रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज, पूर्व हाई कोर्ट चीफ जस्टिस, पूर्व CBI निदेशक और पूर्व DGP जैसे विशेषज्ञ हो सकते हैं पैनल में शामिल; वीडियो फुटेज और CCTV रिकॉर्डिंग भी जांच के दायरे में
नई दिल्ली। 20 जुलाई को राष्ट्रीय राजधानी में हुए छात्र प्रदर्शन और संसद मार्च के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर उठे सवालों पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम कदम उठाया है। अदालत ने कहा है कि पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र और व्यापक जांच के लिए एक हाई-पावर्ड कमेटी गठित की जाएगी।
Dainik Tribune की 18 अगस्त 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की अध्यक्षता वाली पीठ ने प्रस्तावित समिति में सुप्रीम कोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश, किसी हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, CBI के पूर्व निदेशक, पूर्व DGP तथा अन्य विशेषज्ञों को शामिल किए जाने की बात कही है। समिति की संरचना को लेकर विभिन्न पक्षों से सुझाव मांगे गए हैं और अदालत की ओर से आगे आदेश जारी किया जाना है।
20 जुलाई की घटना क्या थी?
20 जुलाई को दिल्ली में छात्र प्रदर्शनकारियों का संसद की ओर मार्च प्रस्तावित था। इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव हुआ। पुलिस की ओर से कहा गया कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़ने की कोशिश की, पथराव और हिंसा हुई तथा सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया।
दिल्ली पुलिस ने अदालत में दायर हलफनामे में अपने बल प्रयोग का बचाव किया और कहा कि प्रदर्शनकारियों को बार-बार चेतावनी दी गई थी तथा संसद की ओर बढ़ने से रोकने के प्रयास किए गए। पुलिस के अनुसार, प्रदर्शन में कुछ ऐसे लोग भी शामिल हो गए थे जिनका आपराधिक रिकॉर्ड था।
रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने दावा किया कि प्रदर्शन में शामिल लोगों में 92 ऐसे लोग थे जिनके खिलाफ 10 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज थे और इनमें 47 को ‘हिस्ट्री-शीटर’ बताया गया। पुलिस ने यह भी कहा कि घटना में 240 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए।
अब सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट प्रस्तावित समिति को 20 जुलाई की घटना से जुड़े वीडियो फुटेज और CCTV रिकॉर्डिंग उपलब्ध कराने का निर्देश देगा। समिति का काम केवल पुलिस कार्रवाई की समीक्षा करना नहीं होगा, बल्कि प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा और उससे जुड़े घटनाक्रम का भी परीक्षण करना होगा।
इसके अलावा उन महिला प्रदर्शनकारियों की शिकायतों की भी जांच की जाएगी, जिन्होंने कथित तौर पर पुलिस कार्रवाई के दौरान छेड़छाड़ या दुर्व्यवहार के आरोप लगाए हैं।
छात्रों के भविष्य पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आपराधिक मामलों का छात्रों के भविष्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने और विरोध करने के अधिकार का उल्लेख किया। CJI ने यह भी कहा कि छात्रों के मामलों को ऐसे लोगों के मामलों के बराबर नहीं रखा जाना चाहिए जिनका आपराधिक इतिहास रहा हो, बशर्ते प्रदर्शनकारी कानून तोड़ने या हिंसा में शामिल न हों।
यह टिप्पणी इस पूरे मामले का महत्वपूर्ण पहलू है—क्योंकि अदालत के सामने एक ओर कानून-व्यवस्था और पुलिसकर्मियों की सुरक्षा का सवाल है, तो दूसरी ओर युवाओं के संवैधानिक अधिकार और उनके भविष्य पर आपराधिक मुकदमों के संभावित प्रभाव का प्रश्न भी है।
FIR को लेकर क्या हुआ ?
सुनवाई के दौरान छात्रों के खिलाफ दर्ज FIR को वापस लेने की मांग भी सामने आई। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की ओर से कहा गया कि गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों को छोड़कर अन्य मामलों पर विचार किया जा सकता है।
दूसरी ओर, कुछ याचिकाकर्ताओं की ओर से इसका विरोध किया गया और तर्क दिया गया कि प्रदर्शनकारियों को कानून का उल्लंघन करने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता।
पुलिस का पक्ष भी जांच के दायरे में
महत्वपूर्ण बात यह है कि दिल्ली पुलिस ने अदालत द्वारा गठित समिति से अपनी कार्रवाई की जांच कराने पर आपत्ति नहीं जताई है। पुलिस ने कहा है कि वह समिति के साथ सहयोग करेगी और आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराएगी।
इससे जांच का दायरा व्यापक हो सकता है—यानी केवल प्रदर्शनकारियों की गतिविधियां ही नहीं, बल्कि पुलिस द्वारा इस्तेमाल किए गए बल की आवश्यकता, अनुपातिकता और परिस्थितियों का भी परीक्षण किया जा सकता है।
निष्कर्ष
20 जुलाई का प्रदर्शन अब केवल पुलिस बनाम प्रदर्शनकारी विवाद नहीं रह गया है। मामला संवैधानिक अधिकार, कानून-व्यवस्था, पुलिस जवाबदेही और छात्रों के भविष्य जैसे कई महत्वपूर्ण प्रश्नों से जुड़ चुका है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रस्तावित हाई-पावर्ड कमेटी की जांच से यह स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है कि उस दिन वास्तव में क्या हुआ, हिंसा की शुरुआत कैसे हुई, पुलिस कार्रवाई परिस्थितियों के अनुपात में थी या नहीं और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों का उनके भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
हालांकि, जब तक समिति की जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी नहीं होती, किसी भी पक्ष को अंतिम रूप से दोषी या निर्दोष ठहराना उचित नहीं होगा।
संपादकीय सत्यापन नोट
यह रिपोर्ट उपलब्ध न्यायिक कार्यवाही और विश्वसनीय प्रकाशित रिपोर्टों के आधार पर पुनर्लिखी गई है। पुलिस द्वारा लगाए गए आरोपों तथा प्रदर्शनकारियों द्वारा लगाए गए कथित ज्यादती के आरोपों को आरोप/पक्ष के रूप में ही प्रस्तुत किया गया है। अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही माना जाएगा।











