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सिंधु जल संधि पर फिर बढ़ा भारत-पाक तनाव : डॉन की चेतावनी—विवाद नहीं सुलझा तो सैन्य टकराव का खतरा

सिंधु जल संधि पर फिर बढ़ा

सिंधु जल संधि पर फिर बढ़ा भारत-पाक तनाव

PCA के 31 अगस्त के फैसले के बाद भी भारत और पाकिस्तान अपने-अपने रुख पर कायम, पाकिस्तान में पानी को लेकर बढ़ रही चिंता !

नई दिल्ली/इस्लामाबाद। भारत और पाकिस्तान के बीच करीब छह दशक पुरानी सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty—IWT) एक बार फिर दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव का केंद्र बन गई है। पाकिस्तान के प्रमुख अखबार डॉन ने 3 अक्टूबर 2026 के संपादकीय में चेतावनी दी है कि यदि सिंधु जल संधि को लेकर मौजूदा विवाद लंबे समय तक जारी रहता है, या भारत पाकिस्तान के हिस्से के पानी को प्रभावित करने की दिशा में आगे बढ़ता है, तो दक्षिण एशिया में नया टकराव पैदा होने का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि यह अखबार का संपादकीय आकलन है, किसी आसन्न युद्ध की आधिकारिक घोषणा नहीं।

मौजूदा विवाद की पृष्ठभूमि अप्रैल 2025 में भारत द्वारा सिंधु जल संधि को तत्काल प्रभाव से “अभयेंस” यानी in abeyance रखने के फैसले से जुड़ी है। भारत ने यह कदम पहलगाम आतंकी हमले के बाद उठाया था। इसके बाद दोनों देशों के बीच जल, आतंकवाद और द्विपक्षीय संबंधों को लेकर तनाव और बढ़ा। 23 अप्रैल 2025 को भारत की ओर से कहा गया था कि संधि को तब तक अभयेंस में रखा जाएगा, जब तक पाकिस्तान सीमा-पार आतंकवाद के समर्थन से विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय रूप से पीछे नहीं हटता।

1960 की संधि में क्या तय हुआ था ?

सिंधु जल संधि वर्ष 1960 में भारत, पाकिस्तान और विश्व बैंक की भूमिका के साथ हुई थी। करीब नौ वर्षों की बातचीत के बाद बनी इस व्यवस्था ने सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों के पानी के उपयोग को लेकर दोनों देशों के अधिकार और दायित्व तय किए। विश्व बैंक के अनुसार, संधि के तहत पूर्वी नदियां—रावी, ब्यास और सतलुज—भारत के लिए, जबकि पश्चिमी नदियां—सिंधु, झेलम और चिनाब—पाकिस्तान के लिए निर्धारित की गईं। हालांकि पश्चिमी नदियों पर भी भारत को संधि में निर्धारित सीमाओं के भीतर कुछ उपयोग, विशेष रूप से जलविद्युत उत्पादन, की अनुमति है।

संधि केवल पानी बांटने का दस्तावेज नहीं है। इसमें दोनों देशों के बीच जल संबंधी जानकारी साझा करने और विवादों के समाधान की संस्थागत व्यवस्था भी है। विश्व बैंक के अनुसार, इसमें Permanent Indus Commission के साथ-साथ अलग-अलग प्रकार के विवादों के लिए Neutral Expert और Court of Arbitration जैसी प्रक्रियाएं निर्धारित हैं।

31 अगस्त 2026 के PCA फैसले में क्या हुआ ?

विवाद का एक महत्वपूर्ण मोड़ 31 अगस्त 2026 को आया। सिंधु जल संधि के तहत गठित Court of Arbitration ने भारत के 2025 के “अभयेंस” फैसले की वैधता पर विचार किया। PCA की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, अदालत ने सर्वसम्मति से कहा कि भारत के फैसले को संधि या लागू अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर संधि को निलंबित या समाप्त करने का वैध आधार नहीं माना जा सकता। उसके अनुसार संधि प्रभावी बनी रही और भारत संधि के तहत अपने दायित्वों से बंधा रहा।

इसी आदेश में Ratle Hydroelectric Project को लेकर कुछ अंतरिम उपाय भी लगाए गए। अदालत ने कुछ निर्धारित स्तरों से ऊपर Ratle बांध की दीवार और power intake structure पर कंक्रीटिंग को Neutral Expert के अंतिम फैसले के बाद 90 दिन तक रोकने का निर्देश दिया। PCA के अनुसार Neutral Expert का अंतिम निर्णय जुलाई 2027 के आसपास अपेक्षित है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य है—भारत इस Court of Arbitration की कार्यवाही को मान्यता नहीं देता। 31 अगस्त को भारतीय विदेश मंत्रालय के हवाले से रिपोर्ट किया गया कि भारत ने इस निकाय को “अवैध रूप से गठित” बताया और कहा कि उसे भारत के संप्रभु निर्णयों पर अधिकार-क्षेत्र नहीं है। भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि संधि को अभयेंस में रखने का उसका निर्णय उसके अनुसार प्रभावी है।

इसलिए खबर को केवल “अदालत ने भारत को संधि बहाल करने का आदेश दे दिया” के रूप में प्रस्तुत करना अधूरा होगा। PCA Court of Arbitration का निष्कर्ष एक पक्ष है, जबकि भारत उस अधिकार-क्षेत्र को स्वीकार नहीं करता—यह दोनों तथ्य साथ-साथ बताना जरूरी है।

पाकिस्तान का रुख क्या है ?

पाकिस्तान लगातार यह कह रहा है कि सिंधु जल संधि को एकतरफा तरीके से निलंबित या समाप्त नहीं किया जा सकता। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने 25 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में कहा कि पाकिस्तान के हिस्से के पानी को रोकने, बाधित करने या मोड़ने का कोई भी प्रयास “युद्ध की कार्रवाई” माना जाएगा। यह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का राजनीतिक बयान है, युद्ध की औपचारिक घोषणा नहीं।

पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार ने भी सितंबर में कहा कि भारत अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को केवल इसलिए अलग नहीं रख सकता क्योंकि वे उसके लिए असुविधाजनक हो गई हैं। पाकिस्तान ने PCA के अगस्त फैसले को अपने पक्ष की पुष्टि के रूप में पेश किया है।

1 अक्टूबर को पाकिस्तान के सूचना मंत्री अत्ता तरार ने भी कहा कि भारत द्वारा संधि को अभयेंस में रखने का फैसला वैश्विक सीमा-पार जल प्रबंधन के लिए व्यापक प्रभाव पैदा कर सकता है। पाकिस्तान इसे जल सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय जल व्यवस्था से जोड़ रहा है।

डॉन की चेतावनी कितनी गंभीर है ?

3 अक्टूबर के संपादकीय में डॉन ने कहा कि कश्मीर विवाद के साथ सिंधु जल संधि दोनों देशों के बीच तनाव का प्रमुख कारण बन गई है। अखबार ने तर्क दिया कि यदि विवाद लंबा खिंचता है या पानी के प्रवाह को लेकर स्थिति और बिगड़ती है, तो दक्षिण एशिया में नए संघर्ष की संभावना पैदा हो सकती है। डॉन ने भारत से संधि बहाल करने और व्यापक विवादों के समाधान की दिशा में आगे बढ़ने की अपील की।

यहां भी तथ्य और विश्लेषण में अंतर करना जरूरी है। डॉन का संपादकीय एक मीडिया संस्थान की राय है; इसे भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध होने की पुष्टि के रूप में नहीं देखा जा सकता। दूसरी ओर, पाकिस्तान के शीर्ष नेताओं के हालिया बयान यह जरूर दिखाते हैं कि पानी का मुद्दा राजनीतिक और रणनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील हो चुका है।

आगे क्या ?

फिलहाल स्थिति यह है कि भारत और पाकिस्तान सिंधु जल संधि को लेकर मूलभूत रूप से विपरीत कानूनी और राजनीतिक रुख पर खड़े हैं। PCA Court of Arbitration ने संधि को प्रभावी माना है, जबकि भारत उस प्रक्रिया के अधिकार-क्षेत्र को स्वीकार नहीं करता और अपने 2025 के फैसले को कायम मानता है। इस बीच पाकिस्तान इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठा रहा है।

सिंधु जल संधि की संवेदनशीलता इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह केवल दो देशों के बीच जल-वितरण का मामला नहीं है; इसका सीधा संबंध कृषि, जलविद्युत, खाद्य सुरक्षा और करोड़ों लोगों की आजीविका से है। 1960 की यह व्यवस्था दशकों तक भारत-पाक तनाव के बावजूद बनी रही थी। अब इसका भविष्य दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों और जल सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण परीक्षण बन गया है।

निष्कर्ष: मौजूदा घटनाक्रम को “युद्ध तय” होने के रूप में पेश करना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि सिंधु जल संधि भारत-पाकिस्तान संबंधों में एक अत्यंत संवेदनशील रणनीतिक मुद्दा बन चुकी है। आने वाले महीनों में कानूनी प्रक्रियाएं, जल परियोजनाएं, कूटनीतिक बयान और दोनों देशों के बीच संवाद इस विवाद की दिशा तय करेंगे।

तथ्य-जांच स्थिति:

  • 1960 की सिंधु जल संधि अस्तित्व में है और उसका मूल पाठ भारत के विदेश मंत्रालय तथा विश्व बैंक के स्रोतों में उपलब्ध है।
  • 31 अगस्त 2026 को Court of Arbitration ने संधि की स्थिति पर निर्णय दिया।
  • भारत ने इस Court of Arbitration के अधिकार-क्षेत्र को स्वीकार नहीं किया है।
  • पाकिस्तान ने PCA निर्णय का स्वागत किया है।
  • “युद्ध होगा” संबंधी कथन वर्तमान में मुख्यतः राजनीतिक बयान/संपादकीय चेतावनियां हैं; इन्हें आसन्न युद्ध की पुष्टि के रूप में नहीं लिखा जाना चाहिए।