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हिमालय भारत, चीन और नेपाल को एक साझा भविष्य से जोड़ता है, साथ मिलकर करनी होगी इसकी रक्षा: शशि थरूर

Shashi Tharoor on India China Nepal: हिमालय को लेकर क्यों जरूरी है तीनों देशों का सहयोग ?

नई दिल्ली। हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते जलवायु और आपदा जोखिमों के बीच कांग्रेस सांसद और The Indian Express के कॉलमिस्ट शशि थरूर ने भारत, चीन और नेपाल के बीच पर्यावरणीय सहयोग के लिए एक समर्पित और पारदर्शी त्रिपक्षीय व्यवस्था बनाने की वकालत की है।

3 सितंबर को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपने #TharoorThink कॉलम का जिक्र करते हुए थरूर ने सवाल उठाया कि क्या भारत, चीन और नेपाल अपने साझा पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र के प्रबंधन के लिए मिलकर काम कर सकते हैं।

उनका कहना है कि नेपाल वैश्विक जलवायु परिवर्तन की ऐसी कीमत चुका रहा है, जिसमें उसके ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का योगदान बेहद कम है। ऐसे में पड़ोसी देशों द्वारा नेपाल के साथ डेटा और अग्रिम जानकारी साझा करना उसकी आपदा-तैयारी में मदद करने का सबसे बुनियादी कदम हो सकता है।

हिमालय की प्राकृतिक व्यवस्था सीमाओं को नहीं मानती

थरूर ने अपने लेख में तर्क दिया कि ग्लेशियर, हिमनद झीलें, नदी घाटियां और वायुमंडलीय धाराएं किसी अंतरराष्ट्रीय सीमा को नहीं पहचानतीं।

यदि किसी ग्लेशियर से अचानक पानी निकलता है, भूस्खलन किसी सीमा-पार नदी का रास्ता रोक देता है या बर्फ और चट्टानों का बड़ा मलबा नीचे की ओर आता है, तो उसका प्रभाव कुछ ही समय में दूसरे क्षेत्रों और देशों तक पहुंच सकता है।

यानी हिमालय को केवल अलग-अलग देशों के हिस्सों में बांटकर देखने के बजाय इसे एक परस्पर जुड़ी हुई पारिस्थितिक प्रणाली के रूप में समझना जरूरी है।

भारत-चीन-नेपाल के बीच साझा व्यवस्था की जरूरत

थरूर के अनुसार, हिमालयी क्षेत्र के लिए भारत, नेपाल और चीन के बीच एक संस्थागत त्रिपक्षीय तंत्र बनाया जाना चाहिए।

इस व्यवस्था का उद्देश्य केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें—

  • वास्तविक समय में जल-विज्ञान संबंधी डेटा साझा करना,
  • ग्लेशियरों और हिमनद झीलों की निगरानी,
  • जोखिम वाले क्षेत्रों की मैपिंग,
  • जलवायु अनुकूलन,
  • आपदा-पूर्व चेतावनी,
  • संयुक्त वैज्ञानिक अनुसंधान

जैसे विषय शामिल किए जा सकते हैं।

लेख में थरूर ने विशेष रूप से कहा है कि क्षेत्रीय सहयोग को केवल परिस्थितिजन्य या राजनीतिक सुविधा पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे एक स्वचालित और संस्थागत व्यवस्था का रूप दिया जाना चाहिए।

डेटा साझा करने में देरी बन सकती है बड़ी समस्या

हिमालयी आपदाओं में समय बेहद महत्वपूर्ण होता है।

थरूर ने उदाहरण देते हुए बताया कि अतीत में तिब्बत में प्राकृतिक बांधों से जुड़ी घटनाओं के दौरान भारत और नेपाल की एजेंसियों को चीन की मॉनिटरिंग स्टेशनों से कार्रवाई योग्य डेटा मिलने में देरी हुई।

कुछ मामलों में फ्लैश फ्लड या कृत्रिम रूप से बनी झीलों जैसी घटनाओं के दौरान ऊपरी क्षेत्रों से मिलने वाली जानकारी पर्याप्त तेजी से नीचे के देशों तक नहीं पहुंच पाई।

इसलिए उनका सुझाव है कि हाई-अल्टिट्यूड हाइड्रोमेटोरोलॉजिकल स्टेशन, भूकंपीय सेंसर और ऑटोमेटेड वाटर-लेवल गेज से मिलने वाला डेटा रियल टाइम में साझा क्षेत्रीय प्रणाली में उपलब्ध होना चाहिए।

सिर्फ डेटा नहीं, संयुक्त वैज्ञानिक शोध भी जरूरी

थरूर ने कहा कि हिमालय में अलग-अलग देशों द्वारा अपने-अपने स्तर पर किए जा रहे अध्ययन पर्याप्त नहीं हैं।

उन्होंने संयुक्त भू-वैज्ञानिक शोध और जोखिम मानचित्रण की जरूरत बताई है।

खासतौर पर हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र में बड़ी संख्या में संभावित रूप से खतरनाक ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं और तापमान बढ़ने के साथ इनमें से कुछ तेजी से फैल सकती हैं।

इन झीलों की मैपिंग, लटकते ग्लेशियरों की स्थिरता का अध्ययन और भूस्खलन की संभावनाओं का अनुमान लगाने के लिए सीमापार वैज्ञानिक सहयोग उपयोगी हो सकता है।

हाई-रिस्क क्षेत्रों में संयुक्त इंजीनियरिंग समाधान

थरूर ने केवल वैज्ञानिक अध्ययन की बात नहीं की, बल्कि जोखिम वाले ग्लेशियल झीलों के मामले में संयुक्त इंजीनियरिंग हस्तक्षेप की भी वकालत की है।

इनमें नियंत्रित जल निकासी, कृत्रिम ड्रेनेज चैनल या संरचनात्मक मजबूती जैसे उपाय शामिल हो सकते हैं।

इसके साथ ही उन्होंने संयुक्त आपदा प्रतिक्रिया अभ्यास और सीमा-पार पर्यावरण संरक्षण परियोजनाओं को भी महत्वपूर्ण बताया है।

ऐसे कदम तीनों देशों की सैन्य और नागरिक आपदा प्रतिक्रिया एजेंसियों के बीच व्यावहारिक विश्वास बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।

जलवायु संकट का सबसे बड़ा असर नेपाल पर

थरूर ने अपने लेख में जलवायु परिवर्तन के असमान प्रभाव को भी रेखांकित किया।

उनके अनुसार नेपाल के ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का योगदान बेहद कम है, लेकिन वैश्विक जलवायु परिवर्तन के गंभीर और तत्काल प्रभावों में उसे भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

दूसरी ओर, औद्योगिक रूप से बड़े पड़ोसी देशों का वैश्विक उत्सर्जन में योगदान काफी अधिक है।

यही स्थिति जलवायु न्याय के सवाल को भी महत्वपूर्ण बनाती है।

हिमालय करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा से जुड़ा है

थरूर के मुताबिक हिमालय वैश्विक औसत की तुलना में तेज गति से गर्म हो रहा है और इसका सीधा असर नीचे रहने वाली आबादी की जल सुरक्षा, जीवन और आजीविका पर पड़ सकता है।

हिमालयी क्षेत्र से निकलने वाली नदियां भारत और नेपाल सहित दक्षिण एशिया के बड़े हिस्से के लिए महत्वपूर्ण हैं, जबकि तिब्बती पठार एशिया की कई प्रमुख नदी प्रणालियों का स्रोत है।

इसलिए हिमालय में होने वाले पर्यावरणीय बदलाव का असर केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहेगा।

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राजनीति की सीमाएं बनाम प्रकृति की सीमाएं

भारत, चीन और नेपाल के बीच राजनीतिक, रणनीतिक और सीमा संबंधी मतभेद रहे हैं।

लेकिन थरूर का तर्क है कि भूगोल, जलवायु, भौतिकी और भू-विज्ञान से राजनीतिक बातचीत नहीं की जा सकती।

देश राजनीतिक सीमाएं निर्धारित कर सकते हैं, लेकिन नदियों के बहाव, ग्लेशियरों के पिघलने और वातावरण के तापमान को राजनीतिक सीमा के भीतर नहीं रोका जा सकता।

इसीलिए वे भारत, चीन और नेपाल के बीच पर्यावरणीय सहयोग के लिए एक समर्पित, पारदर्शी और संस्थागत त्रिपक्षीय तंत्र को जलवायु संकट के दौर में जरूरी मानते हैं।

निष्कर्ष

शशि थरूर का प्रस्ताव फिलहाल एक राजनीतिक-सार्वजनिक नीति विचार और अपील है, भारत, चीन और नेपाल के बीच किसी नई आधिकारिक त्रिपक्षीय संधि या समझौते की घोषणा नहीं।

उनका मूल संदेश स्पष्ट है—

हिमालय साझा है, इसलिए उसके पर्यावरणीय खतरे और उनकी तैयारी भी साझा होनी चाहिए।