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‘आधुनिक सेक्युलरिज्म भारत के संदर्भ में फिट नहीं’, उज्जैन में मोहन भागवत का बयान; बोले—सभी पंथों के प्रति समान सम्मान जरूरी-Mohan Bhagwat on Secularism

उज्जैन की युवा धर्म संसद में RSS प्रमुख मोहन भागवत ने आधुनिक सेक्युलरिज्म को पश्चिमी अवधारणा बताया। जानिए धर्म, रिलीजन, सर्व-पंथ-समभाव और भारतीय संविधान के संदर्भ में उनके बयान की पूरी जानकारी।

‘आधुनिक सेक्युलरिज्म भारत के संदर्भ में फिट नहीं’, उज्जैन में मोहन भागवत का बयान; बोले—सभी पंथों के प्रति समान सम्मान जरूरी

उज्जैन: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने शुक्रवार, 18 सितंबर 2026 को मध्य प्रदेश के उज्जैन में आयोजित ‘युवा धर्म संसद’ में धर्म, रिलीजन, सेक्युलरिज्म और भारतीय जीवन-दृष्टि को लेकर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि आधुनिक अर्थों में इस्तेमाल किया जाने वाला ‘सेक्युलरिज्म’ मूल रूप से पश्चिमी संदर्भ से विकसित हुआ और उनके अनुसार यह अवधारणा भारत की पारंपरिक सोच के अनुरूप नहीं बैठती।

भागवत के मुताबिक भारत की परंपरा अलग-अलग धार्मिक और आध्यात्मिक मार्गों के प्रति समान सम्मान की रही है। उन्होंने इसके लिए ‘सर्व-पंथ-समभाव’ की अवधारणा का उल्लेख किया। उनका कहना था कि व्यक्ति को अपने विश्वास और उपासना के तरीके का सम्मान करना चाहिए, लेकिन साथ ही दूसरे लोगों की आस्था और पूजा-पद्धति का भी समान रूप से सम्मान करना चाहिए।

पश्चिमी सेक्युलरिज्म को लेकर क्या बोले भागवत ?

अपने संबोधन में भागवत ने पश्चिम में सेक्युलरिज्म के विकास को सत्ता और धार्मिक संस्थाओं के बीच ऐतिहासिक संघर्ष से जोड़कर समझाया। उनके अनुसार यूरोप में राजा और धार्मिक सत्ता के बीच यह विवाद रहा कि सांसारिक और आध्यात्मिक मामलों में अधिकार किसके पास होगा। लंबे संघर्ष के बाद दोनों क्षेत्रों को अलग-अलग रखने की व्यवस्था विकसित हुई।

भागवत ने इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के आधार पर कहा कि पश्चिमी संदर्भ में ‘सेक्युलर’ शब्द का संबंध मुख्य रूप से सांसारिक या भौतिक क्षेत्र से बना। इसके विपरीत, उन्होंने भारतीय परंपरा में धर्म को केवल पूजा या धार्मिक पहचान तक सीमित न मानते हुए जीवन के व्यापक आचरण और जिम्मेदारियों से जुड़ी अवधारणा के रूप में प्रस्तुत किया।

उन्होंने कहा कि भारतीय दृष्टि में जीवन में भौतिक सुख-सुविधाओं के साथ-साथ क्रोध, लोभ और ईर्ष्या जैसे भावों से मुक्ति की भी बात होती है। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि भारत की पारंपरिक व्यवस्था को पश्चिमी सेक्युलर मॉडल से उसी तरह नहीं समझा जा सकता।

‘जब भारत भारतीयों द्वारा शासित था…’

भागवत ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि जब भारत भारतीयों के शासन में रहा, तब देश ने ‘धर्म’ के मार्ग का अनुसरण किया। यह टिप्पणी उनके भारतीय सभ्यता और धर्म की अपनी व्याख्या के संदर्भ में थी।

हालांकि, इस बयान को भारत के मौजूदा संवैधानिक ढांचे के संदर्भ में समझना जरूरी है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना भारत को ‘Sovereign Socialist Secular Democratic Republic’ यानी ‘सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य’ घोषित करती है। प्रस्तावना नागरिकों को न्याय, विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुता सुनिश्चित करने की बात करती है।

‘Secular’ और ‘Socialist’ शब्द संविधान की मूल 1949 की प्रस्तावना में नहीं थे। इन्हें संविधान (42वां संशोधन) अधिनियम, 1976 के जरिए जोड़ा गया।

इसलिए भागवत का बयान मुख्यतः भारतीय परंपरा और पश्चिमी सेक्युलरिज्म की वैचारिक तुलना के रूप में सामने आता है, जबकि भारत की वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था में ‘Secular’ शब्द स्पष्ट रूप से मौजूद है।

युवाओं से अहंकार से बचने की अपील

उज्जैन के कार्यक्रम में भागवत ने युवाओं को केवल सेक्युलरिज्म और धर्म पर ही संबोधित नहीं किया, बल्कि अहंकार और मनुष्य के नियंत्रण की सीमाओं पर भी बात की।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सूर्य के अस्त और उदय होने के लिए किसी व्यक्ति की मान्यता या इच्छा जरूरी नहीं है। उनके अनुसार मनुष्य को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि संसार की हर चीज उसके नियंत्रण में है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि जीवन में उत्थान आता है तो पतन की संभावना भी रहती है।

‘धर्म’ और ‘रिलीजन’ के बीच अंतर

उज्जैन में भागवत के संबोधन का एक बड़ा हिस्सा ‘धर्म’ की उनकी व्याख्या पर केंद्रित रहा। अन्य रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने युवाओं से धर्म और ‘Religion’ के बीच अंतर समझने की बात कही और धर्म को जीवन के आरंभ से अंत तक मार्गदर्शन करने वाली अवधारणा के रूप में प्रस्तुत किया।

युवा धर्म संसद के आयोजन में देश के विभिन्न हिस्सों से युवाओं की भागीदारी हुई। आयोजकों की ओर से लगभग 1,600 से 1,700 युवाओं की भागीदारी की जानकारी सामने आई है; अलग-अलग रिपोर्टों में संख्या अलग बताई गई है।

विदेश नीति और पड़ोसी देश का भी जिक्र

अपने संबोधन में भागवत ने भारत के अंतरराष्ट्रीय व्यवहार का भी उल्लेख किया। उन्होंने बिना पाकिस्तान का नाम लिए एक पश्चिमी पड़ोसी की ओर संकेत किया और कहा कि भारत को परेशान किए जाने पर उसने जरूरत के मुताबिक जवाब दिया है, लेकिन भारत ने दूसरे देशों के मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं किया।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत ने संकट के समय उन लोगों की भी मदद की है जिन्होंने पहले भारत के लिए मुश्किलें पैदा की थीं। यह टिप्पणी उन्होंने अलग-अलग विचारधाराओं वाली सरकारों के संदर्भ में भारत के व्यवहार की अपनी व्याख्या के तौर पर रखी।

बयान का व्यापक संदर्भ

मोहन भागवत का यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत में धर्म, पंथनिरपेक्षता, बहुलतावाद और भारतीय संविधान को लेकर वैचारिक बहस लगातार सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनी हुई है।

एक ओर संविधान भारत को पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करता है और नागरिकों के विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता तथा समानता की गारंटी देता है। दूसरी ओर भागवत जैसे वक्ता भारतीय सभ्यता की अवधारणाओं—विशेषकर धर्म और सर्व-पंथ-समभाव—को भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा के संदर्भ में प्रमुखता देते हैं।

इसलिए उज्जैन में दिया गया यह वक्तव्य केवल ‘सेक्युलरिज्म’ शब्द की व्याख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की संवैधानिक भाषा और भारतीय सभ्यतागत परंपरा को किस तरह समझा जाए, इस व्यापक बहस से भी जुड़ता है।