नई दिल्ली | 19 अगस्त 2026
पश्चिम बंगाल के कथित सालबोनी सरकारी जमीन धोखाधड़ी और जमीन हड़पने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को अहम सुनवाई हुई। राज्य सरकार ने तृणमूल कांग्रेस सांसद अभिषेक बनर्जी के पूर्व निजी सहायक सुमित रॉय से हिरासत में पूछताछ (Custodial Interrogation) की जरूरत बताई और उनकी गिरफ्तारी पर मिली सुरक्षा हटाने की मांग की।
राज्य सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के सामने दलील दी कि रॉय कथित तौर पर जांच में पूरा सहयोग नहीं कर रहे और पूछताछ के दौरान सवालों से बच रहे हैं। सरकार का कहना था कि जांच को आगे बढ़ाने के लिए उनकी हिरासत में पूछताछ जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने 6 अगस्त को क्या आदेश दिया था?
इस मामले में 6 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने सुमित रॉय की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। हालांकि, अदालत ने उन्हें जांच में पूरी तरह सहयोग करने का निर्देश दिया था।
अदालत के निर्देश के मुताबिक रॉय को जांच के लिए सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे के बीच उपलब्ध रहना था और उनके साथ पूछताछ के दौरान कोई वकील या अन्य व्यक्ति नहीं होना था। गिरफ्तारी पर रोक को जांच में सहयोग की शर्त के साथ जोड़ा गया था।
बंगाल सरकार ने क्या कहा?
19 अगस्त की सुनवाई में राज्य सरकार ने आरोप लगाया कि सुमित रॉय पूछताछ में सहयोग नहीं कर रहे हैं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने उनकी गिरफ्तारी पर लगी सुरक्षा हटाने की मांग की और कहा कि पुलिस को उनसे हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता है।
सरकार की ओर से जांच के दौरान जुटाई गई सामग्री भी पीठ के समक्ष सीलबंद लिफाफे में रखी गई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह सीलबंद रिपोर्ट देखने के बाद मामले पर आगे सुनवाई करेगा। फिलहाल 6 अगस्त को दी गई गिरफ्तारी पर रोक जारी रही।
सुमित रॉय के वकील की दलील क्या थी?
सुमित रॉय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि उनके मुवक्किल अदालत के निर्देश के अनुसार जांच में शामिल होते रहे हैं। उन्होंने यह भी दलील दी कि संविधान उन्हें कुछ परिस्थितियों में चुप रहने का अधिकार देता है।
इस पर पीठ की ओर से यह टिप्पणी की गई कि संविधान जांच एजेंसी को कानून के तहत गिरफ्तारी की शक्ति से भी वंचित नहीं करता।
मामला क्या है?
यह मामला पश्चिम बंगाल के पश्चिम मिदनापुर जिले के सालबोनी इलाके में कथित सरकारी जमीन धोखाधड़ी और जमीन हड़पने से जुड़ा है।
मामले में धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी, जाली दस्तावेजों के इस्तेमाल और आपराधिक साजिश से संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। अभियोजन का आरोप है कि सरकारी जमीन से जुड़े जाली दस्तावेजों और कथित मिलीभगत के जरिए जमीन के लेन-देन का प्रयास किया गया।
वहीं, रॉय की ओर से इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा गया है कि उनका जमीन के लेन-देन से कोई संबंध नहीं है और उन्हें राजनीतिक कारणों से मामले में घसीटा गया है। उनके वकील ने यह भी दलील दी कि एफआईआर में उनका नाम नहीं था और जांच के दौरान उनकी कथित भूमिका सामने लाई गई।
अब आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सुमित रॉय की गिरफ्तारी पर लगी रोक जारी रखी है। हालांकि, यह मामला यहीं समाप्त नहीं हुआ है। अदालत अब राज्य सरकार की ओर से सीलबंद लिफाफे में पेश की गई जांच सामग्री को देखने के बाद आगे की दिशा तय करेगी।
इसलिए वर्तमान स्थिति को राहत और जांच—दोनों के बीच संतुलित अंतरिम स्थिति के रूप में देखा जा सकता है। सुमित रॉय को तत्काल गिरफ्तारी से सुरक्षा मिली हुई है, लेकिन जांच में सहयोग करने की अदालत की शर्त कायम है।
महत्वपूर्ण: मामले में लगाए गए आरोप अभी न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हुए हैं। अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही तय होंगे।











