डॉक्टरों को फार्मा कंपनियों … UCPMP 2024 की प्रभावशीलता पर उठे सवालों के बीच केंद्र को समिति गठित करने का निर्देश; 29 जनवरी को अनुपालन पर होगी सुनवाई !
नई दिल्ली, 8 अक्टूबर 2026। डॉक्टरों को फार्मास्युटिकल कंपनियों की ओर से दिए जाने वाले उपहार, यात्रा, आतिथ्य अथवा अन्य प्रोत्साहनों के जरिए दवाओं के प्रचार-प्रसार से जुड़े सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को ऐसी मार्केटिंग प्रथाओं को नियंत्रित करने के लिए वैधानिक नियमन की सिफारिश करने वाली एक समिति गठित करने का निर्देश दिया है।
यह आदेश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने Federation of Medical and Sales Representatives Associations of India & Ors. v. Union of India & Ors. मामले में दिया। यह मामला W.P.(C) No. 323/2021 के रूप में लंबित है।
अदालत के अनुसार, प्रस्तावित समिति विभिन्न सुझावों और अभ्यावेदनों पर विचार करेगी और केंद्र सरकार को अपनी सिफारिशें देगी। मामले को 29 जनवरी को केंद्र की ओर से दाखिल किए जाने वाले अनुपालन हलफनामे पर विचार के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
विवाद की शुरुआत कहां से हुई ?
मामले का मूल प्रश्न यह है कि फार्मास्युटिकल कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों को किस तरह प्रभावी और कानूनी रूप से लागू होने वाले ढांचे के तहत नियंत्रित किया जाए। याचिका में दवाओं को बढ़ावा देने के लिए डॉक्टरों और फार्मा कंपनियों के बीच होने वाले ऐसे लेन-देन और प्रोत्साहनों पर प्रभावी नियमन की मांग की गई है, जिन्हें अनैतिक माना जा सकता है।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से बताया गया था कि फार्मास्युटिकल कंपनियों की अनैतिक गतिविधियों पर वैधानिक ढांचे की जरूरत है या नहीं, और यदि जरूरत है तो उसका स्वरूप क्या होना चाहिए—इस पर विचार के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाने का निर्णय लिया गया है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से हालांकि इस बात पर सवाल उठाया गया कि इस विषय पर पहले भी समिति गठित किए जाने की बात सामने आ चुकी है। उनका तर्क था कि डॉक्टरों द्वारा लाभ स्वीकार करने पर कार्रवाई की व्यवस्था होने के बावजूद, ऐसे लाभ देने वाली फार्मास्युटिकल कंपनियों के खिलाफ स्पष्ट और समान रूप से प्रभावी वैधानिक व्यवस्था का अभाव है।
UCPMP 2024 क्या है ?
भारत सरकार के फार्मास्युटिकल्स विभाग ने मार्च 2024 में Uniform Code for Pharmaceutical Marketing Practices—UCPMP 2024 जारी किया था। इसका उद्देश्य दवाओं के प्रचार-प्रसार में नैतिक मानकों को मजबूत करना और फार्मास्युटिकल कंपनियों तथा स्वास्थ्य पेशेवरों के बीच संबंधों को नियंत्रित करना है। आधिकारिक कोड के अनुसार दवाओं से संबंधित जानकारी संतुलित, अद्यतन, सत्यापन योग्य और गैर-भ्रामक होनी चाहिए।
UCPMP 2024 में स्वास्थ्य पेशेवरों से जुड़े कई प्रावधान हैं। इनमें व्यक्तिगत लाभ के लिए उपहार देने पर रोक, कुछ परिस्थितियों को छोड़कर यात्रा और आतिथ्य की सुविधा पर प्रतिबंध तथा नकद या मौद्रिक लाभ देने पर रोक जैसे प्रावधान शामिल हैं।
कोड में दवाओं के मुफ्त नमूनों को लेकर भी शर्तें निर्धारित हैं। ऐसे नमूने केवल दवा लिखने के लिए योग्य स्वास्थ्य पेशेवरों को दिए जा सकते हैं और कंपनियों को इनके वितरण का रिकॉर्ड रखना होता है। आधिकारिक दस्तावेजों में कंपनियों के मार्केटिंग खर्च और मुफ्त नमूनों से संबंधित विवरण प्रस्तुत करने के लिए भी प्रारूप उपलब्ध कराया गया है।
सुप्रीम कोर्ट की पुरानी टिप्पणी क्यों महत्वपूर्ण है ?
इस मामले की पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट का वर्ष 2022 का Apex Laboratories Pvt. Ltd. v. Deputy Commissioner of Income Tax फैसला भी महत्वपूर्ण है। उस फैसले में अदालत ने डॉक्टर और मरीज के बीच भरोसे के संबंध पर जोर दिया था और यह चिंता व्यक्त की थी कि फार्मास्युटिकल कंपनियों की ओर से दिए जाने वाले महंगे उपहार अथवा अन्य लाभ डॉक्टरों के प्रिस्क्रिप्शन को प्रभावित कर सकते हैं। अदालत ने ऐसी व्यवस्था को सार्वजनिक हित के लिए नुकसानदेह चक्र से जोड़ा था।
हालांकि, वर्तमान मामले में यह अंतर समझना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने 8 अक्टूबर 2026 को किसी विशेष फार्मा कंपनी या डॉक्टर को दोषी घोषित नहीं किया है। अदालत का मौजूदा निर्देश नियामक व्यवस्था तैयार करने और उसकी वैधानिक प्रभावशीलता पर विचार करने से संबंधित है।
अब आगे क्या होगा ?
केंद्र सरकार को समिति गठित करनी है। समिति विभिन्न पक्षों के सुझाव और अभ्यावेदन पर विचार करके यह बताएगी कि फार्मास्युटिकल कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग गतिविधियों को रोकने के लिए किस तरह का वैधानिक ढांचा बनाया जा सकता है।
इसके बाद केंद्र सरकार समिति की सिफारिशों पर निर्णय लेगी। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मामले को 29 जनवरी को अनुपालन हलफनामे के लिए सूचीबद्ध किया है। इसलिए आगे की दिशा समिति की संरचना, उसके विचार-विमर्श और केंद्र की अगली कार्रवाई पर निर्भर करेगी।
तथ्य और आरोप में अंतर
इस मामले में यह दावा करना उचित नहीं होगा कि हर डॉक्टर फार्मा कंपनियों से लाभ लेकर दवाएं लिखता है या कि हर फार्मास्युटिकल कंपनी डॉक्टरों को प्रभावित करने के लिए फ्रीबी देती है। ऐसा कोई सामान्य निष्कर्ष इस आदेश से नहीं निकलता।
अदालत के समक्ष मुद्दा उन अनैतिक मार्केटिंग प्रथाओं को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने का है, जिनमें डॉक्टरों के निर्णय को अनुचित आर्थिक या अन्य लाभों से प्रभावित करने की आशंका हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट का ताजा निर्देश इसी व्यापक नियामक सवाल को अधिक स्पष्ट और प्रभावी वैधानिक ढांचे की दिशा में ले जाने वाला कदम है।
निष्कर्षतः, अदालत के आदेश का केंद्र डॉक्टरों को तत्काल किसी नई सजा का प्रावधान करना नहीं, बल्कि फार्मास्युटिकल कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों के लिए अधिक प्रभावी, स्पष्ट और वैधानिक नियमन की संभावनाओं की जांच करना है। आने वाले समय में समिति की सिफारिशें और केंद्र सरकार का निर्णय इस बहस की अगली दिशा तय करेंगे।












