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बेटे-बहू से बिगड़े रिश्ते, बुजुर्गों ने बदली वसीयत : नोएडा में छह महीने में 392 वसीयतनामे निरस्त

बेटे-बहू से बिगड़े रिश्ते, बुजुर्गों ने बदली वसीयत

बेटे-बहू से बिगड़े रिश्ते, बुजुर्गों ने बदली वसीयत :

अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच 2,466 वसीयतनामे दर्ज हुए, इनमें करीब 15.9 प्रतिशत बाद में निरस्त किए गए; विशेषज्ञों के मुताबिक वसीयत बदलना कानूनी रूप से संभव है, लेकिन हर निरस्तीकरण का कारण पारिवारिक विवाद नहीं होता !

नोएडा में पारिवारिक रिश्तों में बदलाव और संपत्ति के उत्तराधिकार से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मामला सामने आया है। अमर उजाला की 2 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, सेक्टर-33ए स्थित उप निबंधक कार्यालय से प्राप्त आंकड़ों में अप्रैल से सितंबर 2026 के छह महीनों के दौरान कुल 2,466 वसीयतनामे दर्ज किए गए। इनमें से 392 वसीयतनामे बाद में निरस्त कर दिए गए। यह कुल संख्या का लगभग 15.9 प्रतिशत है। रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि वसीयतनामा निरस्त करने के कारण व्यक्तिगत होते हैं और हर मामले को पारिवारिक विवाद से जोड़ना उचित नहीं होगा।

रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2026 में वसीयतनामा निरस्त कराने के सबसे अधिक मामले सामने आए। इस महीने कुल 574 वसीयतनामे दर्ज हुए, जिनमें से 112 बाद में निरस्त किए गए। यह लगभग 19.5 प्रतिशत बैठता है। अप्रैल में 468 वसीयतनामों में से 73, मई में 413 में से 72, जून में 178 में से 23, अगस्त में 422 में से 56 और सितंबर में 411 में से 56 वसीयतनामे निरस्त हुए।

इन आंकड़ों के पीछे की व्यक्तिगत परिस्थितियों को लेकर रिपोर्ट में दो उदाहरण दिए गए हैं। पहले मामले में नोएडा बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रवीण डेढ़ा के हवाले से बताया गया कि सेक्टर-62 के एक बुजुर्ग ने 24 जुलाई को अपनी संपत्ति दोनों बेटों के नाम आधी-आधी करने के लिए वसीयतनामा दर्ज कराया था। रिपोर्ट के मुताबिक, बाद में मां की सेवा नहीं किए जाने की शिकायत के बाद सितंबर में उस वसीयतनामे को निरस्त कराया गया।

दूसरे मामले में डीड राइटर अमित सिंह के हवाले से बताया गया कि सोरखा निवासी 55 वर्षीय महिला ने बेटे की शादी के बाद भूमि और संपत्ति बहू के नाम करने के लिए अप्रैल में वसीयतनामा दर्ज कराया था। रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त में महिला ने सेवा न किए जाने की शिकायत करते हुए वसीयतनामा निरस्त कराने की मांग की।

यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वसीयतनामा व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति के बंटवारे से संबंधित इच्छा को दर्ज करता है। भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 में वसीयत को संपत्ति के संबंध में व्यक्ति की ऐसी कानूनी घोषणा के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसे उसकी मृत्यु के बाद प्रभावी किया जाना है। इसी कानून की धारा 70 में निर्धारित परिस्थितियों में वसीयत को बाद की वसीयत या निर्धारित तरीके से किए गए निरस्तीकरण के जरिए रद्द करने का प्रावधान है।

इसका अर्थ यह है कि किसी व्यक्ति द्वारा पहले बनाई गई वसीयत को परिस्थितियों के अनुसार बाद में बदला या निरस्त किया जा सकता है। हालांकि, वसीयत का पंजीकरण और उसका निरस्तीकरण अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाओं और परिस्थितियों पर निर्भर कर सकते हैं, इसलिए किसी व्यक्तिगत मामले में केवल समाचार रिपोर्ट के आधार पर अंतिम कानूनी निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

उत्तर प्रदेश के स्टाम्प एवं रजिस्ट्रेशन विभाग की वेबसाइट पर भी वसीयतनामा से संबंधित पंजीकरण और दस्तावेजों की सेवाओं का उल्लेख है। विभाग की जानकारी में वसीयतनामा से संबंधित अभिलेखों के निरीक्षण और पंजीकरण संबंधी प्रक्रियाओं का उल्लेख मिलता है।

माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की बात करें तो केंद्र सरकार का Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 महत्वपूर्ण कानूनी ढांचा प्रदान करता है। कानून के अनुसार, यदि कोई वरिष्ठ नागरिक या माता-पिता अपनी कमाई अथवा अपनी संपत्ति से स्वयं का भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है, तो वह अपने वयस्क बच्चों के खिलाफ भरण-पोषण के लिए आवेदन कर सकता है। कानून में यह भी कहा गया है कि बच्चों की जिम्मेदारी माता-पिता की आवश्यकताओं तक विस्तारित होती है, ताकि वे सामान्य जीवन जी सकें।

इसी कानून की धारा 23 संपत्ति हस्तांतरण से जुड़ी एक महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करती है। यदि किसी वरिष्ठ नागरिक ने इस शर्त के साथ अपनी संपत्ति उपहार या अन्य तरीके से हस्तांतरित की हो कि प्राप्तकर्ता उसे बुनियादी सुविधाएं और शारीरिक जरूरतें उपलब्ध कराएगा, लेकिन वह ऐसा करने में विफल रहता है, तो निर्धारित परिस्थितियों में ट्रिब्यूनल उस हस्तांतरण को निरस्त घोषित कर सकता है।

हालांकि, यहां वसीयत और जीवनकाल में संपत्ति हस्तांतरण को एक ही चीज समझना सही नहीं है। वसीयत सामान्यतः मृत्यु के बाद संपत्ति के वितरण की इच्छा से संबंधित होती है, जबकि उपहार या अन्य संपत्ति हस्तांतरण जीवनकाल में संपत्ति के अधिकारों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए दोनों पर लागू कानूनी प्रावधान अलग हो सकते हैं।

अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल से सितंबर के दौरान दर्ज 2,466 वसीयतनामों से रजिस्ट्रेशन विभाग को करीब 18.97 लाख रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ। जून में डीड राइटर्स की हड़ताल के कारण वसीयतनामों की संख्या अपेक्षाकृत कम रही और इस महीने 178 वसीयतनामे दर्ज हुए।

इस पूरी खबर का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि नोएडा में वसीयतनामा निरस्तीकरण के मामलों की संख्या सामने आई है, लेकिन उपलब्ध रिपोर्ट यह साबित नहीं करती कि सभी 392 निरस्तीकरण केवल बेटे-बेटी या बहू से विवाद के कारण हुए। इसलिए इस आंकड़े को पारिवारिक रिश्तों में बदलाव और संपत्ति संबंधी फैसलों के व्यापक संदर्भ में देखना अधिक उचित होगा।

फैक्ट-चेक निष्कर्ष:
2,466 वसीयतनामे और 392 निरस्तीकरण का आंकड़ा अमर उजाला ने सेक्टर-33ए स्थित उप निबंधक कार्यालय के विभागीय आंकड़ों के हवाले से प्रकाशित किया है। उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों में इन छह महीनों के इसी विशिष्ट आंकड़े का स्वतंत्र सरकारी डेटा-सेट नहीं मिला; इसलिए HindiWindow इसे “रिपोर्ट के अनुसार/विभागीय आंकड़ों के हवाले से” प्रस्तुत कर रहा है। कानूनी संदर्भों की पुष्टि India Code और उत्तर प्रदेश स्टाम्प एवं रजिस्ट्रेशन विभाग के आधिकारिक स्रोतों से की गई है।