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NEET UG फर्जी सर्टिफिकेट केस: MBBS सीट के लिए ₹45 लाख का कथित सौदा, दो गिरफ्तार; 778 अभ्यर्थियों के दस्तावेज जांच के घेरे में

NEET UG फर्जी सर्टिफिकेट केस

NEET UG फर्जी सर्टिफिकेट केस: MBBS सीट के लिए ₹45 लाख का कथित सौदा, दो गिरफ्तार; जांच में सामने आ रहा बड़ा नेटवर्क

उत्तराखंड में स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे के कथित फर्जी प्रमाणपत्रों से MBBS दाखिले की जांच तेज। SIT ने दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जबकि आरक्षित श्रेणी के 778 अभ्यर्थियों के दस्तावेजों के सत्यापन की प्रक्रिया भी शुरू की गई है।

उत्तराखंड में NEET UG 2026 काउंसलिंग के दौरान कथित फर्जी प्रमाणपत्रों के सहारे MBBS दाखिले का मामला अब जांच के एक बड़े चरण में पहुंच गया है। स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे से सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिला दिलाने के लिए कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज तैयार कराने और पैसे लेने के मामले में विशेष जांच दल यानी SIT ने दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस की जांच आगे बढ़ने के साथ इस मामले में कथित तौर पर शामिल अन्य लोगों की भूमिका भी खंगाली जा रही है।

मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि जांच केवल कुछ संदिग्ध प्रमाणपत्रों तक सीमित नहीं रह गई है। उत्तराखंड में राज्य कोटे के तहत MBBS और BDS में दाखिला लेने वाले 778 ऐसे अभ्यर्थियों के दस्तावेजों की जांच किए जाने की रिपोर्ट सामने आई है, जिन्होंने SC, ST, OBC, EWS और स्वतंत्रता सेनानी आश्रित जैसी आरक्षित श्रेणियों का लाभ लिया है। यह जांच इस बात को सुनिश्चित करने के लिए की जा रही है कि दाखिले के दौरान इस्तेमाल किए गए प्रमाणपत्र और अन्य दस्तावेज वैध हैं।

₹45 लाख प्रति सीट का कथित सौदा

SIT की शुरुआती जांच के अनुसार, मेरठ में एजुकेशन कंसल्टेंसी चलाने वाले रूपेश पंडित पर आरोप है कि उसने उत्तराखंड में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे के माध्यम से सरकारी MBBS सीट दिलाने का कथित सौदा प्रति अभ्यर्थी 45 लाख रुपये में किया। स्वतंत्र रिपोर्टों के अनुसार तीन छात्राओं के दाखिले के लिए 45-45 लाख रुपये की राशि तय किए जाने का आरोप है। इनमें से 20-20 लाख रुपये के हिसाब से कुल 60 लाख रुपये अग्रिम दिए जाने की बात भी जांच में सामने आई है।

पुलिस के अनुसार, गिरफ्तार किए गए लोगों में रूपेश पंडित और हरिद्वार के लक्सर क्षेत्र निवासी अरविंद कुमार शामिल हैं। जांच एजेंसियों के अनुसार अरविंद कुमार ने अपनी बेटी सहित तीन छात्राओं के लिए कथित तौर पर रूपेश से संपर्क किया था। पुलिस का आरोप है कि इसके बाद स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र हासिल करने के लिए कथित फर्जी दस्तावेज तैयार कराए गए।

कैसे सामने आया कथित फर्जीवाड़ा ?

मामले की शुरुआत स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्रों की सत्यता को लेकर उठे सवालों से हुई। उत्तराखंड के कुछ अभ्यर्थियों के नाम पर ऐसे प्रमाणपत्र सामने आए, जिनकी वैधता पर संदेह जताया गया। जांच के दौरान प्रमाणपत्रों के लिए किए गए ऑनलाइन आवेदनों और अन्य दस्तावेजों में दर्ज पतों में कथित विसंगतियां भी सामने आईं। इसके बाद पुलिस और प्रशासन ने मूल दस्तावेजों की जांच शुरू की।

मूल रिपोर्ट के अनुसार, एक ही स्वतंत्रता सेनानी के नाम से चार फर्जी प्रमाणपत्र तैयार किए जाने की बात जांच में सामने आई है। हालांकि इस पूरे तथ्य का अंतिम निर्धारण जांच और संबंधित दस्तावेजों की आधिकारिक पुष्टि के बाद ही किया जाएगा।

जांच का दायरा 778 अभ्यर्थियों तक

इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जांच अब केवल स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे तक सीमित नहीं है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उत्तराखंड में राज्य कोटे से MBBS और BDS में प्रवेश लेने वाले 778 अभ्यर्थियों के आरक्षण संबंधी दस्तावेजों का सत्यापन कराया जा रहा है। इनमें SC, ST, OBC, EWS और स्वतंत्रता सेनानी आश्रित श्रेणी से जुड़े प्रमाणपत्र शामिल हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप बहुगुणा द्वारा 370 संदिग्ध अभ्यर्थियों की सूची स्वास्थ्य विभाग के सामने रखे जाने की भी रिपोर्ट है। हालांकि किसी सूची में नाम होना अपने आप में किसी व्यक्ति के खिलाफ अपराध सिद्ध नहीं करता। वास्तविक स्थिति दस्तावेजों के सत्यापन और जांच के निष्कर्ष से ही स्पष्ट होगी।

तीन दाखिले रद्द किए जाने की जानकारी

मामले की शुरुआती जांच में कुछ दाखिलों पर कार्रवाई की गई। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र से जुड़े तीन MBBS दाखिलों को रद्द किया गया। मूल रिपोर्ट में तीन छात्राओं के 301, 338 और 400 अंक बताए गए हैं और क्रमशः श्रीनगर, हल्द्वानी और हरिद्वार मेडिकल कॉलेज से संबंधित सीटों के रद्द होने की जानकारी दी गई है।

यहां यह समझना जरूरी है कि किसी छात्र के अंक कम या अधिक होना अपने आप में फर्जीवाड़े का प्रमाण नहीं है। जांच का मुख्य प्रश्न यह है कि जिस आरक्षित श्रेणी के आधार पर प्रवेश मिला, उससे संबंधित प्रमाणपत्र और पात्रता दस्तावेज वास्तविक और नियमों के अनुरूप थे या नहीं।

लेखपालों की भूमिका भी जांच के दायरे में

मामले में प्रमाणपत्र तैयार करने और सत्यापन की प्रशासनिक प्रक्रिया की भूमिका भी जांची जा रही है। मूल रिपोर्ट के अनुसार दो लेखपालों को निलंबित किया गया है। उन पर कथित तौर पर दस्तावेजी प्रक्रिया में अनियमितता से जुड़े सवाल उठे हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दोनों के पुराने शिकायत रिकॉर्ड की जांच की जा रही है।

हालांकि, निलंबन को अंतिम दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता। संबंधित कर्मचारियों की भूमिका और जिम्मेदारी का निर्धारण विभागीय जांच तथा आपराधिक जांच के निष्कर्षों के आधार पर होगा।

SIT के सामने अब कई बड़े सवाल

जांच एजेंसी के सामने अब यह पता लगाना महत्वपूर्ण है कि कथित नेटवर्क में केवल गिरफ्तार दो लोग शामिल थे या इसके पीछे और लोग भी काम कर रहे थे। पुलिस आरोपियों के मोबाइल फोन, चैट, कॉल डिटेल, दस्तावेज और वित्तीय लेनदेन की जांच कर रही है। इन डिजिटल और वित्तीय साक्ष्यों से कथित नेटवर्क में शामिल अन्य व्यक्तियों तथा धन के लेनदेन की जानकारी मिलने की उम्मीद है।

देहरादून के SSP प्रमेन्द्र डोबाल के अनुसार जांच का दायरा बढ़ाया गया है और 10 से 12 अन्य संदिग्धों की भूमिका भी जांच में सामने आई है। इसका अर्थ यह नहीं है कि इन सभी लोगों पर आरोप सिद्ध हो चुके हैं; उनकी भूमिका जांच के बाद स्पष्ट होगी।

कब-कब क्या हुआ ?

मूल रिपोर्ट के अनुसार 3 सितंबर को फर्जी प्रमाणपत्र मामले को लेकर शिकायत की गई। 5 सितंबर को जांच के निर्देश दिए गए और 9 सितंबर को प्रशासनिक जांच समिति गठित की गई। 10 सितंबर को कुछ प्रमाणपत्र निरस्त किए गए। 13 सितंबर को पुलिस थानों में मुकदमे दर्ज हुए। 18 सितंबर को SIT का गठन किया गया। 20 सितंबर को SIT ने एक मेडिकल कॉलेज से संबंधित दस्तावेज कब्जे में लिए और 22 सितंबर को दो आरोपियों की गिरफ्तारी की गई।

आगे क्या होगा ?

अब जांच के तीन प्रमुख स्तर दिखाई दे रहे हैं—पहला, कथित फर्जी प्रमाणपत्रों की पूरी श्रृंखला की जांच; दूसरा, पैसे के लेनदेन और कथित बिचौलियों की पहचान; और तीसरा, आरक्षित श्रेणी के तहत प्रवेश लेने वाले अन्य अभ्यर्थियों के दस्तावेजों का सत्यापन।

मेडिकल शिक्षा में आरक्षण और सरकारी सीटों की प्रक्रिया सीधे छात्रों के भविष्य से जुड़ी होती है। इसलिए इस मामले में जांच का निष्पक्ष, दस्तावेज-आधारित और पारदर्शी तरीके से आगे बढ़ना महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ लगे आरोप जांच के अधीन हैं और अंतिम जिम्मेदारी अदालत तथा संबंधित जांच प्रक्रिया के निष्कर्षों से तय होगी।

हिंदी विंडो निष्कर्ष: उत्तराखंड का यह मामला केवल कथित फर्जी प्रमाणपत्रों तक सीमित नहीं दिख रहा है। SIT की कार्रवाई, 778 अभ्यर्थियों के दस्तावेजों का सत्यापन और कथित ₹45 लाख प्रति सीट के सौदे से जुड़े आरोपों ने मेडिकल एडमिशन प्रक्रिया में दस्तावेज सत्यापन की भूमिका को केंद्र में ला दिया है। आने वाले दिनों में जांच से यह स्पष्ट होना बाकी है कि यह नेटवर्क कितना बड़ा था और इसमें किन-किन लोगों की भूमिका थी।