UPSC के 100 साल : ‘नागरिक देवो भव’ और ‘Nation First-Citizen First’ पर PM मोदी का जोर
प्रधानमंत्री ने कहा—पुराने ‘माई-बाप’ रवैये से आगे बढ़कर नागरिक-केंद्रित प्रशासन की जरूरत, बदलते भारत के लिए सिविल सेवाओं में समय के साथ सुधार जरूरी
नई दिल्ली, 1 अक्टूबर 2026। संघ लोक सेवा आयोग यानी UPSC ने 1 अक्टूबर 2026 को अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे कर लिए। इस अवसर पर नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित शताब्दी समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिस्सा लिया और सिविल सेवाओं की भूमिका, प्रशासनिक सुधार तथा भविष्य के भारत की जरूरतों पर अपने विचार रखे। प्रधानमंत्री ने प्रशासन के लिए ‘Nation First, Citizen First’ और ‘नागरिक देवो भव’ जैसे सिद्धांतों पर जोर दिया।
UPSC की शताब्दी का यह समारोह एक साल तक चले कार्यक्रमों की परिणति है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार शताब्दी वर्ष की शुरुआत 1 अक्टूबर 2025 को हुई थी और यह 1 अक्टूबर 2026 तक चला। 1 अक्टूबर 1926 को भारत में पहली Public Service Commission की स्थापना हुई थी। बाद में 1937 में इसका नाम Federal Public Service Commission और संविधान लागू होने के बाद 26 जनवरी 1950 को इसे Union Public Service Commission यानी UPSC के रूप में स्थापित किया गया।
प्रधानमंत्री ने क्या कहा ?
समारोह में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि UPSC के 100 वर्ष पूरे होना केवल किसी संस्थान की लंबी यात्रा का अवसर नहीं है, बल्कि यह उन लाखों युवाओं की आकांक्षाओं और देशवासियों के उस भरोसे से भी जुड़ा है, जो सिविल सेवाओं में भर्ती की इस व्यवस्था से जुड़े हैं। उन्होंने बदलती परिस्थितियों के अनुरूप सिविल सेवा भर्ती और प्रशासनिक व्यवस्था में समय-समय पर सुधार की जरूरत पर बल दिया।
प्रधानमंत्री ने प्रशासन के पुराने ‘माई-बाप’ दृष्टिकोण से अलग नागरिक-केंद्रित व्यवस्था की बात रखी। उनके अनुसार शासन का मूल उद्देश्य नागरिक की सेवा होना चाहिए। इसी संदर्भ में उन्होंने ‘नागरिक देवो भव’ का मंत्र दोहराया और कहा कि नागरिक की सेवा सर्वोपरि होनी चाहिए। यह विचार प्रधानमंत्री द्वारा पहले भी सिविल सेवा दिवस के अवसर पर व्यक्त किया जा चुका है।
प्रधानमंत्री ने अधिकारियों और सिविल सेवा में आने वाले युवाओं के लिए दो कसौटियों—‘Nation First’ और ‘Citizen First’—का उल्लेख किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि प्रशासनिक निर्णयों में देशहित और नागरिकों की जरूरतों को प्रमुखता मिलनी चाहिए।
बदलते भारत के लिए बदलती सिविल सेवा
प्रधानमंत्री ने भविष्य की प्रशासनिक चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि 2047 तक भारत की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में महत्वपूर्ण बदलाव आएगा। ऐसे में सिविल सेवाओं को भी बदलते समय और नागरिकों की बढ़ती अपेक्षाओं के अनुरूप खुद को तैयार करना होगा।
DD India की समारोह संबंधी रिपोर्ट के अनुसार प्रधानमंत्री ने 21वीं सदी के कार्य-संस्कृति के तीन पहलुओं—Pro-People, Pro-Active और Good Governance—पर जोर दिया। उन्होंने सिविल सेवकों से संवेदनशील और सक्रिय रहते हुए जटिल समस्याओं के समाधान के लिए नए तरीकों पर काम करने की अपेक्षा जताई।
उन्होंने यह भी कहा कि प्रशासन को यह समझना चाहिए कि कानूनों और सरकारी निर्णयों का आम नागरिक के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। इसका उद्देश्य केवल नियमों का पालन कराना नहीं, बल्कि नागरिकों के लिए व्यवस्था को अधिक सुगम और उत्तरदायी बनाना भी है।
AI और नई तकनीक की चुनौती
आज प्रशासनिक व्यवस्था तेजी से तकनीक आधारित हो रही है। नागरिकों की अपेक्षाएं भी बदल रही हैं। ऑनलाइन सेवाओं, डिजिटल प्लेटफॉर्म और कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI के बढ़ते इस्तेमाल के बीच सरकारी तंत्र से तेज और प्रभावी प्रतिक्रिया की अपेक्षा बढ़ी है।
UPSC भी भर्ती और परीक्षा प्रणाली में तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ा रहा है। 2026 की सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा के संदर्भ में UPSC के आधिकारिक रिकॉर्ड में परीक्षा से जुड़ी डिजिटल प्रक्रियाओं और व्यवस्थाओं का उल्लेख मिलता है।
शताब्दी समारोह के दौरान परीक्षा और भर्ती प्रणाली को भविष्य के लिए तैयार करने पर भी चर्चा हुई। PIB के अनुसार समारोह के पहले दिन आयोजित ‘शताब्दी समारोह–मंथन’ में सार्वजनिक प्रशासन, नवाचार और सिविल सेवाओं के बदलते स्वरूप पर विचार-विमर्श किया गया। UPSC अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार ने आयोग की अगली यात्रा के लिए Trust, Transparency और Technology को प्रमुख मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में रेखांकित किया।
UPSC की शताब्दी और संस्थागत यात्रा
UPSC भारत में केंद्र सरकार की विभिन्न सेवाओं के लिए भर्ती परीक्षाओं का आयोजन करने वाली संवैधानिक संस्था है। आयोग की परीक्षा व्यवस्था में Civil Services Examination के अलावा Engineering Services, Combined Defence Services, National Defence Academy एवं Naval Academy, Combined Medical Services और Central Armed Police Forces जैसी परीक्षाएं भी शामिल हैं।
UPSC की शताब्दी के मौके पर प्रधानमंत्री ने एक स्मारक सिक्का, डाक टिकट और ‘100 Landmark Judgements – Shaping the Policies of UPSC and Public Service Commissions in India’ नामक पुस्तक जारी की। यह कार्यक्रम 30 सितंबर और 1 अक्टूबर को आयोजित दो दिवसीय समारोह का हिस्सा था।
‘नागरिक देवो भव’ का प्रशासनिक अर्थ
‘नागरिक देवो भव’ को प्रधानमंत्री ने नागरिक-केंद्रित शासन की अवधारणा के रूप में प्रस्तुत किया है। इससे पहले 17वें सिविल सेवा दिवस के अवसर पर भी उन्होंने सिविल सेवकों से संवेदनशील रहने, गरीबों की आवाज सुनने और उनकी समस्याओं को प्राथमिकता देने की बात कही थी। उस अवसर पर उन्होंने सिविल सेवकों को केवल प्रशासक नहीं बल्कि विकसित भारत के निर्माण में भूमिका निभाने वाले ‘शिल्पकार’ के रूप में कार्य करने का आह्वान किया था।
यहां यह अंतर स्पष्ट करना जरूरी है कि ‘माई-बाप’ प्रशासन से ‘नागरिक-केंद्रित प्रशासन’ की ओर बदलाव और ‘नागरिक देवो भव’ प्रधानमंत्री द्वारा व्यक्त प्रशासनिक दृष्टिकोण हैं। इनका वास्तविक प्रभाव सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता, जवाबदेही, पहुंच और नागरिकों के अनुभव जैसे व्यावहारिक परिणामों से आंका जा सकता है।
UPSC के अगले 100 वर्षों के लिए क्या चुनौती ?
UPSC की शताब्दी ऐसे समय में आई है जब सरकारी सेवाओं के सामने पारंपरिक प्रशासन से अलग कई नई चुनौतियां हैं। AI और डिजिटल तकनीक, जलवायु परिवर्तन, तेजी से शहरीकरण, साइबर सुरक्षा, सूचना के तेज प्रवाह और नागरिकों की बढ़ती अपेक्षाएं प्रशासनिक तंत्र से नए कौशल की मांग कर रही हैं।
ऐसे माहौल में भर्ती प्रक्रिया का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करने वाले उम्मीदवारों का चयन करना नहीं, बल्कि ऐसे लोक सेवकों की पहचान करना भी है जो बदलती परिस्थितियों में निर्णय ले सकें, तकनीक को समझ सकें और नागरिकों की समस्याओं के समाधान के लिए प्रभावी तरीके विकसित कर सकें।
UPSC की शताब्दी समारोह की चर्चाओं में भी भविष्य के लिए मेरिट, निष्पक्षता, समान अवसर, परीक्षा की विश्वसनीयता, तकनीकी नवाचार और भविष्य के अनुरूप सिविल सेवाओं जैसे विषय प्रमुख रहे।
निष्कर्ष
UPSC के 100 वर्ष भारतीय लोक सेवा व्यवस्था की एक लंबी संस्थागत यात्रा को दर्शाते हैं। शताब्दी समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संदेश मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित रहा कि भविष्य की सिविल सेवा बदलते भारत की जरूरतों के अनुरूप हो और प्रशासन का केंद्र नागरिक रहे।
‘Nation First, Citizen First’ और ‘नागरिक देवो भव’ के जरिए प्रधानमंत्री ने लोक सेवकों के लिए देशहित, नागरिक सेवा और उत्तरदायी प्रशासन को प्रमुख कसौटियों के रूप में रेखांकित किया। अब UPSC के सामने अगली शताब्दी की चुनौती यह होगी कि वह अपनी संवैधानिक विश्वसनीयता और मेरिट आधारित चयन की परंपरा को बनाए रखते हुए तकनीक और बदलती प्रशासनिक जरूरतों के अनुरूप किस तरह विकसित होता है।












