सर्बानंद सोनोवाल की चार दिवसीय दक्षिण कोरिया यात्रा के दौरान जहाज निर्माण, समुद्री तकनीक और कुशल कार्यबल पर जोर; भारत का लक्ष्य 2047 तक दुनिया के शीर्ष पांच जहाज निर्माता देशों में शामिल होना।
नई दिल्ली/बुसान, 26 अक्टूबर 2026।
भारत अपने जहाज निर्माण उद्योग को वैश्विक स्तर पर मजबूत बनाने के लिए दक्षिण कोरिया के साथ सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने दक्षिण कोरिया की चार दिवसीय यात्रा के दौरान वहां के समुद्री उद्योग से जुड़े अवसरों को सामने रखा। इस पहल का प्रमुख उद्देश्य भारतीय जहाज निर्माण क्षेत्र में तकनीकी क्षमता, उत्पादन दक्षता और कुशल मानव संसाधन को बढ़ावा देना है।
डीडी न्यूज़ और भारत सरकार के आधिकारिक विवरण के अनुसार, भारत की दीर्घकालिक महत्वाकांक्षा 2047 तक दुनिया के शीर्ष पांच जहाज निर्माता देशों में शामिल होना है। इसके लिए सरकार दक्षिण कोरिया जैसे उन्नत जहाज निर्माण उद्योग वाले देश के साथ औद्योगिक साझेदारी को महत्वपूर्ण मान रही है।
बुसान से शुरू हुई समुद्री सहयोग की पहल
मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने अपनी यात्रा की शुरुआत दक्षिण कोरिया के बुसान शहर से की। बुसान कोरियाई समुद्री उद्योग का एक प्रमुख केंद्र है। यहां उन्होंने जहाज निर्माण क्षेत्र में काम कर रहे भारतीय पेशेवरों से बातचीत की।
इन पेशेवरों में जहाज निर्माण, समुद्री इंजीनियरिंग, डिजाइन, वेल्डिंग, परियोजना प्रबंधन और तकनीकी विशेषज्ञता से जुड़े लोग शामिल हैं। मंत्री ने उनसे दक्षिण कोरिया में हासिल किए गए अनुभव का उपयोग भारत के जहाज निर्माण उद्योग को मजबूत करने में करने का आग्रह किया।
उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय विशेषज्ञ अपने अनुभव के आधार पर भारत लौटकर काम कर सकते हैं या विदेश में रहते हुए भारतीय कंपनियों को तकनीकी और व्यावसायिक सहयोग दे सकते हैं।
“बुसान से समुद्री साझेदारी” विजुअल: बुसान बंदरगाह, जहाज और क्रेन
क्या है भारत-दक्षिण कोरिया का VOYAGES फ्रेमवर्क ?
भारत और दक्षिण कोरिया ने अप्रैल 2026 में दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे म्युंग की भारत यात्रा के दौरान जहाज निर्माण, शिपिंग और समुद्री लॉजिस्टिक्स में सहयोग के लिए एक व्यापक फ्रेमवर्क अपनाया था। इसे VOYAGES नाम दिया गया है।
इसका पूरा नाम है—Shared Vision for Operation of Yard Assisted Growth with Efficiency and Scale।
इस फ्रेमवर्क का उद्देश्य दोनों देशों की सरकारी एजेंसियों और निजी कंपनियों के बीच सहयोग की संभावनाओं को आगे बढ़ाना है। भारत को जहाज निर्माण क्षमता बढ़ाने और तकनीकी दक्षता विकसित करने में लाभ मिल सकता है, जबकि दक्षिण कोरियाई उद्योग को भारतीय समुद्री क्षेत्र में साझेदारी के अवसर मिल सकते हैं।
हालांकि, किसी फ्रेमवर्क का गठन अपने आप में सभी प्रस्तावित परियोजनाओं के पूरा होने की गारंटी नहीं है। वास्तविक परिणाम इस बात पर निर्भर करेंगे कि निवेश, तकनीकी हस्तांतरण, औद्योगिक परियोजनाओं और कौशल विकास के क्षेत्र में सहयोग किस गति से आगे बढ़ता है।
भारत को किन विशेषज्ञों की जरूरत है ?
जहाज निर्माण एक बहुस्तरीय औद्योगिक प्रक्रिया है। इसमें केवल जहाज बनाने वाले श्रमिक ही नहीं, बल्कि मरीन इंजीनियर, नेवल आर्किटेक्ट, डिजाइनर, वेल्डर, परियोजना प्रबंधक और आधुनिक तकनीक के विशेषज्ञ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
मंत्री ने दक्षिण कोरिया में काम कर रहे भारतीय पेशेवरों से आग्रह किया कि वे भारत में युवा प्रतिभाओं को मार्गदर्शन दें और दोनों देशों के उद्योगों के बीच तकनीकी सहयोग को मजबूत करें।
भारत सरकार की योजना में इंडिया शिप टेक्नोलॉजी सेंटर और कोरिया इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (KOICA) के साथ कौशल विकास से जुड़ी पहलें भी शामिल हैं।
यदि इन प्रयासों से प्रशिक्षित पेशेवरों की संख्या और गुणवत्ता में सुधार होता है, तो भारतीय शिपयार्डों की उत्पादकता और परियोजनाओं को समय पर पूरा करने की क्षमता बढ़ सकती है।
जहाज निर्माण में भारत की महत्वाकांक्षा
भारत की समुद्री विकास रणनीति में मैरीटाइम इंडिया विजन 2030 और मैरीटाइम अमृत काल विजन 2047 महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इन योजनाओं के तहत जहाज निर्माण, जहाज मरम्मत, समुद्री विनिर्माण और लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की परिकल्पना की गई है।
भारत के लिए इस क्षेत्र का महत्व केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं है। घरेलू जहाज निर्माण क्षमता बढ़ने से समुद्री उद्योग में रोजगार, सहायक विनिर्माण, इंजीनियरिंग सेवाओं और तकनीकी अनुसंधान के अवसर भी विकसित हो सकते हैं।
इसके साथ ही, जहाज निर्माण का मजबूत आधार देश की समुद्री परिवहन व्यवस्था और दीर्घकालिक औद्योगिक क्षमता को सहारा दे सकता है।
आगे की चुनौती: साझेदारी को जमीन पर उतारना
दक्षिण कोरिया की यात्रा के दौरान मंत्री की योजना वैश्विक जहाज निर्माण कंपनियों, समुद्री उद्योग संगठनों और अनुसंधान संस्थानों के प्रतिनिधियों से बातचीत करने की है। इन चर्चाओं में शिपयार्ड की उत्पादकता, परियोजनाओं के क्रियान्वयन, तकनीक, विनिर्माण और नवाचार पर ध्यान दिया जा रहा है।
भारत के सामने चुनौती यह होगी कि वह अंतरराष्ट्रीय साझेदारी को ठोस औद्योगिक परिणामों में बदले। इसके लिए आधुनिक बुनियादी ढांचे, प्रशिक्षित कार्यबल, प्रतिस्पर्धी लागत, गुणवत्ता मानकों और समयबद्ध परियोजना क्रियान्वयन पर लगातार काम करना होगा।
निष्कर्ष: दक्षिण कोरिया के साथ जहाज निर्माण सहयोग भारत की समुद्री औद्योगिक क्षमता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण अवसर है। लेकिन 2047 तक दुनिया के शीर्ष पांच जहाज निर्माता देशों में जगह बनाने की महत्वाकांक्षा का वास्तविक मूल्यांकन घोषणाओं से नहीं, बल्कि उत्पादन क्षमता, वैश्विक ऑर्डर, तकनीकी दक्षता, रोजगार और परियोजनाओं के ठोस परिणामों से होगा।
स्रोत: डीडी न्यूज़; भारत सरकार का प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB); प्रधानमंत्री कार्यालय की भारत-दक्षिण कोरिया साझेदारी संबंधी आधिकारिक जानकारी।
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