वायु और ध्वनि प्रदूषण से लेकर आगजनी और आर्थिक अपव्यय तक, आतिशबाजी पर उठ रहे सवाल; क्या दीयों, सामुदायिक रोशनी और डिजिटल आयोजनों से भी दिवाली /त्योहार की खुशियां बरकरार रखी जा सकती हैं ?
नई दिल्ली | हिंदी विंडो विशेष रिपोर्ट
दिवाली को रोशनी, उल्लास, समृद्धि और नई शुरुआत का त्योहार माना जाता है। भारत में ही नहीं, दुनिया के कई देशों में भी अलग-अलग सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं के साथ यह पर्व मनाया जाता है। घरों में दीपक जलाए जाते हैं, रंगोली बनाई जाती है, मिठाइयां बांटी जाती हैं और परिवार एक-दूसरे के साथ खुशियां साझा करते हैं।
लेकिन दिवाली के साथ जुड़ी आतिशबाजी अब एक महत्वपूर्ण सामाजिक और पर्यावरणीय बहस का विषय बन चुकी है। सवाल यह है कि जिस त्योहार का मूल संदेश अंधकार पर प्रकाश की जीत और सकारात्मकता का प्रसार है, क्या उसे मनाने के लिए बारूद, तेज धमाकों और धुएँ का सहारा लेना आवश्यक है?
पटाखों से निकलने वाला धुआँ, सूक्ष्म कण, रासायनिक अवशेष और तेज आवाज केवल कुछ मिनटों की समस्या नहीं हैं। इनका प्रभाव आसपास के वातावरण, वायु गुणवत्ता, सार्वजनिक स्वास्थ्य और जीव-जंतुओं पर भी पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त आतिशबाजी के कारण आग लगने, जलने और अन्य दुर्घटनाओं का खतरा भी बना रहता है।
ऐसे में यह बहस केवल दिवाली तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह हमारे उत्सव मनाने के तरीके और सार्वजनिक स्थानों के प्रति हमारी जिम्मेदारी से जुड़ा व्यापक प्रश्न है।
1. पटाखों की चमक के पीछे छिपी प्रदूषण की समस्या
पटाखे जलने के दौरान विभिन्न प्रकार के गैसीय उत्सर्जन और सूक्ष्म कण हवा में फैलते हैं। इनमें PM2.5 और PM10 जैसे कण शामिल हो सकते हैं। ये इतने छोटे होते हैं कि सांस के साथ शरीर में प्रवेश कर सकते हैं।
विशेष रूप से दमा और सांस संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों, बुजुर्गों, छोटे बच्चों और पहले से बीमार व्यक्तियों के लिए खराब वायु गुणवत्ता परेशानी बढ़ा सकती है।
पटाखों का प्रभाव केवल हवा तक सीमित नहीं रहता। तेज धमाकों से ध्वनि प्रदूषण बढ़ता है। इससे छोटे बच्चों, बुजुर्गों, अस्पतालों में भर्ती मरीजों और पालतू पशुओं को परेशानी हो सकती है।
आतिशबाजी के बाद सड़कों, गलियों और सार्वजनिक स्थानों पर कागज, प्लास्टिक, तार, गत्ते और जले हुए अवशेष बिखरे दिखाई देते हैं। इन्हें साफ करने की जिम्मेदारी अंततः नगर निकायों और सफाई कर्मचारियों पर आती है।
इसलिए आतिशबाजी के प्रभाव को केवल पटाखा जलने के कुछ सेकंड तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। इसके निर्माण, परिवहन, उपयोग और कचरे के निपटान तक पूरी प्रक्रिया को ध्यान में रखना जरूरी है।

दिवाली पर पटाखे जरूरी हैं ?
2. क्या दिवाली पर पटाखे जलाना धार्मिक अनिवार्यता है ?
इस विषय का एक सांस्कृतिक और धार्मिक पक्ष भी है।
लोकप्रिय धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने की खुशी में लोगों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था। इसी प्रसंग को दिवाली की प्रमुख सांस्कृतिक व्याख्याओं में शामिल किया जाता है।
वाल्मीकि रामायण के अयोध्या आगमन प्रसंग में अयोध्या की सजावट और उत्सव का वर्णन मिलता है। हालांकि, इस प्रसंग में आधुनिक अर्थों में बारूद वाले पटाखों को दिवाली की अनिवार्य धार्मिक परंपरा बताने वाला स्पष्ट आधार प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।
किसी प्राचीन ग्रंथ में किसी प्रथा का उल्लेख न मिलना और उस प्रथा का निषिद्ध होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।
इसी तरह, बाद के साहित्य, लोकपरंपराओं और कुछ धार्मिक रचनाओं में प्रकाश, उत्सव तथा आतिशबाजी से संबंधित संदर्भ मिलने का दावा किया जाता है। लेकिन किसी संदर्भ को सीधे वेदों की अनिवार्य परंपरा या प्राचीन दिवाली का प्रमाण मान लेना भी ऐतिहासिक रूप से सावधानीपूर्ण नहीं होगा।
दिवाली का धार्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग है। कहीं यह श्रीराम के अयोध्या आगमन से जुड़ी है, कहीं माता लक्ष्मी की पूजा से, तो कहीं भगवान महावीर के निर्वाण और अन्य धार्मिक-सांस्कृतिक स्मृतियों से।
इस विविधता को स्वीकार करते हुए इतना कहा जा सकता है कि दीप जलाना और प्रकाश का प्रतीकात्मक महत्व दिवाली की व्यापक पहचान है। बारूद वाले पटाखे जलाना इस त्योहार की सार्वभौमिक धार्मिक अनिवार्यता नहीं है।
3. ग्रीन पटाखे: बेहतर विकल्प, लेकिन प्रदूषण का स्थायी समाधान नहीं
पर्यावरणीय चिंताओं के बीच ग्रीन पटाखों की चर्चा बढ़ी है। भारत में वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद यानी CSIR और राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (NEERI) ने कम उत्सर्जन वाले पटाखों के विकास और परीक्षण से संबंधित काम किया है।
ग्रीन पटाखों का उद्देश्य पारंपरिक पटाखों की तुलना में कुछ हानिकारक उत्सर्जनों और प्रदूषणकारी तत्वों को कम करना है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है।
ग्रीन पटाखे का अर्थ प्रदूषण-मुक्त पटाखा नहीं है।
इनसे भी उत्सर्जन, ध्वनि और कचरा उत्पन्न हो सकता है। इनका वास्तविक पर्यावरणीय प्रभाव उत्पाद के प्रकार, उसकी संरचना, परीक्षण, निर्माण गुणवत्ता और उपयोग की मात्रा पर निर्भर करता है।
इसलिए बाजार में किसी उत्पाद पर केवल ‘इको फ्रेंडली’ या ‘ग्रीन’ लिखा होना उसकी प्रमाणिकता का प्रमाण नहीं है। उपभोक्ताओं को प्रमाणित उत्पाद, वैध बिक्री और लागू सरकारी दिशा-निर्देशों की जांच करनी चाहिए।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ग्रीन पटाखों से 30 से 35 प्रतिशत कम PM2.5 और PM10 उत्सर्जन होने का दावा सभी उत्पादों और सभी परिस्थितियों पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता। ऐसी किसी संख्या को प्रकाशित करने से पहले संबंधित वैज्ञानिक अध्ययन, परीक्षण की परिस्थितियां और तुलना का आधार स्पष्ट होना चाहिए।
4. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और प्रदूषण नियंत्रण की चुनौती
भारत में पटाखों के उपयोग को लेकर न्यायपालिका और विभिन्न सरकारी संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग मामलों में पटाखों के उत्पादन, बिक्री और उपयोग को लेकर पर्यावरण संरक्षण, सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा नागरिकों के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए निर्देश दिए हैं।
कई स्थानों पर ग्रीन पटाखों, बिक्री की अनुमति, समय-सीमा और अन्य शर्तों को लेकर अलग-अलग आदेश और प्रशासनिक व्यवस्थाएं लागू की गई हैं।
हालांकि, पूरे देश के लिए हर साल एक जैसी व्यवस्था मान लेना सही नहीं होगा। दिल्ली-एनसीआर सहित विभिन्न राज्यों और शहरों में लागू नियम अलग हो सकते हैं। इसलिए नागरिकों को अपने क्षेत्र के नवीनतम न्यायिक आदेशों और प्रशासनिक अधिसूचनाओं का पालन करना चाहिए।
5. खुशी मनाना या शक्ति और अहंकार का प्रदर्शन ?
आतिशबाजी की समस्या केवल दिवाली तक सीमित नहीं है।
शादी-विवाह, चुनाव जीतने, राजनीतिक जुलूसों, जन्मदिन और अन्य सार्वजनिक आयोजनों में भी बड़े पैमाने पर पटाखे जलाए जाते हैं। कई बार लाखों रुपये की आतिशबाजी कुछ मिनटों में खत्म हो जाती है और उसके बाद सड़कें जले हुए कागज, पटाखों के अवशेषों और कचरे से भर जाती हैं।
किसी व्यक्ति या समूह की खुशी का सम्मान होना चाहिए, लेकिन क्या सार्वजनिक सड़कों और दूसरे लोगों के स्वास्थ्य की कीमत पर खुशी मनाना उचित है?
जब किसी आयोजन के बाद सफाई कर्मचारियों को घंटों कचरा उठाना पड़े, आसपास के लोगों को धुएँ और शोर का सामना करना पड़े और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचे, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि उत्सव की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
खुशी मनाने और उसका दिखावा करने में अंतर होता है। किसी उत्सव की भव्यता केवल खर्च की गई रकम या धमाकों की संख्या से नहीं मापी जानी चाहिए।
सच्चा उत्सव वह भी हो सकता है जिसमें दूसरों की सुविधा, सुरक्षा और पर्यावरण का ध्यान रखा जाए।
6. ‘दूसरे भी तो करते हैं’—क्या यह सही तर्क है ?
जब भी किसी धार्मिक या सांस्कृतिक परंपरा में सुधार की बात उठती है, तो कुछ लोग सवाल करते हैं कि केवल हिंदू त्योहारों पर ही सलाह क्यों दी जाती है? दूसरे समाजों और समुदायों में भी तो अनेक समस्याएं हैं।
यह सवाल अपने आप में चर्चा के योग्य है, लेकिन इसका उत्तर भी उतना ही स्पष्ट है।
यदि किसी दूसरे समाज में कोई गलत प्रथा है, तो क्या उसके बने रहने से हमारी अपनी गलत प्रथा उचित हो जाती है?
यदि कोई व्यक्ति सड़क पर कचरा फेंकता है, तो क्या दूसरे व्यक्ति के कचरा फेंकने से हमारी जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है?
सामाजिक सुधार का सबसे व्यावहारिक रास्ता स्वयं से शुरुआत करना है। दूसरे की गलती गिनाने से पहले अपनी जिम्मेदारियों को समझना चाहिए।
यही बात हर धर्म, समुदाय, परंपरा और सार्वजनिक आयोजन पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। पर्यावरण संरक्षण किसी एक धर्म या समुदाय का विषय नहीं, बल्कि सभी नागरिकों की साझा जिम्मेदारी है।
इसलिए दिवाली पर आतिशबाजी के प्रभाव पर चर्चा करना हिंदू त्योहार की आलोचना नहीं है। इसी तरह, किसी अन्य त्योहार या आयोजन से होने वाले प्रदूषण पर सवाल उठाना भी किसी समुदाय का विरोध नहीं माना जाना चाहिए।
सुधार का उद्देश्य परंपरा को मिटाना नहीं, बल्कि उसे समय के साथ अधिक जिम्मेदार और मानवीय बनाना होना चाहिए।
7. भारत से दुनिया तक: दिवाली का वैश्विक स्वरूप
नेपाल में दिवाली से जुड़ी परंपराएं तिहार के रूप में दिखाई देती हैं। यहां दीपावली के साथ कौआ, कुत्ता, गाय और भाई-बहन के संबंधों को समर्पित अलग-अलग दिनों की परंपराएं भी जुड़ी हैं।
सिंगापुर और मलेशिया में दीपावली सार्वजनिक सांस्कृतिक आयोजनों, रोशनी और सामुदायिक समारोहों के साथ मनाई जाती है। त्रिनिदाद और टोबैगो तथा फिजी जैसे देशों में भी भारतीय मूल के समुदायों ने इस पर्व को अपनी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बनाया है।
लंदन, न्यूयॉर्क और सिडनी जैसे शहरों में भी दिवाली के सार्वजनिक आयोजन होते हैं। अमेरिका के व्हाइट हाउस में भी दिवाली समारोह आयोजित किए जाते रहे हैं।
इस वैश्विक पहचान से यह संदेश मिलता है कि दिवाली केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संवाद और मानवीय संबंधों को मजबूत करने का माध्यम भी बन चुकी है।
ऐसे में सवाल है कि क्या दुनिया भर में फैल रही इस सांस्कृतिक पहचान को हम पर्यावरण के प्रति अधिक जिम्मेदार उत्सव के रूप में विकसित कर सकते हैं ?
8. दिवाली का आध्यात्मिक संदेश: अंधकार से प्रकाश की ओर
दिवाली की सबसे सुंदर विशेषता उसका प्रतीकात्मक अर्थ है।
दीपक केवल घर को रोशन नहीं करता, बल्कि अज्ञान पर ज्ञान, निराशा पर आशा और नकारात्मकता पर सकारात्मकता की विजय का प्रतीक भी माना जाता है।
उपनिषदों में प्रसिद्ध प्रार्थना है—
‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’
अर्थात् मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।
यह संदेश केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। इसे व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक व्यवहार में भी उतारा जा सकता है।
यदि हम दीप जलाते हुए किसी के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाएं, यदि खुशी मनाते हुए सार्वजनिक स्थानों को गंदा करें और यदि उत्सव के नाम पर अनावश्यक प्रतिस्पर्धा और दिखावे को बढ़ावा दें, तो हमें अपने उत्सव मनाने के तरीके पर विचार जरूर करना चाहिए।
9. पटाखों के विकल्प: खुशियां भी, जिम्मेदारी भी
आज तकनीक ने उत्सव मनाने के कई नए रास्ते उपलब्ध कराए हैं।
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ड्रोन शो: आसमान में रंगीन रोशनी से आकृतियां और संदेश तैयार किए जा सकते हैं।
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लेजर शो: बिना बारूद के आकर्षक दृश्य प्रस्तुत किए जा सकते हैं।
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म्यूजिकल लाइट शो: संगीत और रोशनी का सामूहिक आयोजन किया जा सकता है।
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दीप सज्जा: पारंपरिक मिट्टी के दीयों और सजावटी रोशनी से घरों और सार्वजनिक स्थानों को सुंदर बनाया जा सकता है।
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डिजिटल आतिशबाजी: स्क्रीन और प्रोजेक्शन के माध्यम से पटाखों जैसा दृश्य अनुभव दिया जा सकता है।
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सामाजिक सेवा: पटाखों पर होने वाले खर्च का कुछ हिस्सा जरूरतमंद परिवारों, बच्चों की शिक्षा या सार्वजनिक हित के कामों में लगाया जा सकता है।
हालांकि, इन विकल्पों के भी अपने पर्यावरणीय और आर्थिक पहलू हैं। उदाहरण के लिए ड्रोन शो में बिजली, उपकरणों और संचालन की जरूरत होती है। इसलिए हर विकल्प को उसके वास्तविक प्रभाव के आधार पर देखना चाहिए।
10. परंपरा और पर्यावरण के बीच संतुलन की जरूरत
दिवाली का उद्देश्य खुशियां बांटना है, न कि किसी को परेशानी में डालना।
इसलिए जरूरी है कि आतिशबाजी के विषय पर बहस धार्मिक भावनाओं को आहत करने या किसी समुदाय को निशाना बनाने के बजाय वैज्ञानिक तथ्यों, सामाजिक जिम्मेदारी और नागरिक अधिकारों के आधार पर हो।
यदि कोई व्यक्ति पटाखे नहीं जलाना चाहता, तो उसका निर्णय सम्मानित होना चाहिए। इसी तरह, जो लोग आतिशबाजी करते हैं, उन्हें भी लागू नियमों, सुरक्षा मानकों और दूसरों के अधिकारों का ध्यान रखना चाहिए।
लेकिन एक व्यापक सामाजिक लक्ष्य यह हो सकता है कि हम धीरे-धीरे बारूद और तेज धमाकों पर निर्भर उत्सव संस्कृति से आगे बढ़ें।
क्योंकि दिवाली की पहचान पटाखों के शोर से नहीं, बल्कि दीपों की रोशनी, परिवारों के मिलन, प्रेम, सहयोग और सकारात्मकता से होनी चाहिए।
हिंदी विंडो का सवाल: क्या हम ऐसी दिवाली की कल्पना कर सकते हैं, जहां आसमान रोशनी से जगमगाए, लेकिन हवा धुएँ से न भरे? जहां खुशियां मनाई जाएं, लेकिन किसी की सेहत और सार्वजनिक संपत्ति की कीमत पर नहीं?
शायद यही समय है कि हम त्योहारों को केवल परंपरा के रूप में नहीं, बल्कि अपनी सामाजिक जिम्मेदारी के आईने में भी देखें।
हिंदी विंडो | ‘हिंदी में दुनिया, दुनिया में हिंदी..!’













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