जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान एक छात्र कार्यकर्ता के पिता से कथित मारपीट के मामले में कार्रवाई; हाई कोर्ट ने कहा—हैबियस कॉर्पस याचिका के जरिए मौजूदा न्यायिक हिरासत को चुनौती देने का आधार नहीं बनता।
नई दिल्ली, 7 सितंबर 2026।
जंतर-मंतर पर हुए एक प्रदर्शन के दौरान एक छात्र कार्यकर्ता के पिता से कथित मारपीट के मामले में गिरफ्तार किए गए सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर स्वतंत्र भारद्वाज को सोमवार को दिल्ली हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली। दिल्ली हाई कोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली हैबियस कॉर्पस याचिका खारिज कर दी।
यह याचिका स्वतंत्र भारद्वाज की ओर से उनके पिता रणधीर कुमार झा के माध्यम से दाखिल की गई थी। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंदर दुदेजा की पीठ ने की। अदालत ने याचिका खारिज करते हुए संकेत दिया कि जब आरोपी को सक्षम अदालत के आदेश के बाद न्यायिक हिरासत में भेजा जा चुका है, तब हिरासत की वैधता को इस तरीके से चुनौती देने का आधार नहीं बनता।
क्या है पूरा मामला ?
मामला दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए एक प्रदर्शन से जुड़ा है। पुलिस और मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, 23 जून 2026 को प्रदर्शन के दौरान छात्र कार्यकर्ता निशु आजाद के पिता संजय कुमार के साथ कथित तौर पर मारपीट हुई थी।
एफआईआर से जुड़ी रिपोर्ट के अनुसार, विवाद प्रदर्शन की वीडियो बनाए जाने को लेकर शुरू हुआ था। शिकायत के मुताबिक संजय कुमार अपनी नाबालिग बेटी और एक अन्य व्यक्ति के साथ प्रदर्शन में मौजूद थे और मोबाइल फोन से वीडियो बना रहे थे। इसके बाद कथित तौर पर विवाद हुआ और मारपीट की स्थिति पैदा हुई।
आरोप है कि इस घटना में संजय कुमार को सिर पर चोट लगी। एक रिपोर्ट के अनुसार, मेडिकल परीक्षण में सिर पर दो कटे हुए घाव दर्ज किए गए थे। शुरुआती एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता की धारा 115(2), 126(2) और 3(5) के तहत मामला दर्ज किया गया था।
वायरल वीडियो के बाद मामला फिर चर्चा में आया
मामले ने उस समय व्यापक ध्यान खींचा जब स्वतंत्र भारद्वाज का एक वीडियो/पॉडकास्ट सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, वीडियो में उन्होंने संजय कुमार के साथ मारपीट करने का दावा किया और राजनीतिक संपर्कों का भी जिक्र किया।
हालांकि, दिल्ली पुलिस ने कथित तौर पर सिर की हड्डी टूटने या गंभीर फ्रैक्चर से जुड़े दावों को मेडिकल रिपोर्ट से समर्थित नहीं बताया। पुलिस के अनुसार चोट साधारण प्रकृति की थी और एक रिपोर्ट में चोट को धातु के कड़े से लगने की बात भी सामने आई।
बाद में भारद्वाज की ओर से घटना को आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई बताया गया। इसलिए मामले में आरोप और बचाव—दोनों पक्षों के दावों को अलग-अलग देखना जरूरी है।
गिरफ्तारी और हिरासत
दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के बाद स्वतंत्र भारद्वाज को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से गिरफ्तार किया गया। रिपोर्टों के मुताबिक, गिरफ्तारी के बाद उन्हें दिल्ली लाया गया और अदालत में पेश किया गया।
शनिवार को उन्हें एक दिन की पुलिस हिरासत में भेजा गया। इसके बाद पुलिस हिरासत समाप्त होने पर उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजा गया। सोमवार को पटियाला हाउस कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सौरभ प्रताप सिंह ललेर ने उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया।
अब उन्हें अगली बार 21 सितंबर 2026 को अदालत में पेश किया जाना है।
SC/ST Act और POCSO से जुड़ा नया घटनाक्रम
मामले में बाद में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम तथा आपराधिक धमकी से संबंधित प्रावधान भी जोड़े गए।
इसके अलावा, एक अलग मामले में POCSO Act के तहत एफआईआर दर्ज किए जाने की रिपोर्ट सामने आई। यह मामला नाबालिग छात्र कार्यकर्ता की ओर से कथित ऑनलाइन धमकी और उत्पीड़न की शिकायत से संबंधित बताया गया है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी एफआईआर में किसी कानून की धाराएं लगना अपने आप में आरोपी को दोषी सिद्ध नहीं करता। अंतिम दोष या निर्दोषता का निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।
हाई कोर्ट में क्या हुआ ?
स्वतंत्र भारद्वाज की ओर से दाखिल हैबियस कॉर्पस याचिका में गिरफ्तारी को गैरकानूनी बताते हुए रिहाई की मांग की गई थी।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष की ओर से यह दलील भी दी गई कि संबंधित एफआईआर को सुप्रीम कोर्ट पहले ही रद्द कर चुका है। दिल्ली पुलिस ने इस दावे का विरोध किया और कहा कि मौजूदा मामले की एफआईआर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द नहीं की गई है।
हाई कोर्ट ने इस दलील पर भी सवाल उठाया कि यदि यह आधार याचिका में स्पष्ट रूप से उठाया ही नहीं गया था तो सुनवाई के दौरान इसे किस आधार पर प्रस्तुत किया जा रहा है। अदालत ने अंततः हैबियस कॉर्पस याचिका खारिज कर दी।
अब आगे क्या ?
फिलहाल स्वतंत्र भारद्वाज न्यायिक हिरासत में हैं और अगली निर्धारित पेशी 21 सितंबर को होगी।
मामले में आगे जांच, एफआईआर में लगाए गए प्रावधानों की न्यायिक समीक्षा और आरोपों पर अदालत की कार्यवाही महत्वपूर्ण होगी।
हिंदी विंडो की संपादकीय टिप्पणी:
यह मामला आरोप, गिरफ्तारी, पुलिस जांच और न्यायिक हिरासत के चरण में है। इसलिए किसी भी पक्ष के आरोप या सोशल मीडिया पर प्रसारित दावों को अंतिम सत्य या दोषसिद्धि के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
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