₹2,700 की दवा पर ₹27,000 MRP ! : कैंसर की ₹2,700 वाली दवा पर ₹27,000 MRP! सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मरीजों के साथ ‘दिनदहाड़े डकैती’ जैसी स्थिति, 29 सितंबर को फिर सुनवाई
नई दिल्ली, 25 सितंबर 2026। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान बेहद गंभीर चिंता जताई है। अदालत के सामने ऐसा उदाहरण रखा गया, जिसमें एक कैंसर की दवा का Price to Retailer यानी PTR करीब ₹2,700 बताया गया, जबकि उसी दवा पर Maximum Retail Price यानी MRP ₹27,000 तक दर्ज होने की बात कही गई। यानी रिटेलर तक पहुंचने वाली कीमत और पैक पर छपी अधिकतम खुदरा कीमत के बीच करीब दस गुना अंतर का सवाल सामने आया।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ दवाओं की कीमतों, अनिवार्य जेनेरिक प्रिस्क्रिप्शन और गैर-शेड्यूल्ड दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने से जुड़े मुद्दे पर सुनवाई कर रही थी। इसी दौरान पीठ ने कैंसर की आवश्यक दवाओं में PTR और MRP के बीच इतने बड़े अंतर पर सवाल उठाया। रिपोर्टों के मुताबिक, जस्टिस संदीप मेहता ने इस तरह की स्थिति को मरीजों के संदर्भ में “broad daylight dacoity” यानी दिनदहाड़े डकैती जैसी स्थिति बताया। यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह अदालत की सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणी है; इसे किसी कंपनी या पूरे फार्मा उद्योग के खिलाफ अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।
₹2,700 से ₹27,000 तक कैसे पहुंचती है कीमत ?
इस मामले में एक अहम अंतर समझना जरूरी है। PTR यानी Price to Retailer वह कीमत है जिस पर दवा निर्माता या सप्लाई चैन का संबंधित स्तर दवा रिटेलर को उपलब्ध कराता है। दूसरी ओर MRP यानी Maximum Retail Price वह अधिकतम खुदरा कीमत है जो पैकेज पर अंकित होती है और जिसके भीतर ग्राहक से कीमत ली जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल यही था कि अगर किसी जीवनरक्षक दवा की ट्रेड कीमत लगभग ₹2,700 है, तो उसकी MRP ₹27,000 तक क्यों हो सकती है और इस अंतर का नियमन किस तरह किया जाता है। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि आवश्यक और जीवनरक्षक दवाओं के मामले में मरीजों पर इतनी बड़ी कीमत का बोझ किस हद तक उचित है।
DPCO-2013 और नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं का मुद्दा
सुनवाई में याचिकाकर्ता की ओर से Drugs (Prices Control) Order, 2013 यानी DPCO-2013 से जुड़े प्राइस-कंट्रोल ढांचे पर भी सवाल उठाए गए। याचिकाकर्ता किशन चंद जैन की ओर से अदालत को बताया गया कि बाजार में बड़ी संख्या में दवाएं ऐसी हैं जो DPCO की शेड्यूल्ड श्रेणी में नहीं आतीं। रिपोर्टों के अनुसार, याचिकाकर्ता ने करीब 82 प्रतिशत दवाओं के नॉन-शेड्यूल्ड होने का दावा किया।
यहां एक महत्वपूर्ण बात है—82 प्रतिशत का आंकड़ा सुनवाई में याचिकाकर्ता की ओर से प्रस्तुत दावा है, जिसे अंतिम सरकारी या न्यायिक निष्कर्ष के रूप में नहीं लिखा जाना चाहिए। इसी तरह, इस मामले में अदालत अभी यह तय नहीं कर चुकी है कि मौजूदा मूल्य-नियमन व्यवस्था असंवैधानिक है या किस तरह बदली जानी चाहिए।
मुद्दा मुख्य रूप से यह है कि जिन दवाओं पर सीलिंग प्राइस व्यवस्था लागू नहीं होती, उनके initial price fixation यानी बाजार में लॉन्च के समय शुरुआती कीमत को लेकर किस प्रकार की नियामकीय व्यवस्था होनी चाहिए।
सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं पर भी सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने यह चिंता भी जताई कि अगर किसी सरकारी स्वास्थ्य योजना के तहत दवा की लागत MRP के आधार पर अधिक दर पर रीइम्बर्स होती है, तो इसका असर सार्वजनिक धन पर पड़ सकता है। सुनवाई में आयुष्मान भारत जैसी स्वास्थ्य योजनाओं के संदर्भ में भी कीमतों के प्रभाव पर सवाल उठाए गए।
हालांकि, इस बिंदु को भी व्यापक निष्कर्ष की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। अदालत फिलहाल यह समझने की कोशिश कर रही है कि दवा की कीमत तय होने से लेकर मरीज तक पहुंचने और सरकारी योजना से भुगतान होने तक पूरी मूल्य-श्रृंखला में कौन-कौन से अंतर और नियामकीय प्रश्न मौजूद हैं।
फार्मा उद्योग की ओर से क्या कहा गया ?
सुनवाई में इंडियन फार्मास्यूटिकल अलायंस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत के सामने यह तर्क रखा कि पैकेज पर MRP और रिटेलर को मिलने वाली कीमत के बीच का पूरा अंतर जरूरी नहीं कि दवा निर्माता के पास ही जाए। उनके अनुसार, कीमतों की पूरी श्रृंखला में स्टॉकिस्ट और रिटेलर सहित विभिन्न स्तर शामिल होते हैं।
केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने किफायती दवाओं की उपलब्धता के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता बताई और प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना (PMBJP) का भी संदर्भ दिया।
जेनेरिक दवाओं पर भी बहस
इस मामले की एक दूसरी महत्वपूर्ण कड़ी जेनेरिक दवाओं की अनिवार्य प्रिस्क्रिप्शन से जुड़ी है। जेनेरिक दवा सामान्यतः किसी सक्रिय औषधीय घटक के स्वीकृत/गैर-ब्रांड नाम के तहत उपलब्ध होती है। भारत सरकार की जनऔषधि परियोजना का उद्देश्य ही कम कीमत पर गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराना और लोगों के बीच यह धारणा कम करना है कि कम कीमत की दवा जरूरी तौर पर कम प्रभावी या निम्न गुणवत्ता की होती है।
सरकारी PMBJP FAQ के अनुसार, जनऔषधि के तहत उपलब्ध जेनेरिक दवाओं की प्रभावकारिता और चिकित्सीय मूल्य ब्रांडेड विकल्पों के समान बताए गए हैं। परियोजना के तहत दवाओं के बैचों को NABL-मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में परीक्षण किए जाने की व्यवस्था भी बताई गई है।
लेकिन यहां भी एक जरूरी सावधानी है। किसी मरीज को अपनी ब्रांडेड दवा स्वयं बदलकर जेनेरिक दवा शुरू नहीं करनी चाहिए। दवा का सक्रिय घटक, डोज, formulation, route, रोग की स्थिति और मरीज की अन्य दवाओं के साथ संभावित interactions को देखते हुए डॉक्टर या योग्य फार्मासिस्ट की सलाह महत्वपूर्ण है। खासकर कैंसर जैसी जटिल बीमारी में दवा बदलने का निर्णय उपचार कर रहे विशेषज्ञ से चर्चा करके ही किया जाना चाहिए।
जनऔषधि नेटवर्क का विस्तार
सरकार के अनुसार, 30 जून 2026 तक देश में 20,149 जनऔषधि केंद्र खोले जा चुके थे। सरकार ने जुलाई 2026 में बताया कि पिछले 12 वर्षों में ब्रांडेड दवाओं की तुलना में कम कीमतों के कारण नागरिकों को अनुमानित करीब ₹45,000 करोड़ की बचत हुई है। यह सरकारी अनुमान है, स्वतंत्र न्यायिक निष्कर्ष नहीं।
सरकारी जानकारी के मुताबिक, PMBJP के उत्पाद बास्केट में कैंसररोधी दवाएं समेत कई प्रमुख therapeutic categories शामिल हैं और मार्च 2026 तक योजना में करीब 2,110 दवाएं तथा 315 surgical/medical consumables और devices शामिल बताए गए थे।
आगे क्या होगा ?
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को आगे की सुनवाई के लिए 29 सितंबर 2026 को सूचीबद्ध किया है। आगे की सुनवाई में दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने की व्यवस्था, नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं के मूल्य-नियमन और जेनेरिक दवाओं से संबंधित मांगों पर पक्षों की दलीलें सामने आ सकती हैं।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि जीवनरक्षक दवाओं की कीमत में निर्माता से मरीज तक पहुंचने के दौरान कितना अंतर स्वीकार्य होना चाहिए और क्या मौजूदा नियामकीय व्यवस्था उस अंतर को पर्याप्त रूप से नियंत्रित करती है।
हिंदी विंडो की संपादकीय टिप्पणी: कैंसर जैसी बीमारी में दवा की कीमत केवल आर्थिक मुद्दा नहीं है। मरीज और परिवार इलाज के दौरान अक्सर भारी वित्तीय दबाव झेलते हैं। इसलिए कीमत, गुणवत्ता, उपलब्धता और दवा की चिकित्सीय उपयुक्तता—इन चारों पहलुओं पर पारदर्शिता जरूरी है। जेनेरिक दवाओं के प्रति भरोसा बढ़ाने के साथ-साथ गुणवत्ता परीक्षण और डॉक्टर की सलाह को भी उतना ही महत्व देना आवश्यक है।












