कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन नागरिकों को सत्ता तक अपनी बात पहुंचाने का रास्ता देते हैं; उन्होंने कहा—जब संस्थागत माध्यम पर्याप्त न हों तो जनता के पास अपनी आवाज उठाने के विकल्प होने चाहिए।
नई दिल्ली/मुंबई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत की Gen-Z और विरोध-प्रदर्शनों को लेकर की गई टिप्पणी पर कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। थरूर ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन को केवल असहमति या सरकार-विरोधी गतिविधि के रूप में देखने के बजाय नागरिकों की लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के रूप में समझना चाहिए।
भागवत ने 6 अगस्त को IIMUN के एक कार्यक्रम में कहा था कि विरोध लोकतंत्र में संवाद का एक वैध माध्यम है। उन्होंने यह भी कहा कि आंदोलन का उद्देश्य समाज को बांटना नहीं, बल्कि सहमति और व्यवस्था में सुधार की दिशा में होना चाहिए। उन्होंने Gen-Z की चिंताओं को भी वास्तविक और महत्वपूर्ण बताया।
इसी संदर्भ में थरूर ने कहा कि उन्हें भागवत की यह बात विशेष रूप से महत्वपूर्ण लगी कि लोकतंत्र में विरोध करना अपने आप में देशविरोधी गतिविधि नहीं है।
थरूर के मुताबिक, विरोध का मूल उद्देश्य अपनी बात को सत्ता तक पहुंचाना और सुना जाना है। उन्होंने कहा कि जब नागरिकों को लगता है कि मौजूदा संस्थागत माध्यम उनकी चिंताओं को पर्याप्त रूप से सामने नहीं ला पा रहे हैं, तब प्रदर्शन उनकी आवाज को सार्वजनिक विमर्श में लाने का एक माध्यम बन सकता है।
‘विरोध लोकतंत्र का दबाव कम करने वाला माध्यम’
थरूर ने लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शनों की तुलना प्रेशर कुकर के वाल्व से करते हुए कहा कि जनता के असंतोष को अभिव्यक्ति का रास्ता मिलना जरूरी है। उनका तर्क है कि यदि लोगों की शिकायतों और असहमति के शांतिपूर्ण रास्ते बंद किए जाते हैं, तो इससे असंतोष कम होने के बजाय और बढ़ सकता है।
यह रुख थरूर के मई 2026 में कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़े विवाद पर दिए गए बयानों से भी मेल खाता है। उस समय उन्होंने CJP के सोशल मीडिया अकाउंट पर कार्रवाई की आलोचना करते हुए कहा था कि लोकतंत्र में असहमति, हास्य, व्यंग्य और निराशा की अभिव्यक्ति के लिए जगह होनी चाहिए।
CJP आंदोलन का भी किया उल्लेख
थरूर ने हाल के Gen-Z आंदोलन और कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP के विरोध-प्रदर्शनों का संदर्भ देते हुए कहा कि युवाओं की नाराजगी को केवल सोशल मीडिया की गतिविधि मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने पहले भी इस आंदोलन को युवाओं के भीतर मौजूद असंतोष का संकेत बताया था और विपक्षी दलों से इस असंतोष को लोकतांत्रिक एवं राजनीतिक प्रक्रिया में बदलने की अपील की थी।
हाल के हफ्तों में CJP से जुड़े युवा आंदोलन ने शिक्षा, परीक्षा व्यवस्था और युवाओं से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया। आंदोलन के दौरान दिल्ली में प्रदर्शन और संसद की ओर मार्च भी हुआ था।
‘युवाओं को हल्के में नहीं लिया जा सकता’
थरूर का कहना है कि आज का युवा केवल सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी व्यक्त करने तक सीमित नहीं है। जब युवाओं को लगता है कि उनकी बात नहीं सुनी जा रही, तो वे सड़क, सोशल मीडिया, अदालत, मीडिया और राजनीतिक मंचों सहित अलग-अलग लोकतांत्रिक माध्यमों का इस्तेमाल कर सकते हैं।
भागवत के हालिया बयान भी इसी बहस के बीच आए हैं। उन्होंने कहा कि आंदोलन संवाद का माध्यम है और उसका उद्देश्य सहमति तथा व्यवस्था में सुधार होना चाहिए।
बदल रहा है राजनीतिक विमर्श?
थरूर ने यह भी संकेत दिया कि युवाओं और मध्यम वर्ग की राजनीतिक सक्रियता को अब पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों से अलग नजरिए से देखने की जरूरत है।
उनके मुताबिक, यदि युवा मतदाता किसी मुद्दे पर संगठित होकर अपनी आवाज उठाते हैं तो राजनीतिक दलों के लिए इसे गंभीरता से लेना आवश्यक है। उनका कहना है कि राजनीतिक दल अब युवा मतदाताओं और बदलते जनमत को स्वाभाविक रूप से अपने पक्ष में मानकर नहीं चल सकते।
इस पूरे घटनाक्रम का बड़ा संदेश यही है कि Gen-Z के सवाल अब केवल सोशल मीडिया ट्रेंड नहीं रह गए हैं, बल्कि वे लोकतंत्र, शासन, शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक जवाबदेही से जुड़े व्यापक विमर्श का हिस्सा बनते जा रहे हैं।











