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न्यूजीलैंड में खालिस्तान के नाम पर शरण के 40 दावे क्यों खारिज हुए ? 2024 के सफल मामलों के बाद क्या बदला

हिंदी विंडो | इंटरनेशनल डेस्क

न्यूजीलैंड में खालिस्तान से जुड़ी राजनीतिक गतिविधियों के आधार पर शरण यानी asylum मांगने वाले भारतीय नागरिकों के मामलों को लेकर एक महत्वपूर्ण तस्वीर सामने आई है। न्यूजीलैंड के Immigration & Protection Tribunal के प्रकाशित फैसलों की समीक्षा के अनुसार, 2025 में ऐसे 15 और 2026 में अब तक 25 मामलों पर फैसला हुआ और इनमें किसी भी आवेदक को शरणार्थी के रूप में मान्यता नहीं मिली। यानी दो वर्षों में सामने आए 40 प्रकाशित मामलों में सफलता नहीं मिली।

हालांकि, यहां एक जरूरी तथ्य समझना बेहद महत्वपूर्ण है—यह संख्या न्यूजीलैंड में दाखिल सभी खालिस्तान-संबंधित asylum applications की आधिकारिक सरकारी संख्या नहीं है। Immigration New Zealand अलग-अलग राजनीतिक या अन्य आधारों के अनुसार asylum claims के आंकड़े नियमित रूप से प्रकाशित नहीं करता। इसलिए 40 का आंकड़ा प्रकाशित Tribunal decisions की समीक्षा पर आधारित है।

असल सवाल—शरण पाने के लिए क्या सिर्फ राजनीतिक समर्थन पर्याप्त है ?

नहीं।

न्यूजीलैंड में refugee या protected-person status पाने के लिए केवल किसी राजनीतिक विचारधारा से जुड़ाव पर्याप्त नहीं है। आवेदक को यह दिखाना होता है कि अपने देश लौटने पर उसे वास्तविक और व्यक्तिगत स्तर पर persecution यानी उत्पीड़न या गंभीर नुकसान का खतरा है।

Immigration New Zealand के अनुसार, asylum का उद्देश्य उन लोगों को संरक्षण देना है जिन्हें अपने देश लौटने पर वास्तविक खतरा हो। दावा करते समय आवेदक को अपनी पहचान, राष्ट्रीयता, परिस्थितियों और दावे के समर्थन में लिखित बयान तथा उपलब्ध साक्ष्य देने होते हैं। इसके बाद Refugee and Protection Officer के साथ इंटरव्यू और अन्य मूल्यांकन की प्रक्रिया होती है।

2024 में दो मामलों को क्यों मिली थी शरण ?

2024 में न्यूजीलैंड के Tribunal ने दो भारतीय नागरिकों के refugee claims स्वीकार किए थे।

इन मामलों में Tribunal के सामने ऐसी राजनीतिक गतिविधियों और परिस्थितियों का रिकॉर्ड था जिन्हें अपेक्षाकृत सार्वजनिक और प्रमुख माना गया। इनमें लंबे समय तक सोशल मीडिया पर खालिस्तान समर्थक गतिविधियां, अलगाववादी संगठनों से जुड़ाव और एक मामले में खालिस्तान से संबंधित प्रमुख टैटू जैसे तथ्य शामिल थे।

इन परिस्थितियों के आधार पर Tribunal ने माना कि संबंधित व्यक्तियों के भारत लौटने पर persecution का जोखिम हो सकता है।

यही कारण है कि बाद में कुछ अन्य आवेदकों के वकीलों ने इन 2024 के सफल मामलों का हवाला भी दिया। लेकिन केवल पुराने सफल फैसले का हवाला देने से बाद के मामलों में शरण नहीं मिली।

2025-26 के 40 मामलों में क्या अलग था ?

बाद के मामलों में Tribunal ने कई बार इस बात पर ध्यान दिया कि आवेदक की राजनीतिक गतिविधियां कितनी सार्वजनिक, लगातार और प्रभावशाली थीं तथा क्या यह प्रमाण मौजूद था कि भारत के अधिकारियों को उन गतिविधियों की जानकारी थी।

कई मामलों में गतिविधियों को अपेक्षाकृत कम स्तर की राजनीतिक भागीदारी माना गया और यह पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं हुआ कि भारत लौटने पर संबंधित व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से persecution का वास्तविक खतरा होगा।

इसका मतलब यह नहीं है कि न्यूजीलैंड में खालिस्तान का समर्थन करना अपने आप में अपराध या asylum के लिए स्वतः अयोग्य आधार है। बल्कि सवाल यह है कि किस व्यक्ति की कौन-सी गतिविधि, किन परिस्थितियों में और किस प्रमाण के साथ उसके व्यक्तिगत persecution risk को स्थापित करती है।

ऑकलैंड के जनमत संग्रह और प्रदर्शन वाला मामला

रिपोर्ट में एक ऐसे मामले का उल्लेख है जिसमें आवेदक ने ऑकलैंड में हुए गैर-बाध्यकारी खालिस्तान जनमत संग्रह में मतदान किया था और वेलिंगटन स्थित भारतीय उच्चायोग के बाहर एक प्रदर्शन में हिस्सा लिया था।

Tribunal ने इन गतिविधियों को अपेक्षाकृत ‘low-level’ गतिविधि के रूप में देखा। उपलब्ध साक्ष्यों से यह पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं हुआ कि इन गतिविधियों ने भारतीय अधिकारियों का ध्यान इस तरह आकर्षित किया था कि भारत लौटने पर उस व्यक्ति को व्यक्तिगत persecution का वास्तविक खतरा हो।

2024 के सफल फैसलों का हवाला देने के बावजूद सफलता क्यों नहीं मिली ?

Dainik Tribune की समीक्षा के अनुसार, 2024 के दोनों सफल मामलों के फैसलों का बाद में कम से कम नौ अन्य मामलों में हवाला दिया गया। लेकिन उन मामलों में भी refugee status नहीं मिला।

यह एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु है।

Refugee claim में केवल यह साबित करना पर्याप्त नहीं होता कि किसी समान राजनीतिक विचार वाले व्यक्ति को पहले कभी protection मिली थी। प्रत्येक आवेदक की अपनी परिस्थितियों, गतिविधियों, विश्वसनीयता और व्यक्तिगत खतरे का अलग मूल्यांकन किया जाता है।

न्यूजीलैंड में asylum claim की प्रक्रिया क्या है ?

Immigration New Zealand के अनुसार, refugee या protection status का दावा करने के लिए व्यक्ति को Confirmation of Claim form देना होता है और लिखित बयान व समर्थन में उपलब्ध जानकारी जमा करनी होती है। इसके बाद Refugee and Protection Officer के साथ इंटरव्यू, रिपोर्ट, अंतिम submissions और निर्णय की प्रक्रिया होती है।

यदि दावा खारिज होता है, तो पात्र मामलों में Immigration & Protection Tribunal में appeal की व्यवस्था भी है। Tribunal refugee और protected-person status से जुड़े निर्णयों की अपील सुनता है। Refugee/protected person appeals के लिए वर्तमान व्यवस्था में filing fee नहीं है।

एक और महत्वपूर्ण बात—asylum कोई सामान्य migration route नहीं है

Immigration New Zealand साफ तौर पर कहता है कि asylum system का उद्देश्य genuine protection जरूरत वाले लोगों को सुरक्षा देना है। यह न्यूजीलैंड में रहने की अवधि बढ़ाने या सामान्य immigration benefits हासिल करने का विकल्प नहीं है।

INZ के अनुसार, genuine refugee/protection claim के लिए मानक काफी ऊंचा है और वर्तमान में लगभग पांच में से एक refugee/protection claim ही सफल होता है।

तो पूरी कहानी का निष्कर्ष क्या है ?

न्यूजीलैंड में खालिस्तान से जुड़े asylum claims के हालिया फैसले यह संकेत देते हैं कि केवल किसी राजनीतिक विचार का समर्थन, किसी प्रदर्शन में भाग लेना या किसी referendum में मतदान करना अपने आप में refugee status की गारंटी नहीं है।

Tribunal मुख्य रूप से यह देखता है कि संबंधित व्यक्ति की वास्तविक परिस्थितियां क्या हैं, उसकी गतिविधियां कितनी सार्वजनिक और महत्वपूर्ण थीं, उसके बारे में उसके देश की authorities को जानकारी होने की कितनी संभावना है और सबसे महत्वपूर्ण—क्या उसके देश लौटने पर उसे व्यक्तिगत persecution या गंभीर नुकसान का वास्तविक खतरा है।

इसलिए 2024 में मिले दो सफल मामलों और 2025-26 में खारिज हुए 40 प्रकाशित मामलों को एक ही नियम के दो विरोधाभासी उदाहरण समझने के बजाय, इन्हें व्यक्ति-विशेष के जोखिम और साक्ष्यों के आधार पर होने वाली refugee assessment प्रक्रिया के रूप में समझना अधिक सही होगा।

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