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दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: ₹2,700 की कैंसर दवा का MRP ₹27,000 कैसे? सरकार से मांगा जवाब

'₹2,700 की कैंसर दवा का MRP ₹27,000 कैसे ?' - सुप्रीम कोर्ट

कैंसर की दवाओं पर 30% व्यापार मार्जिन सीमा का मुद्दा उठा; सुप्रीम कोर्ट ने पूछा—नियंत्रण सिर्फ कैंसर की दवाओं तक सीमित क्यों, दूसरी दवाओं और मेडिकल उपकरणों पर भी क्या जरूरी नहीं ?

हिंदी विंडो | स्वास्थ्य एवं जनहित डेस्क

नई दिल्ली। भारत में दवाओं की कीमतों और मरीजों पर बढ़ते इलाज के खर्च को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से महत्वपूर्ण सवाल किए हैं। अदालत ने दवाओं की उस कीमत पर चिंता जताई, जिस पर वे खुदरा विक्रेताओं को उपलब्ध होती हैं, और पैकेट पर छपी अधिकतम खुदरा कीमत यानी MRP के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है। इस मुद्दे ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया है कि जीवनरक्षक दवाओं की कीमतें तय करने की मौजूदा व्यवस्था आम मरीजों को कितनी राहत दे पा रही है।

29 सितंबर 2026 की सुनवाई से जुड़ी मीडिया रिपोर्टों में एक कैंसर की दवा का उदाहरण सामने आया। रिपोर्टों के अनुसार, दवा की कीमत खुदरा विक्रेता के लिए लगभग 2,700 रुपये बताई गई, जबकि उसका MRP लगभग 27,000 रुपये था। अदालत ने इस तरह के अंतर पर गंभीर चिंता जताई और केंद्र से पूछा कि सभी दवाओं के लिए खुदरा विक्रेता की कीमत से आगे अधिकतम 16 प्रतिशत तक का एक समान मार्जिन तय करने की संभावना पर विचार क्यों नहीं किया जाना चाहिए।

यहां एक जरूरी अंतर समझना चाहिए। खुदरा विक्रेता के लिए कीमत और दवा की वास्तविक उत्पादन लागत एक ही चीज नहीं हैं। इसी तरह, पैकेट पर छपा MRP वह अधिकतम कीमत है जिस पर उत्पाद बेचा जा सकता है; जरूरी नहीं कि हर मरीज वास्तव में उतनी ही कीमत चुकाए। फिर भी, जब इन दोनों आंकड़ों के बीच बहुत बड़ा अंतर सामने आता है, तो मूल्य निर्धारण, वितरण व्यवस्था और मरीजों के हितों की जांच जरूरी हो जाती है।

12 अक्टूबर की सुनवाई में क्या हुआ ?

12 अक्टूबर 2026 को हुई अगली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि दवाओं पर मूल्य नियंत्रण की व्यवस्था केवल कैंसर की दवाओं तक सीमित क्यों रहे। अदालत ने यह भी पूछा कि जब मरीजों को कई तरह की जरूरी दवाओं की जरूरत होती है, तब दूसरी दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों पर नियंत्रण की व्यापक समीक्षा क्यों नहीं की जानी चाहिए।

केंद्र सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर व्यापार मार्जिन को अधिकतम खुदरा मूल्य के 30 प्रतिशत तक सीमित करने का कदम उठाया गया है। लेकिन अदालत ने इस कदम के दायरे पर सवाल उठाए और यह जानना चाहा कि अधिक कीमतों की समस्या का समाधान केवल एक श्रेणी की दवाओं तक सीमित रखने से कैसे होगा।

यह सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दवा की कीमत केवल निर्माता और ग्राहक के बीच का मामला नहीं है। इसमें वितरक, थोक विक्रेता, खुदरा विक्रेता, अस्पताल की फार्मेसी और कभी-कभी सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत होने वाले भुगतान भी शामिल होते हैं। कीमत में अंतर कहां बनता है और उसका लाभ किसे मिलता है, यह समझना मरीजों के हित में जरूरी है।

भारत में दवाओं की कीमतें कैसे तय होती हैं ?

भारत में दवाओं की कीमतों के नियमन में राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह प्राधिकरण दवाओं की कीमतें तय करने, निर्धारित मूल्य सीमा लागू कराने और बाजार में कीमतों की निगरानी करने का काम करता है।

ड्रग्स (प्राइस कंट्रोल) ऑर्डर, 2013 यानी DPCO, 2013 के तहत अनुसूचित दवाओं के लिए सरकार अधिकतम कीमत यानी सीलिंग प्राइस निर्धारित करती है। इस व्यवस्था में संबंधित दवा के बाजार आंकड़ों के आधार पर औसत खुदरा विक्रेता कीमत की गणना की जाती है और निर्धारित नियमों के अनुसार खुदरा विक्रेता का 16 प्रतिशत मार्जिन जोड़ा जाता है। लागू करों का प्रावधान भी संबंधित नियमों के अनुसार होता है।

हालांकि, यह समझना जरूरी है कि 16 प्रतिशत का नियम भारत में बिकने वाली प्रत्येक दवा के MRP पर लागू होने वाली कोई सार्वभौमिक सीमा नहीं है। अनुसूचित और गैर-अनुसूचित दवाओं के लिए नियम अलग हैं। गैर-अनुसूचित दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने में निर्माताओं को अधिक स्वतंत्रता मिलती है, जबकि उनकी कीमतों में बाद की बढ़ोतरी पर नियामकीय सीमाएं लागू हो सकती हैं।

यही अंतर मौजूदा विवाद के केंद्र में है। अदालत के समक्ष उठाया गया सवाल यह है कि क्या शुरुआती कीमत और खुदरा विक्रेता के लिए निर्धारित कीमत के बीच अत्यधिक अंतर को रोकने के लिए व्यवस्था में व्यापक बदलाव की जरूरत है।

मरीजों और परिवारों पर क्या पड़ता है असर ?

कैंसर, हृदय रोग और दूसरी गंभीर बीमारियों के इलाज में मरीजों को लंबे समय तक दवाएं खरीदनी पड़ सकती हैं। यदि किसी दवा की कीमत परिवार की आर्थिक क्षमता से बहुत अधिक हो, तो इलाज जारी रखना कठिन हो सकता है। कई परिवारों के लिए दवाओं का खर्च अस्पताल में भर्ती होने और जांच कराने के खर्च के अतिरिक्त एक बड़ा बोझ बन जाता है।

इसका असर सार्वजनिक स्वास्थ्य योजनाओं पर भी पड़ सकता है। यदि किसी उपचार का भुगतान सरकारी योजना के तहत किया जाता है, तो दवाओं और चिकित्सा सामग्री की कीमतों का प्रभाव अंततः सार्वजनिक धन पर भी पड़ सकता है। हालांकि, किसी विशेष कीमत-अंतर से किस पक्ष को कितना लाभ हुआ, यह तय करने के लिए पूरी आपूर्ति शृंखला के आंकड़ों की जरूरत होगी।

अस्पतालों की अपनी फार्मेसी से दवा खरीदने की व्यवस्था भी इस बहस का एक हिस्सा है। जब मरीज अस्पताल में इलाज करा रहा हो, तो उसके पास दवा खरीदने के सीमित विकल्प हो सकते हैं। ऐसे में कीमतों की पारदर्शिता, मरीज को विकल्प उपलब्ध कराने और उचित बिलिंग की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

सरकार के सामने क्या चुनौती है ?

दवाओं की कीमतें कम करना एक महत्वपूर्ण जनहित का लक्ष्य है, लेकिन नियमन बनाते समय दवाओं की उपलब्धता, वितरण लागत, गुणवत्ता, आपूर्ति और बाजार में प्रतिस्पर्धा जैसे पहलुओं पर भी विचार करना होता है। बहुत व्यापक या गलत तरीके से लागू किया गया मूल्य नियंत्रण कुछ उत्पादों की आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है। दूसरी ओर, कमजोर नियमन मरीजों को अत्यधिक कीमतों का सामना करने के लिए छोड़ सकता है।

इसलिए नीति निर्धारण में यह देखना जरूरी है कि किस दवा पर किस प्रकार का नियंत्रण उपयुक्त है, व्यापार मार्जिन का निर्धारण कैसे हो, अस्पतालों में कीमतों की निगरानी कैसे की जाए और नियमों का उल्लंघन होने पर कार्रवाई कितनी प्रभावी हो।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई ने इन सवालों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। अदालत की टिप्पणियां यह संकेत देती हैं कि मौजूदा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा पर विचार किया जा रहा है। लेकिन किसी प्रस्ताव पर सवाल उठाना और उसे अंतिम आदेश के रूप में लागू करना अलग-अलग बातें हैं।

आगे क्या ?

12 अक्टूबर की सुनवाई के बाद मामले को 27 अक्टूबर 2026 को आगे सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किए जाने की रिपोर्ट आई थी। इस समाचार को प्रकाशित करते समय 27 अक्टूबर की सुनवाई से संबंधित किसी नए आदेश या अंतिम निर्णय का दावा तभी किया जाना चाहिए, जब उसकी आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध हो।

इस पूरे मामले का केंद्रीय प्रश्न यही है कि क्या भारत में दवाओं की कीमतों का नियमन मरीजों को अधिक पारदर्शिता और वास्तविक राहत देने के लिए पर्याप्त है। अदालत की आगे की कार्यवाही, केंद्र सरकार के प्रस्ताव और NPPA के आधिकारिक आदेश इस बहस की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होंगे।

हिंदी विंडो का निष्कर्ष: दवा मरीज की जरूरत है, विलासिता नहीं। कीमतों का नियमन ऐसा होना चाहिए जो मरीजों को राहत दे, गुणवत्ता और उपलब्धता बनाए रखे तथा दवा की आपूर्ति शृंखला में जवाबदेही सुनिश्चित करे।

स्रोत: Hindustan Times की रिपोर्ट; 12 अक्टूबर 2026 की सुनवाई पर प्रकाशित मीडिया रिपोर्टें; राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) की दवा मूल्य निर्धारण संबंधी आधिकारिक जानकारी।

अस्वीकरण: यह समाचार सार्वजनिक रिपोर्टों और उपलब्ध नियामकीय जानकारी पर आधारित है। अदालत की टिप्पणियों को अंतिम आदेश न माना जाए। नवीनतम न्यायिक स्थिति और लागू सरकारी अधिसूचनाओं की पुष्टि प्रकाशन से पहले की जानी चाहिए।

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