नई दिल्ली/अहमदाबाद/पटना। भारत की चुनावी राजनीति में राजनीतिक दलों की संख्या लगातार बड़ी रही है, लेकिन इनमें से बड़ी संख्या ऐसी पार्टियों की है जिन्हें निर्वाचन आयोग ने राष्ट्रीय या राज्य स्तर की मान्यता नहीं दी है। इन्हें Registered Unrecognised Political Parties यानी RUPPs कहा जाता है।
BBC News हिन्दी की एक पड़ताल में ऐसी छह RUPPs पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जिन्हें वित्त वर्ष 2023-24 में बड़ी मात्रा में चंदा मिला, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में इनकी चुनावी सक्रियता बेहद सीमित रही।
पड़ताल के मुताबिक, इन छह दलों ने 2024 के लोकसभा चुनाव में कुल मिलाकर सिर्फ 15 उम्मीदवार मैदान में उतारे। इसके मुकाबले BJP को छोड़कर बाकी पांच राष्ट्रीय दलों ने कुल 893 उम्मीदवार उतारे।
BBC ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसकी पड़ताल से इन छह पार्टियों या उनसे जुड़े लोगों पर किसी आर्थिक अपराध में शामिल होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा रहा है। रिपोर्ट का मुख्य सवाल इन पार्टियों की वित्तीय पारदर्शिता, वास्तविक राजनीतिक गतिविधियों और भारी चंदे के बीच दिखाई देने वाले अंतर को लेकर है।
330 करोड़ रुपये का चंदा, लेकिन बंद मिला कार्यालय
गुजरात के आनंद शहर में BBC की टीम ने सत्यवादी रक्षक पार्टी के रजिस्टर्ड कार्यालय का दौरा किया। रिपोर्ट के अनुसार, कार्यालय एक फ्लैट में था और वहां ताला लगा हुआ था। बाहर ऐसा कोई स्पष्ट बोर्ड या पोस्टर भी नहीं था जिससे कार्यालय की राजनीतिक गतिविधि आसानी से दिखाई दे।
पार्टी के रिकॉर्ड के अनुसार, वित्त वर्ष 2023-24 में उसे लगभग 330 करोड़ रुपये का चंदा मिला था।
इसके बावजूद 2024 लोकसभा चुनाव में पार्टी ने सिर्फ एक उम्मीदवार उतारा।
ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, पार्टी ने चुनाव प्रचार पर करीब 8.48 करोड़ रुपये खर्च किए, जबकि लगभग 316 करोड़ रुपये ‘जनकल्याण’ के नाम पर खर्च किए गए।
BBC के सवालों पर पार्टी की अध्यक्ष स्वाति बेन ने कहा कि पैसा चैरिटी में खर्च किया गया था, लेकिन उसका कोई रिकॉर्ड नहीं रखा गया। यह दावा पार्टी की वित्तीय पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े करता है, हालांकि इससे अपने आप किसी वित्तीय अपराध की पुष्टि नहीं होती।
आम जनमत पार्टी: दो साल बाद अचानक करोड़ों का चंदा

BBC की पड़ताल में आम जनमत पार्टी का मामला भी सामने आया।
चुनाव आयोग को दी गई जानकारी के अनुसार, 2020 में पटना में पार्टी बनने के बाद शुरुआती दो वर्षों में उसे 20,000 रुपये से अधिक का कोई चंदा नहीं मिला था।
लेकिन इसके बाद तस्वीर तेजी से बदली।
वित्त वर्ष 2022-23 में पार्टी को लगभग 216 करोड़ रुपये मिले और वित्त वर्ष 2023-24 में यह राशि बढ़कर करीब 620 करोड़ रुपये हो गई।
इसके बावजूद 2024 लोकसभा चुनाव में पार्टी ने केवल एक उम्मीदवार उतारा।
BBC ने पार्टी की संस्थापक अध्यक्ष अनामिका पासवान से बात की। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने 2022 में पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। उनके पति ने इस्तीफे से संबंधित दस्तावेज भी दिखाए।
उनके मुताबिक पार्टी का आधार पटना से अहमदाबाद स्थानांतरित हो गया था और उस समय गौरव मिश्रा पार्टी के अध्यक्ष थे।
BBC के अनुसार, अहमदाबाद में पार्टी का रजिस्टर्ड कार्यालय बंद मिला।
पार्टी के कोषाध्यक्ष धर्मेंद्र वैष्णव ने फोन पर कहा कि पार्टी का कामकाज बंद हो चुका था। हालांकि BBC की रिपोर्ट के अनुसार, उस समय भी पार्टी के बैंक खाते में चंदा भेजा जा सकता था।
गौरव मिश्रा से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने फोन और संदेशों का जवाब नहीं दिया।
गरीब कल्याण पार्टी को 138 करोड़ रुपये
BBC की पड़ताल में गरीब कल्याण पार्टी का भी उल्लेख है।
रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी को करीब 138 करोड़ रुपये का चंदा मिला था और उसने 2024 लोकसभा चुनाव में तीन उम्मीदवार उतारे।
BBC के अनुसार, इसका कार्यालय भी अहमदाबाद के नरोदा इलाके में था और वह आम जनमत पार्टी के कार्यालय के नजदीक स्थित था।
पड़ताल में यह तथ्य भी सामने आया कि छह सबसे अधिक चंदा पाने वाली RUPPs में से चार के रजिस्टर्ड कार्यालय एक ही इलाके में बताए गए, जबकि बाकी दो भी गुजरात में थे।

टैक्स छूट ने क्यों बढ़ाया सवाल?
इस पूरी कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा राजनीतिक दलों को मिलने वाले टैक्स संबंधी लाभ हैं।
भारतीय कानून में राजनीतिक दलों के लिए कुछ विशेष कर-व्यवस्थाएं हैं। साथ ही राजनीतिक दलों को मिलने वाले 20,000 रुपये से अधिक के योगदान की जानकारी निर्धारित रिपोर्ट के माध्यम से चुनाव आयोग को देनी होती है। चुनाव आयोग के दस्तावेज में Representation of the People Act की धारा 29C के तहत 20,000 रुपये से अधिक के योगदान की रिपोर्टिंग का प्रावधान दर्ज है।
BBC से बातचीत में अहमदाबाद के चार्टर्ड अकाउंटेंट महेश छाजेड़ ने दावा किया कि कुछ लोग राजनीतिक दलों को दिए गए चंदे से जुड़े टैक्स लाभ का कथित तौर पर गलत इस्तेमाल करते हैं।
उनके मुताबिक, एक कथित व्यवस्था में टैक्सपेयर राजनीतिक पार्टी को चंदा देने की रसीद लेता है, टैक्स लाभ का दावा करता है और पार्टी कथित रूप से कमीशन काटकर बाकी रकम नकद वापस कर देती है।
यह एक विशेषज्ञ द्वारा किया गया दावा है; इसे सभी राजनीतिक दलों या सभी राजनीतिक चंदों पर लागू तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
आयकर विभाग भी RUPPs को लेकर कार्रवाई कर चुका है
भारत के आयकर विभाग ने दिसंबर 2025 की एक आधिकारिक प्रेस रिलीज़ में कहा था कि उसके जोखिम-विश्लेषण में कुछ मामलों में RUPPs को दिए गए कथित bogus donations और गलत deductions/exemptions सामने आए।
CBDT ने कहा था कि कुछ टैक्सपेयर्स ने ऐसे दावे किए जिन्हें विभाग ने संभावित रूप से अयोग्य माना और उन्हें अपने ITR की समीक्षा तथा आवश्यकता होने पर संशोधन करने के लिए कहा गया।
BBC की रिपोर्ट में एक कथित आंतरिक दस्तावेज के हवाले से दावा किया गया कि आयकर विभाग ने RUPPs को दिए गए 5,591 करोड़ रुपये के कथित फर्जी चंदे की पहचान की थी और इनमें से 2,749 करोड़ रुपये की वसूली का उल्लेख था।
इसी दस्तावेज में 665 करोड़ रुपये के विदेशी लेन-देन की पहचान किए जाने का भी दावा किया गया।
हालांकि BBC ने संबंधित छह पार्टियों के इन आंकड़ों में शामिल होने की पुष्टि के लिए आयकर विभाग और CBDT से सवाल भेजे थे और रिपोर्ट प्रकाशित होने तक जवाब नहीं मिलने की बात कही। इसलिए इन आंकड़ों को आंतरिक दस्तावेज में किए गए दावे के रूप में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
चार्टर्ड अकाउंटेंट की भूमिका पर भी सवाल
BBC की पड़ताल में कुछ टैक्स अधिकारियों के हवाले से दावा किया गया कि कुछ RUPPs स्वतंत्र राजनीतिक संगठनों की तरह काम नहीं कर रही थीं और उनके कामकाज में आपसी संबंध दिखाई देते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारियों ने आरोप लगाया कि कुछ मामलों में चार्टर्ड अकाउंटेंट टैक्सपेयर और राजनीतिक पार्टी के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं।
स्वतंत्रता अभिव्यक्ति पार्टी के अध्यक्ष सुरेंद्र तिवारी ने BBC को बताया कि उनकी पार्टी को 2023-24 में करीब 219 करोड़ रुपये मिले थे, लेकिन उनके अनुसार उन्हें उस धन के इस्तेमाल का अधिकार नहीं था।
उन्होंने दावा किया कि पार्टी के चार्टर्ड अकाउंटेंट ने उन्हें चुनाव प्रचार के लिए कुछ रकम दी और संभावित टैक्स लाभ लेने वाले लोगों को प्रचार से जुड़े वीडियो दिखाए गए।
तिवारी ने यह भी बताया कि जुलाई 2026 में पार्टी को आयकर विभाग से नोटिस मिला था।
हालांकि, संबंधित चार्टर्ड अकाउंटेंट मयूर सिंह ने किसी भी तरह की गड़बड़ी से इनकार किया और कहा कि उनकी भूमिका आवश्यक ऑडिट रिपोर्ट जमा करने तक सीमित थी।
चुनाव आयोग की कार्रवाई
RUPPs को लेकर चुनाव आयोग भी कार्रवाई करता रहा है।
जून 2025 में आयोग ने 345 RUPPs को delist करने की कार्यवाही शुरू करने की घोषणा की थी। आयोग ने कहा था कि इन दलों ने 2019 से पिछले छह वर्षों में एक भी चुनाव नहीं लड़ा था और इनके कार्यालय भौतिक रूप से भी नहीं मिल सके थे। आयोग ने उस समय कहा था कि 2,800 से अधिक RUPPs पंजीकृत थीं और कई पार्टियां आवश्यक शर्तें पूरी नहीं कर रही थीं।
ECI की वेबसाइट पर 2025-26 के दौरान RUPPs को लेकर delisting और disputed RUPPs से संबंधित कई सूचियां और आदेश भी उपलब्ध हैं।
हालांकि, किसी पार्टी का चुनाव में कम उम्मीदवार उतारना या उसका कार्यालय बंद मिलना अपने आप में वित्तीय अपराध का प्रमाण नहीं है। किसी भी कथित वित्तीय अनियमितता की पुष्टि संबंधित सरकारी जांच, दस्तावेज और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही हो सकती है।
बड़ा सवाल: राजनीतिक दल या वित्तीय माध्यम?
BBC की पड़ताल का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है—अगर कोई राजनीतिक दल करोड़ों रुपये का चंदा प्राप्त करता है, लेकिन चुनावी राजनीति में उसकी भागीदारी बेहद सीमित है, तो उस धन का स्रोत, इस्तेमाल और लाभार्थी कौन हैं?
यही वजह है कि राजनीतिक दलों की वित्तीय पारदर्शिता, ऑडिट, योगदान रिपोर्ट, टैक्स अनुपालन और वास्तविक राजनीतिक गतिविधियों की निगरानी महत्वपूर्ण हो जाती है।
चुनाव आयोग खुद राजनीतिक दलों से contribution reports और audited annual accounts जैसे दस्तावेज जमा करने की व्यवस्था रखता है।
BBC ने इस पड़ताल में शामिल छह पार्टियों के खिलाफ किसी वित्तीय अपराध का निष्कर्ष नहीं निकाला है। आयकर विभाग और चुनाव आयोग से पूछे गए कई सवालों के जवाब रिपोर्ट के प्रकाशन तक लंबित थे।
इसलिए इस पूरे मामले का सबसे जिम्मेदार निष्कर्ष यही है कि ये आंकड़े और जांच के संकेत गंभीर सवाल जरूर उठाते हैं, लेकिन सवाल और साबित अपराध—दो अलग चीजें हैं।
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