गोवा की स्वर्णकारी पर बनी कोंकणी डॉक्यूमेंट्री :
‘Bhaangar: Kalakusar Karigiri’ में सोने के आभूषणों से आगे उस हुनर, परंपरा और पीढ़ियों के ज्ञान की कहानी, जिसे बदलते समय में बचाने की चुनौती !
देहरादून। गोवा को आमतौर पर समुद्र तटों, पर्यटन, नाइटलाइफ और पुर्तगाली स्थापत्य की पहचान से देखा जाता है। लेकिन इसी परिचित तस्वीर के पीछे एक ऐसा सांस्कृतिक संसार भी मौजूद है, जिसकी पहचान पारंपरिक पेशों, हस्तशिल्प और पीढ़ियों से चले आ रहे हुनर से होती है। इसी कम चर्चित सांस्कृतिक पक्ष को सामने लाने वाली कोंकणी डॉक्यूमेंट्री ‘Bhaangar: Kalakusar Karigiri’ ने 11वें देहरादून इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल 2026 में दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया।
गोवा की स्वर्णकारी पर बनी फिल्म का निर्देशन गोवा की युवा फिल्ममेकर प्राची शिरोडकर ने किया है। उपलब्ध फिल्म विवरणों के अनुसार उन्होंने फिल्म की शूटिंग और नैरेशन भी किया, जबकि एडिटिंग का जिम्मा मारियो पिमेंटा ने संभाला। यह डॉक्यूमेंट्री गोवा के पारंपरिक स्वर्णकार समुदाय के काम, तकनीक, कारीगरी और उससे जुड़े सामाजिक-सांस्कृतिक अनुभवों को दर्ज करती है। फिल्म में राशिला शिरोडकर, वीरेंद्र रिवांकर और प्रणय शिरोडकर जैसे कारीगरों की भागीदारी बताई गई है।
फिल्म की खासियत सिर्फ यह नहीं है कि इसमें सोने के आभूषण बनाने की प्रक्रिया दिखाई जाती है। इसका व्यापक विषय उस पारंपरिक ज्ञान की निरंतरता है, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता रहा है। हाथ से काम करने की बारीक तकनीक, औजारों का इस्तेमाल, डिजाइन की समझ और धातु को आभूषण का रूप देने की प्रक्रिया—ये सभी पहलू उस शिल्प परंपरा का हिस्सा हैं, जिसे आधुनिक तकनीक और बदलती उपभोक्ता पसंद के बीच अपने अस्तित्व को बनाए रखने की चुनौती है।
फिल्म का निर्माण एक शैक्षणिक परियोजना के रूप में हुआ था। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक यह प्रोजेक्ट Don Bosco College, Panjim में Mass Communication की पढ़ाई के दौरान तैयार किया गया और अग्नेलो डी’सूजा के मार्गदर्शन में विकसित हुआ। बाद में यह कॉलेज प्रोजेक्ट एक स्वतंत्र डॉक्यूमेंट्री के रूप में विभिन्न फिल्म समारोहों तक पहुंचा।
‘Bhaangar: Kalakusar Karigiri’ की यात्रा देहरादून तक सीमित नहीं रही है। जनवरी 2026 में फिल्म का International Folklore Film Festival, Kerala के लिए चयन होने की रिपोर्ट सामने आई थी। उस रिपोर्ट के अनुसार सैकड़ों राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय शॉर्ट फिल्मों के बीच यह चयनित फिल्मों में शामिल थी। इसके अलावा जून 2026 में फिल्म के International Cultural Journal Award 2026, Ukraine के लिए चयन की भी जानकारी सामने आई।
सितंबर 2026 में प्रकाशित एक अन्य रिपोर्ट में फिल्म को यूक्रेन में सांस्कृतिक संदर्भ वाले प्रदर्शन से जोड़ा गया और बताया गया कि इसका उद्देश्य गोवा की पारंपरिक स्वर्णकारी समुदाय की कारीगरी और विरासत को दस्तावेजित करना है। इससे यह संकेत मिलता है कि फिल्म का विषय स्थानीय होने के बावजूद उसकी सांस्कृतिक प्रासंगिकता व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंच रही है।
देहरादून में फिल्म का प्रदर्शन ऐसे समय हुआ जब 11वां Dehradun International Film Festival 2 से 4 अक्टूबर 2026 तक आयोजित किया गया। आधिकारिक DIFF वेबसाइट के अनुसार यह आयोजन फिल्मों, नए प्रतिभाशाली फिल्मकारों और सिनेमा से जुड़े विभिन्न रचनात्मक कार्यक्रमों को मंच देता है। Tulas University ने भी 2 अक्टूबर को DIFF 2026 के आयोजन को अपने कार्यक्रमों में दर्ज किया है।
फेस्टिवल के दूसरे दिन Tulas University में फिल्म और मनोरंजन जगत से जुड़े कई कलाकारों की मौजूदगी रही। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक वहां संवाद सत्रों में हिटेन तेजवानी, गौरी प्रधान तेजवानी, मुकेश ऋषि, राजेश तैलंग, दीपक पाराशर, श्वेता त्रिपाठी और अन्य कलाकारों ने भाग लिया।
इस पूरी कहानी का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि डॉक्यूमेंट्री ने गोवा की एक ऐसी पहचान को सामने रखा, जो पर्यटन-केंद्रित छवि के पीछे अक्सर दब जाती है। स्वर्णकारी केवल आभूषण निर्माण का व्यवसाय नहीं, बल्कि तकनीकी कौशल, पारिवारिक परंपरा और सांस्कृतिक स्मृति से जुड़ा हुआ शिल्प है। यही कारण है कि ऐसे दस्तावेजी प्रयास किसी पेशे या समुदाय का केवल दृश्य रिकॉर्ड नहीं बनाते, बल्कि बदलते सामाजिक और आर्थिक परिवेश में उसकी स्थिति को समझने का माध्यम भी बनते हैं।
‘Bhaangar: Kalakusar Karigiri’ के संदर्भ में यह भी महत्वपूर्ण है कि फिल्म किसी बड़े व्यावसायिक प्रोडक्शन से नहीं, बल्कि एक शैक्षणिक परियोजना से विकसित होकर फिल्म फेस्टिवल के मंचों तक पहुंची। यह यात्रा युवा फिल्मकारों के लिए भी संकेत देती है कि स्थानीय इतिहास, लोककला और पारंपरिक व्यवसायों पर केंद्रित कहानियां व्यापक दर्शकों तक पहुंच सकती हैं—यदि उन्हें संवेदनशील और दस्तावेजी दृष्टि से प्रस्तुत किया जाए।
देहरादून में इसकी स्क्रीनिंग इसलिए भी उल्लेखनीय रही कि उत्तराखंड के सांस्कृतिक परिवेश में आयोजित एक फिल्म समारोह के मंच पर गोवा की एक पारंपरिक कारीगरी की कहानी पहुंची। सिनेमा ने यहां केवल मनोरंजन का माध्यम बनने के बजाय दो अलग भौगोलिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों के बीच संवाद का काम किया।
गोवा की पारंपरिक स्वर्णकारी से जुड़ी यह डॉक्यूमेंट्री आखिरकार एक व्यापक सवाल छोड़ती है—जब तकनीक और बाजार तेजी से बदल रहे हों, तब पीढ़ियों से चले आ रहे पारंपरिक हुनर को अगली पीढ़ी तक कैसे पहुंचाया जाए ? ‘Bhaangar: Kalakusar Karigiri’ इसी सवाल को कारीगरों के अनुभवों और उनकी कारीगरी के माध्यम से दर्ज करने का प्रयास करती है।













