जंतर-मंतर की बदली पहचान :
दशकों तक जनआंदोलनों का प्रमुख केंद्र रहा जंतर-मंतर अब निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से बाहर। प्रशासनिक व्यवस्था, यातायात और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन पर उठे सवाल।
नई दिल्ली, 12 अक्टूबर 2026।
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों की पहचान रहे जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाए जाने की खबर ने एक बार फिर शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन पर बहस छेड़ दी है। नई व्यवस्था के तहत रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी मैदान को प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थलों के रूप में शामिल किए जाने की जानकारी सामने आई है। इस बदलाव के बाद सवाल उठ रहा है कि संसद और केंद्रीय सरकारी कार्यालयों के नजदीक अपनी मांगें उठाने के लिए पहचाने जाने वाले जंतर-मंतर की जगह अब आंदोलनकारी किन स्थानों पर अपनी आवाज उठाएंगे।
यह केवल किसी एक स्थान की प्रशासनिक स्थिति में बदलाव नहीं है। जंतर-मंतर पिछले तीन दशकों में किसान संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनीतिक दलों, विद्यार्थियों और विभिन्न नागरिक समूहों के विरोध-प्रदर्शनों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। इसलिए इस फैसले का महत्व दिल्ली की कानून-व्यवस्था से आगे बढ़कर लोकतांत्रिक भागीदारी और सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल तक पहुंचता है।
क्या है नया फैसला ?
उपलब्ध विवरणों के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने का निर्णय गृह मंत्रालय की ओर से गठित समिति की सिफारिशों के आधार पर लिया है। प्रदर्शन के लिए तीन वैकल्पिक स्थानों के नाम सामने आए हैं—रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली का सीबीडी मैदान।
इन स्थानों पर प्रदर्शन आयोजित करने की प्रक्रिया, अनुमतियों और अन्य शर्तों के संबंध में विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया यानी एसओपी जारी किए जाने की बात भी कही गई है। इसलिए किसी आंदोलन या सार्वजनिक सभा की योजना बनाने वाले संगठनों के लिए केवल स्थान का नाम जानना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें संबंधित प्राधिकारी से वर्तमान नियमों, अनुमति की प्रक्रिया, निर्धारित क्षमता और लागू प्रतिबंधों की पुष्टि करनी होगी।
इस बदलाव के पीछे प्रशासनिक दृष्टि से भी कई सवाल महत्वपूर्ण हैं। किसी प्रदर्शन स्थल का चयन करते समय भीड़ की संख्या, प्रवेश और निकास के रास्ते, आपातकालीन सेवाओं की उपलब्धता, यातायात पर प्रभाव और आसपास रहने वाले लोगों की सुविधाओं को ध्यान में रखना पड़ता है। हालांकि, नए निर्णय के पीछे प्रत्येक कारण का आधिकारिक विवरण उपलब्ध आदेश और संबंधित प्रशासनिक स्पष्टीकरण से ही स्पष्ट होगा।
ऐतिहासिक वेधशाला से आंदोलन के केंद्र तक
जंतर-मंतर का इतिहास राजनीतिक आंदोलनों से कहीं पुराना है। इसका निर्माण 18वीं शताब्दी में जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने खगोलीय अध्ययन के लिए कराया था। यहां स्थापित विशाल वैज्ञानिक उपकरणों का इस्तेमाल समय, ग्रहों की स्थिति और खगोलीय घटनाओं के अध्ययन के लिए किया जाता था।
समय के साथ दिल्ली का विस्तार हुआ और जंतर-मंतर राजधानी के महत्वपूर्ण राजनीतिक तथा प्रशासनिक क्षेत्रों के निकट स्थित एक ऐतिहासिक स्थल बन गया। संसद और केंद्रीय सरकारी कार्यालयों के आसपास होने के कारण इस स्थान का महत्व केवल विरासत तक सीमित नहीं रहा। यह नागरिकों और संगठनों के लिए अपनी मांगों को सार्वजनिक रूप से सामने रखने का प्रमुख ठिकाना बन गया।
जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में पहचान मिलने की कहानी 1990 के दशक से जुड़ी है। इससे पहले इंडिया गेट के निकट बोट क्लब का क्षेत्र बड़े धरना-प्रदर्शनों के लिए जाना जाता था। वर्ष 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में बड़ी संख्या में किसान वहां जुटे थे। किसानों ने कृषि उपज के बेहतर दाम, बिजली-पानी से जुड़ी राहत और बकाया भुगतान जैसे मुद्दे उठाए थे।
बड़े प्रदर्शनों के बाद बोट क्लब क्षेत्र में सभाओं को लेकर प्रतिबंध लगाए गए। इसके बाद 1993 से जंतर-मंतर दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों के प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा। संसद के निकटता और सीमित क्षेत्र में प्रदर्शन आयोजित करने की सुविधा ने इसे आंदोलनों के लिए विशिष्ट पहचान दी।
बड़े आंदोलनों का साक्षी रहा जंतर-मंतर
जंतर-मंतर पर हुए कई आंदोलनों ने राष्ट्रीय राजनीति और सामाजिक विमर्श में महत्वपूर्ण स्थान बनाया।
2011 का जन लोकपाल आंदोलन: सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने 5 अप्रैल 2011 को भ्रष्टाचार के खिलाफ और जन लोकपाल विधेयक की मांग को लेकर यहां अनशन शुरू किया। आंदोलन को देशभर में व्यापक समर्थन मिला। इस अभियान से जुड़े कई कार्यकर्ता बाद में भारतीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका में आए।
2017 में तमिलनाडु के किसानों का प्रदर्शन: कर्ज और सूखे की समस्या से जूझ रहे किसानों ने कई सप्ताह तक प्रदर्शन किया। उनकी मांगों में कर्ज राहत, सूखा राहत पैकेज और कावेरी जल प्रबंधन से जुड़े मुद्दे शामिल थे। किसानों ने अपनी स्थिति की गंभीरता की ओर ध्यान खींचने के लिए प्रतीकात्मक और असामान्य तरीके भी अपनाए।
2019 में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन: नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए के विरोध में देश के विभिन्न हिस्सों में हुए प्रदर्शनों के दौरान जंतर-मंतर भी विरोध की आवाज का एक प्रमुख मंच रहा।
2023 में पहलवानों का आंदोलन: भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ महिला पहलवानों ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की। विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पूनिया सहित कई पहलवानों के धरने ने महिला खिलाड़ियों की सुरक्षा, शिकायतों की सुनवाई और खेल संस्थाओं की जवाबदेही से जुड़े प्रश्नों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया। आरोपों और उनसे संबंधित कानूनी प्रक्रिया का मूल्यांकन संबंधित जांच तथा न्यायिक अभिलेखों के आधार पर किया जाना चाहिए।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शन केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहे। यहां सामाजिक न्याय, कृषि संकट, भ्रष्टाचार, नागरिक अधिकार और संस्थागत जवाबदेही जैसे अलग-अलग विषयों को सार्वजनिक मंच मिला।
2017 का विवाद और 2018 में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका
जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों को लेकर विवाद पहले भी सामने आ चुका है। अक्टूबर 2017 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने स्थानीय निवासियों की शिकायतों के बाद यहां होने वाले धरना-प्रदर्शनों पर रोक लगाने और प्रदर्शनकारियों को वैकल्पिक स्थल पर स्थानांतरित करने का निर्देश दिया था। शिकायतों में ध्वनि प्रदूषण, गंदगी और आसपास के निवासियों को होने वाली असुविधा जैसे मुद्दे शामिल थे।
इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। जुलाई 2018 में मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में शीर्ष अदालत ने जंतर-मंतर और बोट क्लब क्षेत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध के बजाय उन्हें उचित नियमों के तहत नियंत्रित करने के दृष्टिकोण पर जोर दिया। अदालत के सामने मूल प्रश्न यह था कि नागरिकों के विरोध के अधिकार और दूसरे नागरिकों के जीवन, स्वास्थ्य, यातायात तथा सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े हितों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
यह न्यायिक पृष्ठभूमि वर्तमान बदलाव को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। किसी स्थान को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने का प्रशासनिक फैसला और पूरे देश में शांतिपूर्ण विरोध के संवैधानिक अधिकार को समाप्त करना दो अलग-अलग बातें हैं। नए आदेश की वास्तविक कानूनी सीमा, वैकल्पिक स्थानों की उपलब्धता और अनुमति की शर्तों का मूल्यांकन आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर किया जाना चाहिए।
क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना मौलिक अधिकार है ?
भारतीय संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा की स्वतंत्रता देता है। अनुच्छेद 19(1)(क) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(ख) नागरिकों को शांतिपूर्वक और बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार प्रदान करता है।
लेकिन इन अधिकारों का अर्थ यह नहीं है कि किसी भी सार्वजनिक स्थान पर, किसी भी समय और बिना किसी नियमन के सभा आयोजित की जा सकती है। संविधान के अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के तहत निर्धारित संवैधानिक आधारों पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना, यातायात को नियंत्रित करना और आपातकालीन सेवाओं की आवाजाही सुनिश्चित करना प्रशासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं।
इसी प्रकार, प्रशासनिक नियंत्रण का अर्थ भी यह नहीं होना चाहिए कि शांतिपूर्ण असहमति के लिए व्यावहारिक रूप से कोई प्रभावी स्थान ही उपलब्ध न रहे। प्रतिबंधों की वैधता, आवश्यकता और अनुपातिकता परिस्थितियों तथा लागू कानून के आधार पर परखी जा सकती है।
प्रदर्शन की अनुमति लेते समय आयोजकों को संबंधित पुलिस या सक्षम प्रशासनिक प्राधिकारी से लागू प्रक्रिया की जानकारी लेनी चाहिए। प्रस्तावित कार्यक्रम का स्थान, तारीख, समय, संभावित प्रतिभागियों की संख्या, यातायात पर संभावित प्रभाव और सुरक्षा संबंधी व्यवस्थाएं अनुमति प्रक्रिया में महत्वपूर्ण हो सकती हैं। किसी विशेष आयोजन के लिए आवेदन की समय-सीमा और शर्तों की पुष्टि वर्तमान आदेश से की जानी चाहिए।
आगे क्या बदलेगा ?
जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने के बाद तीन मुद्दे विशेष रूप से महत्वपूर्ण होंगे।
पहला, क्या नए निर्धारित स्थल सभी प्रकार के शांतिपूर्ण आंदोलनों के लिए पर्याप्त क्षमता और सुविधाएं उपलब्ध करा पाएंगे? दूसरा, क्या प्रदर्शनकारियों को अपनी मांगें संबंधित सरकारी संस्थानों और आम जनता तक पहुंचाने के लिए व्यावहारिक अवसर मिलेगा? तीसरा, क्या नए नियमों में अनुमति, समय-सीमा, भीड़ प्रबंधन और अस्वीकृति के आधार स्पष्ट होंगे?
इन सवालों के उत्तर केवल स्थलों की घोषणा से नहीं, बल्कि उनके वास्तविक संचालन और नियमों के क्रियान्वयन से मिलेंगे। यदि नई व्यवस्था से यातायात और स्थानीय निवासियों की समस्याओं का समाधान होता है तथा शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के लिए पर्याप्त विकल्प उपलब्ध रहते हैं, तो प्रशासनिक उद्देश्य और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाया जा सकता है। इसके विपरीत, यदि वैकल्पिक स्थल पहुंच, सुविधाओं या सार्वजनिक दृश्यता के लिहाज से प्रभावी नहीं होते, तो उनकी उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
निष्कर्ष: जंतर-मंतर की नई प्रशासनिक स्थिति दिल्ली के सार्वजनिक जीवन में एक महत्वपूर्ण बदलाव है। यह स्थान ऐतिहासिक वेधशाला से लोकतांत्रिक असहमति के प्रतीक तक की यात्रा का साक्षी रहा है। अब असली कसौटी यह होगी कि नई व्यवस्था सार्वजनिक सुरक्षा और नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार—दोनों को कितना प्रभावी संरक्षण देती है। लोकतंत्र में असहमति की जगह और सार्वजनिक व्यवस्था, दोनों आवश्यक हैं; चुनौती इन दोनों के बीच न्यायसंगत संतुलन बनाए रखने की है।












