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नेपाल-तिब्बत बाढ़ से भारत के हिमालय के लिए चेतावनी मिली !

नेपाल-तिब्बत की बाढ़ ने भारत के हिमालय के लिए बजाई खतरे की घंटी, ग्लेशियरों और पिघलती बर्फ से बढ़ रहा अचानक बाढ़ का जोखिम

नई दिल्ली/देहरादून। नेपाल और तिब्बत में हालिया विनाशकारी बाढ़ और मलबे के सैलाब ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्र में बदलते मौसम, तेजी से पीछे हटते ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों से पैदा होने वाले खतरे को दुनिया के सामने ला दिया है।

इस आपदा का असर केवल नेपाल और तिब्बत तक सीमित नहीं माना जा सकता। हिमालय की नदियों और उनसे जुड़े जलग्रहण क्षेत्रों का एक बड़ा हिस्सा भारत से भी जुड़ा है। ऐसे में वैज्ञानिकों के अनुसार, हिमालयी पर्यावरण में हो रहे बदलाव भारत के लिए भी भविष्य की गंभीर आपदा-चेतावनी हो सकते हैं।

हालिया नेपाल आपदा के संदर्भ में The Guardian ने भारतीय हिमालय के भविष्य पर विशेषज्ञों से बात की। रिपोर्ट में IIT Bhubaneswar के ग्लेशियल झील और GLOF विशेषज्ञ डॉ. अशिम सत्तार ने बताया कि हिमालय में खतरे को केवल ग्लेशियरों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। ग्लेशियर, ग्लेशियल झील और पर्माफ्रॉस्ट—तीनों में बदलाव भविष्य में अचानक मलबे के बहाव और बाढ़ की घटनाओं को बढ़ा सकते हैं।

आखिर GLOF क्या है ?

GLOF यानी Glacial Lake Outburst Flood ऐसी अचानक आने वाली बाढ़ है, जिसमें ग्लेशियर के पीछे या उसके आसपास बनी झील का पानी प्राकृतिक बांध टूटने या कमजोर होने के कारण बहुत तेजी से नीचे की ओर बहने लगता है।

यह पानी अपने साथ चट्टान, बर्फ, मिट्टी और भारी मलबा भी बहा सकता है। इसलिए ऐसी घटनाएं सामान्य नदी-बाढ़ से कहीं अधिक विनाशकारी हो सकती हैं।

हिमालय में ग्लेशियरों के पीछे हटने से कई स्थानों पर ग्लेशियल झीलों का आकार बढ़ रहा है। ISRO के सैटेलाइट अध्ययन के अनुसार, 1984 से 2023 के बीच भारतीय हिमालयी नदी घाटियों में 676 ग्लेशियल झीलों के आकार में उल्लेखनीय विस्तार पाया गया। इनमें 130 झीलें भारत के भीतर स्थित हैं।

ISRO के अनुसार, इन 676 विस्तारित झीलों में 601 झीलों का क्षेत्रफल 1984 की तुलना में दोगुने से अधिक हो चुका था।

सिर्फ ग्लेशियर ही खतरा नहीं

विशेषज्ञों के अनुसार हिमालय में एक दूसरा महत्वपूर्ण खतरा पर्माफ्रॉस्ट यानी लंबे समय से जमी हुई जमीन का गर्म होकर कमजोर होना है।

जब तापमान बढ़ने से ऐसी जमीन कमजोर होती है, तो पहाड़ों पर मौजूद चट्टान और मलबा अधिक आसानी से खिसक सकता है। इसके परिणामस्वरूप अचानक debris flow, यानी चट्टान, मिट्टी, पानी और बर्फ का तेज बहाव पैदा हो सकता है।

यही वजह है कि जलवायु परिवर्तन का असर केवल तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव हिमालय की भौगोलिक स्थिरता पर भी पड़ सकता है।

भारत के लिए कितना बड़ा खतरा ?

भारत के हिमालयी राज्यों में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भी हिमालयी जोखिम वाले क्षेत्रों में आते हैं।

भारत सरकार ने National Glacial Lake Outburst Flood Risk Mitigation Programme यानी NGRMP के तहत उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों की पहचान, निगरानी, Early Warning Systems और अन्य संरचनात्मक एवं गैर-संरचनात्मक उपायों पर काम शुरू किया है।

सरकारी जानकारी के अनुसार इस कार्यक्रम के पहले चरण में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश को शामिल किया गया है। कार्यक्रम के लिए कुल 150 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

भारत पहले से क्या कर रहा है ?

भारत में हिमालयी ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों की निगरानी के लिए सैटेलाइट तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है।

ISRO के अनुसार, दुर्गम और ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में सैटेलाइट रिमोट सेंसिंग विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि जमीन पर हर स्थान की लगातार निगरानी करना बेहद कठिन है।

भारत सरकार के अनुसार NGRMP के तहत Early Warning Systems, Automatic Weather Stations और जोखिम वाले क्षेत्रों की वैज्ञानिक पहचान पर काम किया जा रहा है।

सिक्किम में भी GLOF जोखिम के बाद Automatic Weather Stations और शुरुआती चेतावनी व्यवस्था को मजबूत करने के प्रयास किए गए हैं।

सबसे बड़ी चुनौती—पहाड़ों में चेतावनी कितनी जल्दी पहुंचेगी ?

किसी ग्लेशियल झील के अचानक टूटने और बाढ़ के नीचे की ओर पहुंचने के बीच समय बहुत कम हो सकता है।

इसलिए केवल यह पता होना पर्याप्त नहीं है कि कौन-सी झील खतरनाक है। महत्वपूर्ण यह है कि:

  • झील में बदलाव की निगरानी लगातार हो,
  • खतरे का वैज्ञानिक आकलन किया जाए,
  • स्थानीय प्रशासन को तुरंत सूचना मिले,
  • गांवों और कस्बों तक चेतावनी पहुंचे,
  • लोगों के पास सुरक्षित निकासी मार्ग हों,
  • और स्थानीय समुदाय को पहले से प्रशिक्षण दिया गया हो।

यही कारण है कि विशेषज्ञों ने community-based early warning systems पर जोर दिया है।

क्या हिमालय में आपदाओं को पूरी तरह रोका जा सकता है ?

विशेषज्ञों के मुताबिक हिमालयी प्राकृतिक घटनाओं को पूरी तरह रोकना बेहद कठिन है। लेकिन उनसे होने वाली मौतों और आर्थिक नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

इसके लिए सबसे जरूरी है—जोखिम वाले इलाकों में exposure कम करना।

यानी जहां संभावित बाढ़ या debris flow पहुंच सकता है, वहां अनियोजित निर्माण, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे और बड़ी आबादी की मौजूदगी को कम करना।

नेपाल की आपदा से भारत को क्या सीख मिलती है ?

नेपाल और तिब्बत की हालिया आपदा को केवल एक अलग प्राकृतिक दुर्घटना के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा।

यह हिमालयी क्षेत्र के लिए एक बड़ी चेतावनी है कि बदलते तापमान, पीछे हटते ग्लेशियर, बढ़ती ग्लेशियल झीलें, कमजोर होती पहाड़ी जमीन और चरम मौसम की घटनाएं मिलकर भविष्य में अधिक जटिल आपदाएं पैदा कर सकती हैं।

भारत के लिए इसका अर्थ साफ है—हिमालय को केवल पर्यटन, सड़क, बांध और विकास के नजरिए से नहीं, बल्कि एक अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में देखना होगा।

हिमालय बदल रहा है। सवाल यह नहीं है कि खतरा है या नहीं—सवाल यह है कि भारत उस खतरे के आने से पहले कितनी तैयारी कर पाता है।

नेपाल-तिब्बत की बाढ़ ने भारत के हिमालय के लिए बजाई खतरे की घंटी, ग्लेशियरों और पिघलती बर्फ से बढ़ रहा अचानक बाढ़ का जोखिम

नई दिल्ली/देहरादून। नेपाल और तिब्बत में हालिया विनाशकारी बाढ़ और मलबे के सैलाब ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्र में बदलते मौसम, तेजी से पीछे हटते ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों से पैदा होने वाले खतरे को दुनिया के सामने ला दिया है।

इस आपदा का असर केवल नेपाल और तिब्बत तक सीमित नहीं माना जा सकता। हिमालय की नदियों और उनसे जुड़े जलग्रहण क्षेत्रों का एक बड़ा हिस्सा भारत से भी जुड़ा है। ऐसे में वैज्ञानिकों के अनुसार, हिमालयी पर्यावरण में हो रहे बदलाव भारत के लिए भी भविष्य की गंभीर आपदा-चेतावनी हो सकते हैं।

हालिया नेपाल आपदा के संदर्भ में The Guardian ने भारतीय हिमालय के भविष्य पर विशेषज्ञों से बात की। रिपोर्ट में IIT Bhubaneswar के ग्लेशियल झील और GLOF विशेषज्ञ डॉ. अशिम सत्तार ने बताया कि हिमालय में खतरे को केवल ग्लेशियरों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। ग्लेशियर, ग्लेशियल झील और पर्माफ्रॉस्ट—तीनों में बदलाव भविष्य में अचानक मलबे के बहाव और बाढ़ की घटनाओं को बढ़ा सकते हैं।

आखिर GLOF क्या है ?

GLOF यानी Glacial Lake Outburst Flood ऐसी अचानक आने वाली बाढ़ है, जिसमें ग्लेशियर के पीछे या उसके आसपास बनी झील का पानी प्राकृतिक बांध टूटने या कमजोर होने के कारण बहुत तेजी से नीचे की ओर बहने लगता है।

यह पानी अपने साथ चट्टान, बर्फ, मिट्टी और भारी मलबा भी बहा सकता है। इसलिए ऐसी घटनाएं सामान्य नदी-बाढ़ से कहीं अधिक विनाशकारी हो सकती हैं।

हिमालय में ग्लेशियरों के पीछे हटने से कई स्थानों पर ग्लेशियल झीलों का आकार बढ़ रहा है। ISRO के सैटेलाइट अध्ययन के अनुसार, 1984 से 2023 के बीच भारतीय हिमालयी नदी घाटियों में 676 ग्लेशियल झीलों के आकार में उल्लेखनीय विस्तार पाया गया। इनमें 130 झीलें भारत के भीतर स्थित हैं।

ISRO के अनुसार, इन 676 विस्तारित झीलों में 601 झीलों का क्षेत्रफल 1984 की तुलना में दोगुने से अधिक हो चुका था।

सिर्फ ग्लेशियर ही खतरा नहीं

विशेषज्ञों के अनुसार हिमालय में एक दूसरा महत्वपूर्ण खतरा पर्माफ्रॉस्ट यानी लंबे समय से जमी हुई जमीन का गर्म होकर कमजोर होना है।

जब तापमान बढ़ने से ऐसी जमीन कमजोर होती है, तो पहाड़ों पर मौजूद चट्टान और मलबा अधिक आसानी से खिसक सकता है। इसके परिणामस्वरूप अचानक debris flow, यानी चट्टान, मिट्टी, पानी और बर्फ का तेज बहाव पैदा हो सकता है।

यही वजह है कि जलवायु परिवर्तन का असर केवल तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव हिमालय की भौगोलिक स्थिरता पर भी पड़ सकता है।

भारत के लिए कितना बड़ा खतरा ?

भारत के हिमालयी राज्यों में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भी हिमालयी जोखिम वाले क्षेत्रों में आते हैं।

भारत सरकार ने National Glacial Lake Outburst Flood Risk Mitigation Programme यानी NGRMP के तहत उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों की पहचान, निगरानी, Early Warning Systems और अन्य संरचनात्मक एवं गैर-संरचनात्मक उपायों पर काम शुरू किया है।

सरकारी जानकारी के अनुसार इस कार्यक्रम के पहले चरण में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश को शामिल किया गया है। कार्यक्रम के लिए कुल 150 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

भारत पहले से क्या कर रहा है ?

भारत में हिमालयी ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों की निगरानी के लिए सैटेलाइट तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है।

ISRO के अनुसार, दुर्गम और ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में सैटेलाइट रिमोट सेंसिंग विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि जमीन पर हर स्थान की लगातार निगरानी करना बेहद कठिन है।

भारत सरकार के अनुसार NGRMP के तहत Early Warning Systems, Automatic Weather Stations और जोखिम वाले क्षेत्रों की वैज्ञानिक पहचान पर काम किया जा रहा है।

सिक्किम में भी GLOF जोखिम के बाद Automatic Weather Stations और शुरुआती चेतावनी व्यवस्था को मजबूत करने के प्रयास किए गए हैं।

सबसे बड़ी चुनौती—पहाड़ों में चेतावनी कितनी जल्दी पहुंचेगी ?

किसी ग्लेशियल झील के अचानक टूटने और बाढ़ के नीचे की ओर पहुंचने के बीच समय बहुत कम हो सकता है।

इसलिए केवल यह पता होना पर्याप्त नहीं है कि कौन-सी झील खतरनाक है। महत्वपूर्ण यह है कि:

  • झील में बदलाव की निगरानी लगातार हो,
  • खतरे का वैज्ञानिक आकलन किया जाए,
  • स्थानीय प्रशासन को तुरंत सूचना मिले,
  • गांवों और कस्बों तक चेतावनी पहुंचे,
  • लोगों के पास सुरक्षित निकासी मार्ग हों,
  • और स्थानीय समुदाय को पहले से प्रशिक्षण दिया गया हो।

यही कारण है कि विशेषज्ञों ने community-based early warning systems पर जोर दिया है।

क्या हिमालय में आपदाओं को पूरी तरह रोका जा सकता है ?

विशेषज्ञों के मुताबिक हिमालयी प्राकृतिक घटनाओं को पूरी तरह रोकना बेहद कठिन है। लेकिन उनसे होने वाली मौतों और आर्थिक नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

इसके लिए सबसे जरूरी है—जोखिम वाले इलाकों में exposure कम करना।

यानी जहां संभावित बाढ़ या debris flow पहुंच सकता है, वहां अनियोजित निर्माण, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे और बड़ी आबादी की मौजूदगी को कम करना।

नेपाल की आपदा से भारत को क्या सीख मिलती है ?

नेपाल और तिब्बत की हालिया आपदा को केवल एक अलग प्राकृतिक दुर्घटना के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा।

यह हिमालयी क्षेत्र के लिए एक बड़ी चेतावनी है कि बदलते तापमान, पीछे हटते ग्लेशियर, बढ़ती ग्लेशियल झीलें, कमजोर होती पहाड़ी जमीन और चरम मौसम की घटनाएं मिलकर भविष्य में अधिक जटिल आपदाएं पैदा कर सकती हैं।

भारत के लिए इसका अर्थ साफ है—हिमालय को केवल पर्यटन, सड़क, बांध और विकास के नजरिए से नहीं, बल्कि एक अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में देखना होगा।

हिमालय बदल रहा है। सवाल यह नहीं है कि खतरा है या नहीं—सवाल यह है कि भारत उस खतरे के आने से पहले कितनी तैयारी कर पाता है।

नेपाल-तिब्बत की बाढ़ ने भारत के हिमालय के लिए बजाई खतरे की घंटी, ग्लेशियरों और पिघलती बर्फ से बढ़ रहा अचानक बाढ़ का जोखिम

नई दिल्ली/देहरादून। नेपाल और तिब्बत में हालिया विनाशकारी बाढ़ और मलबे के सैलाब ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्र में बदलते मौसम, तेजी से पीछे हटते ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों से पैदा होने वाले खतरे को दुनिया के सामने ला दिया है।

इस आपदा का असर केवल नेपाल और तिब्बत तक सीमित नहीं माना जा सकता। हिमालय की नदियों और उनसे जुड़े जलग्रहण क्षेत्रों का एक बड़ा हिस्सा भारत से भी जुड़ा है। ऐसे में वैज्ञानिकों के अनुसार, हिमालयी पर्यावरण में हो रहे बदलाव भारत के लिए भी भविष्य की गंभीर आपदा-चेतावनी हो सकते हैं।

हालिया नेपाल आपदा के संदर्भ में The Guardian ने भारतीय हिमालय के भविष्य पर विशेषज्ञों से बात की। रिपोर्ट में IIT Bhubaneswar के ग्लेशियल झील और GLOF विशेषज्ञ डॉ. अशिम सत्तार ने बताया कि हिमालय में खतरे को केवल ग्लेशियरों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। ग्लेशियर, ग्लेशियल झील और पर्माफ्रॉस्ट—तीनों में बदलाव भविष्य में अचानक मलबे के बहाव और बाढ़ की घटनाओं को बढ़ा सकते हैं।

आखिर GLOF क्या है ?

GLOF यानी Glacial Lake Outburst Flood ऐसी अचानक आने वाली बाढ़ है, जिसमें ग्लेशियर के पीछे या उसके आसपास बनी झील का पानी प्राकृतिक बांध टूटने या कमजोर होने के कारण बहुत तेजी से नीचे की ओर बहने लगता है।

यह पानी अपने साथ चट्टान, बर्फ, मिट्टी और भारी मलबा भी बहा सकता है। इसलिए ऐसी घटनाएं सामान्य नदी-बाढ़ से कहीं अधिक विनाशकारी हो सकती हैं।

हिमालय में ग्लेशियरों के पीछे हटने से कई स्थानों पर ग्लेशियल झीलों का आकार बढ़ रहा है। ISRO के सैटेलाइट अध्ययन के अनुसार, 1984 से 2023 के बीच भारतीय हिमालयी नदी घाटियों में 676 ग्लेशियल झीलों के आकार में उल्लेखनीय विस्तार पाया गया। इनमें 130 झीलें भारत के भीतर स्थित हैं।

ISRO के अनुसार, इन 676 विस्तारित झीलों में 601 झीलों का क्षेत्रफल 1984 की तुलना में दोगुने से अधिक हो चुका था।

सिर्फ ग्लेशियर ही खतरा नहीं

विशेषज्ञों के अनुसार हिमालय में एक दूसरा महत्वपूर्ण खतरा पर्माफ्रॉस्ट यानी लंबे समय से जमी हुई जमीन का गर्म होकर कमजोर होना है।

जब तापमान बढ़ने से ऐसी जमीन कमजोर होती है, तो पहाड़ों पर मौजूद चट्टान और मलबा अधिक आसानी से खिसक सकता है। इसके परिणामस्वरूप अचानक debris flow, यानी चट्टान, मिट्टी, पानी और बर्फ का तेज बहाव पैदा हो सकता है।

यही वजह है कि जलवायु परिवर्तन का असर केवल तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव हिमालय की भौगोलिक स्थिरता पर भी पड़ सकता है।

भारत के लिए कितना बड़ा खतरा ?

भारत के हिमालयी राज्यों में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भी हिमालयी जोखिम वाले क्षेत्रों में आते हैं।

भारत सरकार ने National Glacial Lake Outburst Flood Risk Mitigation Programme यानी NGRMP के तहत उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों की पहचान, निगरानी, Early Warning Systems और अन्य संरचनात्मक एवं गैर-संरचनात्मक उपायों पर काम शुरू किया है।

सरकारी जानकारी के अनुसार इस कार्यक्रम के पहले चरण में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश को शामिल किया गया है। कार्यक्रम के लिए कुल 150 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

भारत पहले से क्या कर रहा है ?

भारत में हिमालयी ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों की निगरानी के लिए सैटेलाइट तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है।

ISRO के अनुसार, दुर्गम और ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में सैटेलाइट रिमोट सेंसिंग विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि जमीन पर हर स्थान की लगातार निगरानी करना बेहद कठिन है।

भारत सरकार के अनुसार NGRMP के तहत Early Warning Systems, Automatic Weather Stations और जोखिम वाले क्षेत्रों की वैज्ञानिक पहचान पर काम किया जा रहा है।

सिक्किम में भी GLOF जोखिम के बाद Automatic Weather Stations और शुरुआती चेतावनी व्यवस्था को मजबूत करने के प्रयास किए गए हैं।

सबसे बड़ी चुनौती—पहाड़ों में चेतावनी कितनी जल्दी पहुंचेगी ?

किसी ग्लेशियल झील के अचानक टूटने और बाढ़ के नीचे की ओर पहुंचने के बीच समय बहुत कम हो सकता है।

इसलिए केवल यह पता होना पर्याप्त नहीं है कि कौन-सी झील खतरनाक है। महत्वपूर्ण यह है कि:

  • झील में बदलाव की निगरानी लगातार हो,
  • खतरे का वैज्ञानिक आकलन किया जाए,
  • स्थानीय प्रशासन को तुरंत सूचना मिले,
  • गांवों और कस्बों तक चेतावनी पहुंचे,
  • लोगों के पास सुरक्षित निकासी मार्ग हों,
  • और स्थानीय समुदाय को पहले से प्रशिक्षण दिया गया हो।

यही कारण है कि विशेषज्ञों ने community-based early warning systems पर जोर दिया है।

क्या हिमालय में आपदाओं को पूरी तरह रोका जा सकता है ?

विशेषज्ञों के मुताबिक हिमालयी प्राकृतिक घटनाओं को पूरी तरह रोकना बेहद कठिन है। लेकिन उनसे होने वाली मौतों और आर्थिक नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

इसके लिए सबसे जरूरी है—जोखिम वाले इलाकों में exposure कम करना।

यानी जहां संभावित बाढ़ या debris flow पहुंच सकता है, वहां अनियोजित निर्माण, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे और बड़ी आबादी की मौजूदगी को कम करना।

नेपाल की आपदा से भारत को क्या सीख मिलती है ?

नेपाल और तिब्बत की हालिया आपदा को केवल एक अलग प्राकृतिक दुर्घटना के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा।

यह हिमालयी क्षेत्र के लिए एक बड़ी चेतावनी है कि बदलते तापमान, पीछे हटते ग्लेशियर, बढ़ती ग्लेशियल झीलें, कमजोर होती पहाड़ी जमीन और चरम मौसम की घटनाएं मिलकर भविष्य में अधिक जटिल आपदाएं पैदा कर सकती हैं।

भारत के लिए इसका अर्थ साफ है—हिमालय को केवल पर्यटन, सड़क, बांध और विकास के नजरिए से नहीं, बल्कि एक अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में देखना होगा।

हिमालय बदल रहा है। सवाल यह नहीं है कि खतरा है या नहीं—सवाल यह है कि भारत उस खतरे के आने से पहले कितनी तैयारी कर पाता है।

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