रांची | 18 अगस्त 2026
झारखंड में सरकारी भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर चल रहा छात्र आंदोलन सोमवार को एक बड़े घटनाक्रम के बाद नए मोड़ पर पहुंच गया। छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो ने 16 दिन से जारी भूख हड़ताल समाप्त कर दी, जबकि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक के बाद राज्य सरकार ने JSSC-CGL परीक्षा रद्द करने और आउटसोर्स एजेंसी TSR Data Processing Private Limited (TDPL) से जुड़ी भर्ती परीक्षाओं, परिणामों और चयन प्रक्रिया को रद्द करने की घोषणा की।
महतो ने रांची के सदर अस्पताल में राज्य सरकार के मंत्रियों दीपिका पांडेय सिंह और इरफान अंसारी की मौजूदगी में अपना अनशन समाप्त किया। रिपोर्टों के अनुसार, सरकार के फैसले के बाद महतो ने इसे छात्र आंदोलन की बड़ी उपलब्धि बताया, हालांकि उन्होंने कहा कि परीक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की लड़ाई आगे भी जारी रहेगी।
क्या-क्या फैसला हुआ ?
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कैबिनेट बैठक के बाद बताया कि सरकार ने JSSC-CGL परीक्षा रद्द करने का निर्णय लिया है। इसके साथ ही TDPL से संबंधित परीक्षाओं, उनके परिणामों और चयन प्रक्रिया को भी रद्द करने की बात कही गई है।
सरकार का फैसला केवल हाल की परीक्षा तक सीमित नहीं है। मुख्यमंत्री के अनुसार, 2014 से राज्य में आयोजित भर्ती परीक्षाओं में हुई छोटी-बड़ी कथित अनियमितताओं की व्यापक जांच की जाएगी।
CID करेगी जांच, सुधार के लिए समिति भी बनेगी
सरकार ने भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों की जांच का जिम्मा CID को देने की घोषणा की है। साथ ही परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए वरिष्ठ IAS अधिकारी अमिताभ कौशल की अध्यक्षता में एक समिति गठित करने की बात सामने आई है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि पिछली जांचों और जांच एजेंसियों के सामने आए तथ्यों को देखते हुए भर्ती परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की जरूरत है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि जांच का दायरा 2014 से अब तक आयोजित भर्ती परीक्षाओं तक रखा जाएगा।
16 दिन की भूख हड़ताल क्यों ?
देवेंद्र नाथ महतो और अन्य छात्र नेता झारखंड में JPSC और JSSC सहित विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे।
महतो ने 2 अगस्त 2026 से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी। प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में विवादित परीक्षाओं को रद्द करना, कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच, जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई और भर्ती परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता लाना शामिल था।
16 दिनों तक चले अनशन के दौरान महतो की तबीयत को लेकर भी चिंता जताई गई थी और उन्हें रांची के सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

आंदोलन खत्म हुआ या अभी जारी है ?
देवेंद्र नाथ महतो ने अपनी भूख हड़ताल समाप्त कर दी है, लेकिन छात्रों का पूरा आंदोलन समाप्त नहीं हुआ है।
प्रदर्शनकारियों की एक प्रमुख मांग अभी भी CBI जांच की है। कुछ छात्र नेताओं ने कहा है कि वे राज्य सरकार की CID जांच से संतुष्ट नहीं हैं और केंद्रीय जांच एजेंसी से जांच की मांग जारी रखेंगे।
यानी सरकार के फैसले के बाद आंदोलन का एक चरण जरूर बदला है, लेकिन भर्ती परीक्षा विवाद अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
JSSC-CGL पास करने वाले अभ्यर्थियों के सामने नई चिंता
सरकार के फैसले के बाद एक दूसरा पक्ष भी सामने आया है। JSSC-CGL परीक्षा पास कर चुके अभ्यर्थियों के एक वर्ग ने परीक्षा रद्द किए जाने का विरोध किया है।
इन अभ्यर्थियों का कहना है कि उन्होंने चयन प्रक्रिया पूरी की और अब परीक्षा रद्द होने से उनका भविष्य अनिश्चित हो गया है। रिपोर्टों के अनुसार करीब 2,000 चयनित अभ्यर्थियों पर इस फैसले का सीधा असर पड़ सकता है।
इससे झारखंड सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है—एक तरफ कथित परीक्षा अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच और दूसरी तरफ उन अभ्यर्थियों के भविष्य का समाधान जिन्होंने मौजूदा चयन प्रक्रिया में सफलता हासिल की है।
अब आगे क्या ?
झारखंड में भर्ती परीक्षा विवाद का अगला चरण तीन महत्वपूर्ण सवालों पर निर्भर करेगा—
पहला, जांच में कथित अनियमितताओं को लेकर क्या तथ्य सामने आते हैं?
दूसरा, JSSC-CGL और TDPL से जुड़ी परीक्षाओं को दोबारा किस व्यवस्था के तहत कराया जाएगा?
तीसरा, परीक्षा रद्द होने से प्रभावित सफल अभ्यर्थियों के भविष्य के लिए सरकार क्या व्यवस्था करती है?
छात्र आंदोलन ने फिलहाल सरकार को परीक्षा प्रणाली की व्यापक समीक्षा की दिशा में कदम उठाने के लिए मजबूर किया है। लेकिन इस पूरे विवाद का अंतिम समाधान तभी माना जाएगा, जब जांच, जवाबदेही, पारदर्शिता और प्रभावित अभ्यर्थियों के भविष्य—इन सभी सवालों का स्पष्ट उत्तर सामने आए।
हिंदी विंडो फैक्ट नोट:
इस रिपोर्ट में “परीक्षा में अनियमितता” को सिद्ध तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि सरकार और प्रदर्शनकारियों द्वारा उठाए गए आरोप/जांच के विषय के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जांच के अंतिम निष्कर्ष आने तक किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी घोषित नहीं किया जाना चाहिए।











