Kerala Women MLAs NCW Workshop Walkout मामले में फरीदाबाद के सूरजकुंड में राष्ट्रीय महिला आयोग की कार्यशाला के दौरान भाषा को लेकर विवाद सामने आया है। केरल की महिला विधायकों के प्रतिनिधिमंडल ने हिंदी में हो रहे सत्रों और अंग्रेजी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने का आरोप लगाते हुए वॉकआउट किया।
फरीदाबाद: राष्ट्रीय महिला आयोग यानी NCW की ओर से फरीदाबाद के सूरजकुंड में आयोजित महिला विधायकों की दो दिवसीय क्षमता-वर्धन कार्यशाला उस समय विवादों में आ गई, जब केरल से पहुंची महिला विधायकों के एक प्रतिनिधिमंडल ने कार्यक्रम से वॉकआउट कर दिया।
केरल की महिला विधायकों का आरोप है कि कार्यशाला के ज्यादातर सत्र हिंदी में आयोजित किए जा रहे थे और गैर-हिंदी भाषी राज्यों से आए प्रतिनिधियों के लिए अंग्रेजी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं की गई थी। हालांकि, केरल की मंत्री बिंदु कृष्णा और अन्य प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि उन्हें हिंदी भाषा से आपत्ति नहीं थी, बल्कि सभी राज्यों के प्रतिभागियों को समझने और भाग लेने का समान अवसर नहीं मिलने पर आपत्ति थी।
किस-किस ने किया वॉकआउट?
केरल के प्रतिनिधिमंडल में डिप्टी स्पीकर शनीमोल उस्मान, मंत्री बिंदु कृष्णा और के.ए. तुलसी के अलावा विधायक के.के. रेमा, फातिमा तहिलिया, विद्या बालकृष्णन और उषा विजयन शामिल थीं।
रिपोर्टों के मुताबिक प्रतिनिधिमंडल का कहना था कि वे इस राष्ट्रीय स्तर की कार्यशाला में कानून बनाने की प्रक्रिया, विधायी कार्यवाही और नीतियों को प्रभावी तरीके से लागू करने से जुड़ी व्यावहारिक जानकारी हासिल करने की उम्मीद से पहुंचे थे।
लेकिन उनका आरोप है कि कार्यक्रम के कई सत्र मुख्य रूप से हिंदी में हुए और अंग्रेजी में भी चर्चा कराने का उनका अनुरोध स्वीकार नहीं किया गया।
कार्यशाला का उद्देश्य क्या था ?
यह कार्यक्रम National Commission for Women की ओर से महिलाओं की राजनीतिक और विधायी क्षमता मजबूत करने के उद्देश्य से आयोजित किया गया था।
इस कार्यक्रम को लेकर पूर्व में जारी जानकारी के अनुसार इसमें देश के अलग-अलग राज्यों की महिला जनप्रतिनिधियों को Gender-Responsive Governance, नेतृत्व, कानून बनाने की प्रक्रिया, नीति-निर्माण और प्रभावी जनप्रतिनिधित्व जैसे विषयों पर प्रशिक्षण और चर्चा के लिए एक मंच दिया गया था।
कार्यशाला का उद्घाटन 7 सितंबर को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने किया था।
क्या सिर्फ भाषा बनी विवाद की वजह ?
केरल के प्रतिनिधियों के मुताबिक मुख्य मुद्दा हिंदी का विरोध नहीं, बल्कि भाषाई समावेशन था।
मंत्री बिंदु कृष्णा के अनुसार दक्षिण भारत जैसे गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों से आने वाले प्रतिनिधियों के लिए अंग्रेजी को भी पर्याप्त जगह मिलनी चाहिए थी। उनका कहना था कि उन्होंने आयोजकों से अंग्रेजी के इस्तेमाल का अनुरोध किया, लेकिन उन्हें अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिली।
कुछ महिला विधायकों ने यह भी आरोप लगाया कि कार्यक्रम में संवाद और आपसी चर्चा के लिए पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया।
‘जय श्री राम’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाने का भी दावा
केरल की महिला विधायकों ने यह भी आरोप लगाया कि उनके विरोध के बाद कार्यक्रम स्थल पर ‘जय श्री राम’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाए गए। इसके बाद उन्होंने सत्र और समापन कार्यक्रम से पहले वॉकआउट कर दिया। यह दावा केरल प्रतिनिधिमंडल की ओर से किया गया है; उपलब्ध रिपोर्टों में NCW की तत्काल प्रतिक्रिया नहीं बताई गई है।
शशि थरूर ने किया समर्थन
कांग्रेस सांसद Shashi Tharoor ने केरल की महिला विधायकों के रुख का समर्थन किया।
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस घटना को लेकर केंद्र पर निशाना साधते हुए कहा कि यह मामला दिल्ली द्वारा ‘cooperative federalism’ यानी सहकारी संघवाद की अवधारणा को गलत तरीके से परिभाषित करने का उदाहरण है।
एक महत्वपूर्ण तथ्य
इस पूरे विवाद को केवल “हिंदी बनाम दूसरी भाषा” के रूप में देखना अधूरा होगा। उपलब्ध रिपोर्टों में केरल के प्रतिनिधियों ने खुद कहा है कि उनकी आपत्ति हिंदी भाषा के इस्तेमाल पर नहीं, बल्कि गैर-हिंदी भाषी राज्यों के प्रतिनिधियों के लिए पर्याप्त भाषाई सुविधा उपलब्ध नहीं होने पर थी।
वहीं, कार्यक्रम का आधिकारिक उद्देश्य महिला जनप्रतिनिधियों को शासन, कानून और नीति-निर्माण से जुड़ी क्षमता प्रदान करना था। इसलिए विवाद का मूल प्रश्न राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों में भाषाई समावेशन और सभी राज्यों के प्रतिनिधियों की प्रभावी भागीदारी से जुड़ता है।











