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भारत-ब्रिटेन व्यापार विवाद: थोक स्कॉच व्हिस्की पर 150% शुल्क की जांच

भारत-ब्रिटेन व्यापार विवाद

भारत-ब्रिटेन व्यापार समझौते के तहत थोक स्कॉच व्हिस्की पर आयात शुल्क को लेकर विवाद। जानिए 150% से 75% शुल्क कटौती, Diageo-Pernod Ricard की जांच और भारतीय उद्योग पर संभावित असर।

2 नवंबर 2026 | हिंदी विंडो रिसर्च एवं न्यूज डेस्क

भारत और ब्रिटेन के बीच हाल ही में लागू हुए व्यापक व्यापार समझौते के सामने स्कॉच व्हिस्की के आयात शुल्क को लेकर एक अहम चुनौती सामने आई है। विवाद इस बात पर है कि स्कॉटलैंड में बनी व्हिस्की को बड़े कंटेनरों में थोक रूप से भारत लाने पर भी क्या वही रियायती आयात शुल्क मिलना चाहिए, जो समझौते के तहत पात्र स्कॉच व्हिस्की के लिए निर्धारित किया गया है।

रॉयटर्स की 2 नवंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय राजस्व अधिकारियों की जांच में यह सवाल उठाया गया है कि क्या थोक स्कॉच व्हिस्की को कम शुल्क वाली श्रेणी में घोषित किया जा सकता है। अधिकारियों का तर्क है कि थोक आयात के कुछ उत्पादों को समझौते के तहत मिली रियायत के बजाय 150 प्रतिशत शुल्क वाली दूसरी सीमा-शुल्क श्रेणी में रखा जाना चाहिए। दूसरी ओर, शराब उद्योग से जुड़े पक्षों का कहना है कि केवल बड़े कंटेनर में आयात किए जाने से स्कॉच व्हिस्की की मूल उत्पाद पहचान नहीं बदल जाती।

यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत-ब्रिटेन व्यापार समझौता 15 जुलाई 2026 से लागू हुआ था। इसके तहत पात्र स्कॉच व्हिस्की पर आयात शुल्क 150 प्रतिशत से घटाकर शुरुआती चरण में 75 प्रतिशत करने और अगले दस वर्षों में इसे घटाकर 40 प्रतिशत तक लाने का प्रावधान है। हालांकि, इस रियायत का लाभ किन उत्पादों को मिलेगा, इस पर थोक आयात के मामले में मतभेद उभरे हैं।

यह केवल विदेशी शराब के आयात का मामला नहीं है। इसके नतीजे भारत में व्हिस्की की कीमतों, घरेलू कंपनियों की उत्पादन व्यवस्था, सरकारी राजस्व और दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते के भरोसे पर भी पड़ सकते हैं।

क्या है पूरा विवाद ? थोक स्कॉच पर शुल्क की श्रेणी को लेकर टकराव

मामले की जड़ सीमा-शुल्क वर्गीकरण में है। आयातित उत्पाद किस श्रेणी में आता है, उसके आधार पर उस पर लागू शुल्क तय होता है। भारतीय अधिकारियों और शराब कंपनियों के बीच मतभेद इस बात पर है कि स्कॉटलैंड में बनी थोक स्कॉच व्हिस्की को व्हिस्की की श्रेणी में रखा जाए या पेय पदार्थों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाली मिश्रित अल्कोहलिक तैयारी की श्रेणी में।

फाइनेंशियल एक्सप्रेस की 2 नवंबर की रिपोर्ट के अनुसार, उद्योग इस विषय पर वाणिज्य मंत्रालय से स्पष्ट नीति चाहता है। रिपोर्ट में बताया गया है कि विवाद का एक प्रमुख तकनीकी प्रश्न सीमा-शुल्क वर्गीकरण की दो श्रेणियों—HS 2208, जिसमें स्पिरिट और व्हिस्की शामिल हैं, तथा HS 2106, जिसमें अन्यत्र वर्गीकृत नहीं किए गए कुछ खाद्य पदार्थ और तैयारियाँ आती हैं—के बीच अंतर से जुड़ा है।

उद्योग का तर्क है कि यदि उत्पाद वास्तव में स्कॉच व्हिस्की है और समझौते की उत्पत्ति संबंधी शर्तें पूरी करता है, तो उसे केवल बड़े कंटेनर में लाए जाने के कारण रियायत से बाहर नहीं किया जाना चाहिए। दूसरी ओर, अधिकारियों की जांच इस बात पर केंद्रित है कि संबंधित आयातित उत्पाद की वास्तविक प्रकृति क्या है और उसके लिए कौन-सा सीमा-शुल्क वर्गीकरण उचित है। अंतिम निर्णय संबंधित उत्पाद के तथ्यों, लागू नियमों और समझौते की शर्तों पर निर्भर करेगा।

स्कॉच व्हिस्की विवाद

स्कॉच व्हिस्की विवाद

भारत-ब्रिटेन समझौते में क्या है प्रावधान ?

भारत और ब्रिटेन के व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते (CETA) के तहत पात्र स्कॉच व्हिस्की पर आयात शुल्क में चरणबद्ध कटौती तय की गई है। ब्रिटेन सरकार की व्यापार संबंधी आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, 15 जुलाई 2026 से लागू इस व्यवस्था में संबंधित स्कॉच व्हिस्की पर शुल्क 150 प्रतिशत से घटाकर 75 प्रतिशत किया गया और अगले दस वर्षों में इसे 40 प्रतिशत तक लाने का प्रावधान है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है: समझौते में शुल्क घटाने का प्रावधान होना और किसी खास आयातित उत्पाद का उस रियायत के लिए पात्र होना दो अलग बातें हैं। किसी खेप को रियायत मिलने के लिए उसकी सही उत्पाद श्रेणी और लागू नियमों का पालन जरूरी है।

उद्योग का कहना है कि समझौते की शुल्क-सूची में थोक स्कॉच के लिए भी अलग प्रविष्टि मौजूद है। फाइनेंशियल एक्सप्रेस ने थोक स्कॉच के लिए HS 2208 30 92 और खुदरा कंटेनरों में आने वाली स्कॉच के लिए HS 2208 30 12 का उल्लेख किया है। हालांकि, संबंधित आयातित उत्पाद वास्तव में किस श्रेणी में आएगा, यह उसके गुणों और लागू सीमा-शुल्क नियमों के आधार पर निर्धारित होगा।

थोक स्कॉच इतनी महत्वपूर्ण क्यों है ?

रॉयटर्स की 2 नवंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत स्कॉच व्हिस्की का मात्रा के हिसाब से दुनिया का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। स्कॉच व्हिस्की एसोसिएशन के आंकड़ों का हवाला देते हुए रिपोर्ट कहती है कि 2025 में भारत को 22 करोड़ से अधिक बोतलों के बराबर स्कॉच का निर्यात हुआ। उद्योग के अनुमानों के अनुसार, ब्रिटेन से भारत आने वाली स्कॉच व्हिस्की का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा थोक रूप में आता है।

इनमें से काफी व्हिस्की भारतीय कंपनियां अपने उत्पादों में इस्तेमाल करती हैं। कुछ भारतीय निर्मित विदेशी शराब (IMFL) ब्रांडों में आयातित स्कॉच माल्ट या व्हिस्की को भारतीय अनाज से बनी स्पिरिट और अन्य सामग्री के साथ मिलाकर उत्पाद तैयार किए जाते हैं। इस व्यवस्था से विदेशी उत्पादकों और भारतीय विनिर्माण कंपनियों के बीच आपूर्ति श्रृंखला बनती है।

यदि थोक स्कॉच पर 75 प्रतिशत की रियायती दर लागू नहीं होती और उसके स्थान पर 150 प्रतिशत शुल्क लगता है, तो पात्रता संबंधी विवाद से आयात की लागत बढ़ सकती है। हालांकि, वास्तविक असर कंपनी के उत्पाद, आयात की श्रेणी, अनुबंध, अन्य करों और मूल्य निर्धारण पर निर्भर करेगा। इसलिए यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि खुदरा बाजार में सभी स्कॉच ब्रांडों की कीमतें बढ़ेंगी या घटेंगी।

Diageo और Pernod Ricard समेत कंपनियों की चिंता

इस विवाद में अंतरराष्ट्रीय शराब कंपनियां Diageo और Pernod Ricard प्रमुख रूप से चर्चा में हैं। इनके अलावा भारतीय शराब उद्योग की कंपनियां भी संभावित प्रभाव को लेकर चिंतित हैं।

रॉयटर्स की 19 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, राजस्व अधिकारियों ने कुछ कंपनियों के आयात की जांच की और उत्पाद वर्गीकरण से संबंधित दस्तावेजों की पड़ताल की। Diageo की भारतीय इकाई United Spirits ने अपने स्टॉक एक्सचेंज खुलासे में कार्यालयों में जांच की पुष्टि करते हुए कहा था कि उसने अधिकारियों को आवश्यक दस्तावेज और स्पष्टीकरण उपलब्ध कराए हैं। Pernod Ricard ने भी जांच में सहयोग करने की बात कही थी। जांच अपने आप में किसी कंपनी द्वारा गलत वर्गीकरण या कर चोरी का अंतिम प्रमाण नहीं है।

भारतीय कंपनियों की चिंता भी केवल आयात शुल्क तक सीमित नहीं है। घरेलू शराब उद्योग के संगठन Confederation of Indian Alcoholic Beverage Companies (CIABC) ने आशंका जताई है कि यदि थोक स्कॉच पर रियायत नहीं मिलती, तो कंपनियों के लिए तैयार बोतलबंद विदेशी व्हिस्की का आयात करना भारतीय स्तर पर उत्पादन करने की तुलना में अधिक आकर्षक हो सकता है। इससे घरेलू ब्लेंडिंग, बॉटलिंग और विनिर्माण गतिविधियों पर असर पड़ने की आशंका है। यह उद्योग का आकलन है, अभी सिद्ध हो चुका परिणाम नहीं।

भारत-ब्रिटेन स्कॉच व्हिस्की व्यापार विवाद

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ब्रिटेन और स्कॉटलैंड की प्रतिक्रिया

विवाद अब दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों के दायरे में भी आ गया है। रॉयटर्स के अनुसार, ब्रिटिश सरकार ने कहा है कि वह इस मामले को सुलझाने के लिए भारत सरकार के साथ काम कर रही है, ताकि ब्रिटिश कंपनियां समझौते में तय शुल्क दरों के तहत निर्यात कर सकें।

स्कॉटलैंड के प्रथम मंत्री जॉन स्विनी ने भी अपनी 20 से 27 अक्टूबर की भारत यात्रा के दौरान थोक स्कॉच व्हिस्की के शुल्क संबंधी मुद्दे को भारतीय पक्ष के सामने उठाया था। यह उल्लेखनीय है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीति ब्रिटेन सरकार के अधिकार क्षेत्र में आती है, जबकि स्कॉटलैंड का प्रशासन अपने कारोबार और निर्यातकों के हितों को बढ़ावा देता है।

भारत सरकार की ओर से विवाद पर अंतिम सार्वजनिक निर्णय या समाधान की पुष्टि उपलब्ध रिपोर्टों में नहीं है। 2 नवंबर को उद्योग प्रतिनिधियों और वाणिज्य मंत्रालय के बीच बातचीत प्रस्तावित होने की सूचना दी गई थी। इस बैठक का परिणाम प्रकाशित करने से पहले आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है।

आगे क्या हो सकता है ?

इस विवाद का समाधान तीन स्तरों पर महत्वपूर्ण होगा।

पहला, सरकार यह स्पष्ट कर सकती है कि समझौते के तहत पात्र थोक स्कॉच और अन्य अल्कोहलिक उत्पादों का वर्गीकरण किन शर्तों पर होगा। दूसरा, आयातकों को अपने उत्पादों की वास्तविक संरचना, उत्पत्ति और सीमा-शुल्क घोषणा के समर्थन में दस्तावेज प्रस्तुत करने पड़ सकते हैं। तीसरा, भारत और ब्रिटेन को यह सुनिश्चित करना होगा कि समझौते के प्रावधानों का क्रियान्वयन स्पष्ट और पूर्वानुमेय तरीके से हो।

यहां एक और महत्वपूर्ण बात है। स्कॉच व्हिस्की का मूल उत्पाद होना और व्यापार समझौते के तहत ब्रिटेन की उत्पत्ति संबंधी शर्तों को पूरा करना हमेशा एक ही बात नहीं है। उत्पाद की वास्तविक उत्पत्ति, निर्माण प्रक्रिया और लागू नियमों की जांच आवश्यक है। इसलिए हर थोक आयात को स्वतः रियायत का पात्र मानना भी उचित नहीं होगा और हर थोक खेप को रियायत से बाहर मान लेना भी, बिना संबंधित नियमों की जांच किए, जल्दबाजी होगी।

निष्कर्ष: भारत-ब्रिटेन स्कॉच व्हिस्की विवाद इस बात की परीक्षा है कि एक व्यापार समझौते में तय रियायतें वास्तविक आयात और विनिर्माण व्यवस्था पर कैसे लागू होती हैं। भारत के लिए चुनौती है कि वह सीमा-शुल्क नियमों का निष्पक्ष पालन सुनिश्चित करे, सरकारी राजस्व की रक्षा करे और घरेलू उद्योग के हितों पर भी ध्यान दे। ब्रिटेन के लिए चुनौती यह है कि उसके निर्यातकों को समझौते के तहत मिले बाजार अवसरों का लाभ स्पष्ट नियमों के आधार पर मिल सके। अंतिम तस्वीर सरकार की व्याख्या, जांच के निष्कर्ष और दोनों देशों के बीच बातचीत से ही साफ होगी।

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