कराची | 3 सितंबर 2026
पाकिस्तान के कराची में डिलीवरी से जुड़ा एक बेहद असामान्य मामला सामने आया है। नाज़िमाबाद के एक निजी अस्पताल में 27 अगस्त को एक महिला की सी-सेक्शन यानी ऑपरेशन के जरिए डिलीवरी की तैयारी की गई, लेकिन ऑपरेशन के दौरान मेडिकल स्टाफ़ को गर्भ में बच्चा नहीं मिला।
महिला के परिवार का दावा था कि गर्भावस्था करीब नौ महीने की थी। उनके पास मौजूद एक अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में भी 38 सप्ताह की गर्भावस्था दर्ज बताई गई थी। ऑपरेशन के बाद जब परिवार को पता चला कि गर्भ में बच्चा मौजूद नहीं है, तो अस्पताल में विवाद और हंगामा हुआ। परिवार ने अस्पताल पर नवजात को गायब करने का आरोप लगाया।
हालांकि पुलिस की जांच में एक अलग तस्वीर सामने आई। पुलिस के मुताबिक, महिला ने बाद में स्वीकार किया कि वह गर्भवती नहीं थीं और उन्होंने परिवार को गर्भवती होने की जानकारी दी थी। पुलिस ने इसकी वजह शादी के तीन साल बाद भी संतान न होने से जुड़ा सामाजिक और पारिवारिक दबाव बताया।
लेकिन यहीं से मामले का दूसरा और अधिक गंभीर सवाल सामने आता है—अगर महिला गर्भवती नहीं थीं, तो अस्पताल की जांच प्रक्रिया में यह बात ऑपरेशन से पहले क्यों नहीं पकड़ी गई?
पुलिस की जांच में क्या सामने आया ?
डिस्ट्रिक्ट सेंट्रल पुलिस ने मामले की जांच इंस्पेक्टर ख़ालिद रफ़ीक़ को सौंपी थी। पुलिस के मुताबिक, ऑपरेशन के बाद महिला और उनका परिवार यह मानने को तैयार नहीं था कि गर्भ में बच्चा था ही नहीं।
पुलिस ने महिला का सरकारी अस्पताल में मेडिकल परीक्षण कराया। पुलिस अधिकारी के मुताबिक, वहां की रिपोर्ट में गर्भावस्था के कोई प्रमाण नहीं मिले। इसके बाद उपलब्ध टेस्ट और रिकॉर्ड को दोबारा जांच के लिए आगा ख़ान अस्पताल भेजा गया।
पुलिस का कहना है कि मेडिकल रिकॉर्ड और अन्य सबूतों की जांच के बाद महिला ने स्वीकार किया कि वह गर्भवती नहीं थीं।
पुलिस के अनुसार, महिला ने बताया कि शादी के तीन साल बाद भी बच्चा नहीं होने को लेकर उन पर सामाजिक दबाव था। उनके आसपास की कई महिलाएं मां बन चुकी थीं और इसी वजह से उन्होंने परिवार को अपनी गर्भावस्था के बारे में बता दिया।
हालांकि, पुलिस की यह जांच अभी मामले का अंतिम कानूनी या चिकित्सकीय निष्कर्ष नहीं है।
अस्पताल ने क्या कहा ?
हमदर्द अस्पताल के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की प्रमुख डॉक्टर अंजुम आरा हसन ने बयान जारी कर कहा कि महिला 27 अगस्त को अस्पताल आई थीं और उन्होंने एक अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट पेश की थी।
अस्पताल के मुताबिक, उपलब्ध रिपोर्ट और मेडिकल जांच के आधार पर ड्यूटी डॉक्टर ने आगे की प्रक्रिया का निर्णय लिया। अस्पताल ने यह भी कहा कि महिला की जांच में कार्डियोटोकोग्राफी यानी CTG शामिल थी।
मामले में अस्पताल के मेडिकल रिकॉर्ड में दर्ज कुछ जानकारियों को लेकर भी सवाल उठे हैं।
स्वतंत्र स्रोतों में उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 27 अगस्त को किए गए CTG में कथित तौर पर 100 से 150 बीट प्रति मिनट के बीच fetal heart rate दर्ज हुई थी। पुलिस सर्जन डॉक्टर समिया सैयद ने सवाल उठाया है कि अगर गर्भ में बच्चा मौजूद नहीं था तो CTG में कथित तौर पर fetal heartbeat कैसे रिकॉर्ड हुई। हालांकि, इस रिकॉर्ड की प्रामाणिकता और उसकी चिकित्सकीय व्याख्या की जांच अभी जारी है।
सात लोगों की मेडिकल जांच के बावजूद सवाल क्यों ?
पुलिस सर्जन डॉक्टर समिया सैयद ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया है।
रिपोर्टों के मुताबिक, महिला की जांच प्रक्रिया में तीन नर्स, दो डॉक्टर, एक एनेस्थेटिस्ट और एक स्त्री रोग विशेषज्ञ शामिल थे। इसके बावजूद कथित 38 सप्ताह की गर्भावस्था ऑपरेशन से पहले स्पष्ट रूप से सामने क्यों नहीं आई—यह सवाल जांच के केंद्र में है।
मेडिकल विशेषज्ञों के मुताबिक, सी-सेक्शन एक बड़ी सर्जिकल प्रक्रिया है और इसे केवल किसी एक पुरानी या बाहरी रिपोर्ट के आधार पर तय नहीं किया जाना चाहिए। ऑपरेशन से पहले मरीज की मेडिकल हिस्ट्री, शारीरिक जांच और आवश्यक जांचों से स्थिति की पुष्टि की जाती है।
पाकिस्तान इस्लामिक मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉक्टर फ़ज़ल रबी के अनुसार, किसी भी सर्जरी से पहले मरीज की मेडिकल हिस्ट्री, शारीरिक स्थिति और आवश्यक जांचों का आकलन किया जाता है। जरूरत के मुताबिक ब्लड टेस्ट, इमेजिंग और अन्य जांच की जाती हैं। एनेस्थीसिया से पहले भी मरीज की स्थिति का मूल्यांकन किया जाता है।
गर्भावस्था के मामले में डॉक्टर सामान्य प्रसव की संभावना का आकलन करते हैं और मां तथा भ्रूण की स्थिति जानने के लिए आवश्यक जांच करते हैं।
मामला अब स्वास्थ्य नियामक संस्था के पास
मामले ने अब एक नया मोड़ ले लिया है। सिंध हेल्थकेयर कमीशन यानी SHCC ने 2 सितंबर को इस मामले की औपचारिक जांच शुरू करने की घोषणा की।
SHCC एक वरिष्ठ मेडिकल विशेषज्ञों वाली तकनीकी बोर्ड गठित करेगा। बोर्ड उपलब्ध मेडिकल रिकॉर्ड और अन्य सबूतों की समीक्षा करेगा तथा महिला, अस्पताल के कर्मचारियों और अन्य संबंधित पक्षों के बयान दर्ज करेगा।
SHCC के अनुसार, सिंध हेल्थकेयर कमीशन एक्ट, 2013 के तहत जांच की अंतिम रिपोर्ट 120 दिनों के भीतर तैयार की जानी है। आयोग ने यह भी कहा है कि वह संभव होने पर इससे पहले जांच पूरी करने का प्रयास करेगा। शिकायतकर्ताओं, गवाहों और अन्य संबंधित पक्षों की जानकारी गोपनीय रखी जाएगी।
सबसे बड़े सवाल अभी बाकी हैं
इस पूरे मामले में दो अलग-अलग दावे सामने आए हैं।
एक तरफ पुलिस के मुताबिक महिला ने अपनी गर्भावस्था के बारे में गलत जानकारी दी और बाद में इसे स्वीकार किया।
दूसरी तरफ मेडिकल प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल हैं—यदि गर्भावस्था वास्तव में मौजूद नहीं थी, तो 38 सप्ताह की गर्भावस्था वाली रिपोर्ट कैसे स्वीकार की गई? मेडिकल जांच में यह स्थिति पहले क्यों नहीं पकड़ी गई? और CTG में कथित fetal heartbeat दर्ज होने की बात की चिकित्सकीय व्याख्या क्या है?
इन सवालों का अंतिम जवाब अभी जांच से आना बाकी है।
इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस मामले में पूरी जिम्मेदारी किसी एक पक्ष की है। पुलिस की जांच और SHCC की स्वतंत्र तकनीकी जांच के निष्कर्ष यह स्पष्ट कर सकते हैं कि महिला की ओर से गलत जानकारी दी गई थी, मेडिकल रिकॉर्ड में क्या हुआ, अस्पताल की प्रक्रिया में कोई चूक हुई या मामले में कोई अन्य तथ्य सामने आता है।
हिंदी विंडो की संपादकीय टिप्पणी:
यह मामला महिलाओं पर संतान को लेकर पड़ने वाले सामाजिक दबाव और अस्पतालों में मेडिकल वेरिफिकेशन की प्रक्रिया—दोनों पर गंभीर सवाल उठाता है। अंतिम निष्कर्ष संबंधित जांच एजेंसियों और स्वास्थ्य नियामक संस्था की रिपोर्ट के बाद ही निकाला जाना चाहिए।
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