाकी है

थोरियम को बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने के लिए केवल थोरियम संसाधन पर्याप्त नहीं हैं। Fuel fabrication, irradiation, reprocessing, Uranium-233 handling और radioactive waste management जैसी तकनीकी चुनौतियां भी हैं। BARC ने विशेष रूप से thorium fuel cycle में reprocessing और Uranium-233 के साथ काम करने की जटिलताओं को रेखांकित किया है।

इसलिए PFBR की सफलता को थोरियम युग की शुरुआत कहने के बजाय इसे थोरियम आधारित दीर्घकालीन परमाणु ऊर्जा व्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण तकनीकी कदम कहना अधिक तथ्यपरक होगा।

साथ ही भारत का मौजूदा nuclear expansion केवल thorium पर निर्भर नहीं है। सरकार ने 2047 तक 100 GW nuclear capacity का लक्ष्य रखा है। फरवरी 2026 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत की मौजूदा nuclear capacity 8.78 GW थी, जबकि 2031-32 तक इसे लगभग 22 GW तक ले जाने और 2047 तक 100 GW तक पहुंचाने का roadmap बनाया गया है।

इस तरह भारत का परमाणु ऊर्जा भविष्य तीन समानांतर धाराओं में आगे बढ़ता दिख रहा है—मौजूदा PHWR क्षमता का विस्तार, Fast Breeder Reactor technology का विकास और भविष्य में thorium-Uranium-233 fuel cycle को व्यावहारिक स्तर तक ले जाना।

निष्कर्ष:
भारत के लिए थोरियम कोई ऐसा ईंधन नहीं है जिसे आज उठाकर रिएक्टर में डालकर बिजली पैदा की जा सके। यह एक लंबी fuel-cycle strategy का हिस्सा है। 2026 में PFBR की First Criticality ने उस रणनीति के दूसरे चरण को एक महत्वपूर्ण operational milestone दिया है। लेकिन तीसरे चरण—बड़े पैमाने पर thorium आधारित बिजली उत्पादन—तक पहुंचने के लिए अभी कई वैज्ञानिक, इंजीनियरिंग, ईंधन-चक्र और नियामकीय कदम बाकी हैं।