शरद पूर्णिमा : गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के त्रिवेणी संगम पर धार्मिक अनुष्ठानों की परंपरा; खीर, चंद्रमा और मां लक्ष्मी की पूजा से जुड़ी मान्यताओं का विशेष महत्व।
प्रयागराज | हिंदी विंडो संवाददाता
शरद पूर्णिमा के अवसर पर उत्तर प्रदेश के प्रयागराज स्थित त्रिवेणी संगम पर श्रद्धालुओं की आवाजाही की खबर है। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के धार्मिक संगम के रूप में प्रसिद्ध इस तीर्थस्थल पर श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाने और पूजा-अर्चना के लिए पहुंच रहे हैं। स्थानीय रिपोर्ट के मुताबिक, सुबह के समय से ही संगम क्षेत्र में धार्मिक गतिविधियां शुरू हो गईं।
शरद पूर्णिमा हिंदू पंचांग के अश्विन महीने की पूर्णिमा को मनाई जाती है। इस वर्ष पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर 2026 को सुबह लगभग 11:56 बजे शुरू होकर 26 अक्टूबर की सुबह लगभग 9:41 बजे तक रहने की जानकारी पंचांग स्रोतों में दी गई है। इस कारण पर्व की प्रमुख धार्मिक परंपराएं 25 अक्टूबर की रात से जुड़ी हैं, जबकि पूर्णिमा तिथि अगले दिन सुबह तक जारी रहती है।
संगम स्नान और पूजा-अर्चना की परंपरा
शरद पूर्णिमा पर गंगा स्नान, दान और पूजा-अर्चना को विशेष धार्मिक महत्व दिया जाता है। श्रद्धालु पवित्र नदी में स्नान के बाद परिवार की सुख-समृद्धि, आरोग्य और कल्याण की कामना करते हैं। प्रयागराज का त्रिवेणी संगम धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र है, जहां विभिन्न पर्वों और स्नान अवसरों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
हालांकि, इस अवसर पर संगम पहुंचे लोगों की सटीक संख्या बताने वाला कोई सत्यापित प्रशासनिक आंकड़ा उपलब्ध सामग्री में नहीं दिया गया है। इसलिए श्रद्धालुओं की संख्या को लेकर किसी निश्चित आंकड़े का दावा नहीं किया जा रहा है।
शरद पूर्णिमा पर खीर रखने की मान्यता
शरद पूर्णिमा से जुड़ी प्रमुख परंपराओं में रात के समय खीर बनाकर उसे चंद्रमा की रोशनी में रखने की परंपरा शामिल है। धार्मिक मान्यता है कि पूर्णिमा की चांदनी में रखी खीर को अगले दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण करना शुभ माना जाता है। कई परिवार इस अवसर पर मां लक्ष्मी और चंद्रमा की पूजा भी करते हैं।
धार्मिक परंपराओं में शरद पूर्णिमा की रात को विशेष आध्यात्मिक महत्व दिया गया है। कुछ मान्यताओं के अनुसार, इस रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है और उसकी किरणों को अमृत के समान माना जाता है। ये आस्थागत मान्यताएं हैं; खीर पर चांदनी पड़ने से औषधीय गुण बढ़ने या बीमारियां दूर होने के दावों को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं समझना चाहिए।

प्रयागराज के संगम में पवित्र स्नान करते लोग – Photo Credit:PTI
श्रद्धालुओं के लिए पर्व का महत्व
संगम में स्नान के साथ श्रद्धालु धार्मिक अनुष्ठानों, प्रार्थना और दान के माध्यम से पर्व मनाते हैं। तीर्थ पुरोहितों की परंपरागत व्याख्या में शरद पूर्णिमा को सुख-समृद्धि, परिवार के कल्याण और आरोग्य की कामना से जोड़ा जाता है।
प्रयागराज में पर्व के दौरान आने वाले श्रद्धालुओं को स्थानीय प्रशासन की ओर से जारी यातायात, सुरक्षा और स्नान संबंधी निर्देशों का पालन करना चाहिए। नदी में उतरते समय निर्धारित सुरक्षित स्थानों का उपयोग करना और बच्चों तथा बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखना भी जरूरी है।
शरद पूर्णिमा भारतीय धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं में चंद्रमा, पूजा-अर्चना और सामूहिक आस्था से जुड़ा पर्व है। प्रयागराज का संगम इस अवसर पर श्रद्धालुओं के लिए विशेष धार्मिक आकर्षण बना हुआ है।
संपादकीय तथ्य-जांच नोट: पर्व की तिथि और पूर्णिमा तिथि के समय की ऑनलाइन पंचांग स्रोतों से जांच की गई है। श्रद्धालुओं की सटीक संख्या, प्रशासनिक व्यवस्थाओं और स्थल पर मौजूद भीड़ के स्वतंत्र सत्यापन के बिना कोई निश्चित दावा नहीं किया गया है।
Note : पंचांग के अनुसार, इस वर्ष पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर को सुबह लगभग 11 बजकर 56 मिनट से शुरू होकर 26 अक्टूबर की सुबह लगभग 9 बजकर 41 मिनट तक रहेगी।
ध्यान रहे, धार्मिक मान्यताओं और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्यों के बीच अंतर करना जरूरी है।
फिलहाल, संगम पर श्रद्धालुओं की कुल संख्या का कोई स्वतंत्र रूप से सत्यापित आंकड़ा इस रिपोर्ट के लिए उपलब्ध नहीं है।
हिंदी विंडो | हिंदी में दुनिया, दुनिया में हिंदी…!












