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अंकिता भंडारी के माता-पिता इंडिया गेट पर हिरासत में, रिहाई के बाद VIP एंगल की जांच को लेकर बढ़ी मांग

अंकिता को न्याय कब ?

अंकिता भंडारी हत्याकांड :

दिल्ली में बेटी को न्याय दिलाने के लिए धरने पर बैठे वीरेंद्र सिंह भंडारी और सोनी देवी को पुलिस ने तड़के हिरासत में लिया और कुछ समय बाद रिहा कर दिया। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने परिवार से मुलाकात की। परिवार कथित VIP की भूमिका की निष्पक्ष जांच और दुष्यंत कुमार गौतम की राज्यपाल नियुक्ति पर रोक लगाने की मांग कर रहा है।

नई दिल्ली/देहरादून, 15 अक्टूबर 2026।

उत्तराखंड के चर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड में न्याय की मांग एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गई है। अपनी बेटी को न्याय दिलाने और मामले में कथित VIP की भूमिका से जुड़े सवालों की जांच की मांग को लेकर दिल्ली के इंडिया गेट के पास धरने पर बैठे अंकिता के माता-पिता को दिल्ली पुलिस ने गुरुवार, 15 अक्टूबर की तड़के हिरासत में ले लिया। कुछ समय बाद दोनों को रिहा कर दिया गया। इस घटनाक्रम के बाद मामले की जांच, पीड़ित परिवार की मांगों और विरोध-प्रदर्शन के अधिकार को लेकर राजनीतिक तथा सामाजिक बहस तेज हो गई है।

अंकिता के पिता वीरेंद्र सिंह भंडारी और माता सोनी देवी का कहना है कि उनकी बेटी की हत्या से जुड़े सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। परिवार विशेष रूप से उस कथित VIP की भूमिका से संबंधित सवालों के जवाब चाहता है, जिसका उल्लेख इस मामले को लेकर लंबे समय से उठती मांगों में किया जाता रहा है। परिवार ने भारतीय जनता पार्टी के नेता दुष्यंत कुमार गौतम को सिक्किम का राज्यपाल नियुक्त किए जाने पर भी आपत्ति जताई है और मांग की है कि मामले की जांच पूरी होने तक इस नियुक्ति पर रोक लगाई जाए।

इंडिया गेट पर धरना, तड़के पुलिस की कार्रवाई

प्राप्त जानकारी के अनुसार, अंकिता के माता-पिता ने 14 अक्टूबर को दिल्ली में इंडिया गेट के निकट धरना शुरू किया था। परिवार की मांग थी कि उनकी बेटी की हत्या के मामले में उठ रहे अनुत्तरित सवालों की जांच पूरी गंभीरता से की जाए और कथित VIP एंगल को स्पष्ट किया जाए।

15 अक्टूबर की सुबह लगभग 4 बजे दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अंकिता के माता-पिता को तिलक मार्ग थाने ले जाया गया और लगभग आधे घंटे बाद रिहा कर दिया गया। इस दौरान कांग्रेस के कुछ नेताओं और अन्य प्रदर्शनकारियों को भी हिरासत में लिए जाने की खबर सामने आई।

पुलिस की कार्रवाई को लेकर कांग्रेस नेताओं ने सवाल उठाए। दूसरी ओर, किसी भी संवेदनशील सार्वजनिक स्थल पर धरना देने के लिए लागू अनुमति और सुरक्षा संबंधी नियमों का प्रश्न भी इस घटनाक्रम से जुड़ा है। हालांकि, इस मामले में पुलिस की कार्रवाई के संबंध में सभी पक्षों के दावों और आधिकारिक विवरण को अलग-अलग समझना आवश्यक है।

राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने परिवार से की मुलाकात

धरने के दौरान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने अंकिता के माता-पिता से मुलाकात की। उन्होंने परिवार की बात सुनी और न्याय की मांग को समर्थन दिया। कांग्रेस ने पुलिस की कार्रवाई की आलोचना करते हुए इसे पीड़ित परिवार के साथ अनुचित व्यवहार बताया।

इस मुलाकात ने मामले को राजनीतिक विमर्श में फिर प्रमुख स्थान दिलाया है। हालांकि, किसी राजनीतिक दल का समर्थन या विरोध अपने आप में मामले के कानूनी तथ्यों का प्रमाण नहीं है। हत्याकांड और कथित VIP की भूमिका से संबंधित निष्कर्ष सक्षम जांच एजेंसी तथा न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही निर्धारित किए जाने चाहिए।

Cong links scribe's arrest with his efforts to bring justice to Ankita Bhandari

अंकिता भंडारी हत्याकांड: क्या है पूरा मामला ?

पौड़ी गढ़वाल जिले की रहने वाली 19 वर्षीय अंकिता भंडारी ऋषिकेश क्षेत्र के निकट गंगा-भोगपुर स्थित वनंतरा रिसॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट के रूप में काम करती थीं। सितंबर 2022 में उनके लापता होने की सूचना सामने आई थी। कुछ दिनों बाद उनका शव चीला नहर से बरामद किया गया। इस घटना ने पूरे उत्तराखंड में आक्रोश पैदा किया था और महिला सुरक्षा, पर्यटन प्रतिष्ठानों में काम करने वाली महिलाओं की सुरक्षा तथा प्रभावशाली लोगों की संभावित जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए थे।

इस मामले में रिसॉर्ट मालिक पुलकित आर्य तथा उसके दो सहयोगियों सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता को गिरफ्तार किया गया। जांच के बाद मामला अदालत में पहुंचा। मई 2023 में कोटद्वार की अदालत ने तीनों आरोपियों को हत्या के मामले में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इस प्रकार, हत्या के मुख्य मामले में तीन लोगों को दोषी ठहराए जाने और सजा सुनाए जाने का तथ्य न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा है।

लेकिन परिवार की मौजूदा मांग का केंद्र केवल दोषियों को सजा दिलाना नहीं है। वह यह भी चाहता है कि हत्या से जुड़े कथित VIP एंगल और उससे संबंधित सवालों की स्वतंत्र तथा निष्पक्ष पड़ताल हो।

कथित VIP एंगल पर सवाल और कानूनी स्थिति

अंकिता के परिवार ने आरोप लगाया है कि इस मामले में एक प्रभावशाली व्यक्ति की संभावित भूमिका से संबंधित पहलुओं की पर्याप्त जांच नहीं हुई। परिवार ने दुष्यंत कुमार गौतम का नाम लेते हुए उनकी राज्यपाल नियुक्ति पर रोक लगाने की मांग की है। गौतम ने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों से इनकार किया है और आरोप लगाने वालों के खिलाफ मानहानि की कानूनी कार्रवाई शुरू की है।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है: परिवार द्वारा लगाया गया आरोप, जांच में प्रमाणित तथ्य और अदालत द्वारा सिद्ध अपराध—तीनों अलग-अलग कानूनी श्रेणियां हैं। उपलब्ध जानकारी के आधार पर दुष्यंत कुमार गौतम की अंकिता भंडारी की हत्या में संलिप्तता को स्थापित न्यायिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। इसलिए कथित VIP एंगल की चर्चा करते समय आरोपों को आरोप के रूप में ही लिखना आवश्यक है।

CBI जांच को लेकर क्या स्थिति है ?

अंकिता के माता-पिता लंबे समय से केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच कराने की मांग करते रहे हैं। इस मांग का उद्देश्य, परिवार के अनुसार, मामले के उन पहलुओं की पड़ताल कराना है जिनके जवाब उन्हें अभी तक संतोषजनक नहीं लगे हैं।

इस प्रकरण में कानूनी इतिहास भी महत्वपूर्ण है। दिसंबर 2022 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने जांच CBI को स्थानांतरित करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी थी। बाद में परिवार की मांग और सरकार की ओर से प्रक्रिया आगे बढ़ाने संबंधी बयानों के कारण CBI जांच का प्रश्न फिर चर्चा में आया। उत्तराखंड सरकार ने 15 अक्टूबर को मामले पर अपना पक्ष रखते हुए बताया कि परिवार की मांगों पर विचार किया गया और CBI जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए कदम उठाए गए।

हालांकि, प्रक्रिया शुरू करने या आगे बढ़ाने का सरकारी बयान और किसी जांच एजेंसी द्वारा औपचारिक रूप से जांच शुरू कर देना एक ही बात नहीं है। जांच की वर्तमान स्थिति, उसके दायरे और कथित VIP एंगल को लेकर किसी निष्कर्ष की पुष्टि के लिए स्पष्ट आधिकारिक जानकारी आवश्यक है। इसलिए यह कहना कि कथित VIP की भूमिका साबित हो गई है या CBI जांच ने कोई अंतिम निष्कर्ष दे दिया है, उपलब्ध तथ्यों से उचित नहीं होगा।

उत्तराखंड सरकार ने क्या कहा ?

राज्य सरकार ने मामले में की गई कार्रवाई का उल्लेख करते हुए बताया कि आरोपियों की गिरफ्तारी शीघ्र की गई, विशेष जांच दल (SIT) गठित किया गया और साक्ष्यों तथा गवाहों के बयानों के आधार पर आरोपपत्र अदालत में पेश किया गया। सरकार ने अभियोजन प्रक्रिया, दोषियों को मिली सजा और परिवार को दी गई सहायता को भी अपनी कार्रवाई के हिस्से के रूप में सामने रखा।

सरकार के अनुसार, पीड़ित परिवार को 25 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी गई और परिवार के सदस्यों के लिए रोजगार की व्यवस्था करने के कदम उठाए गए। सरकार ने यह भी कहा कि परिवार की मांग पर मामले में पैरवी करने वाले सरकारी अधिवक्ताओं को बदला गया।

इन सरकारी दावों और परिवार की असंतुष्टि को साथ रखकर देखना आवश्यक है। एक ओर हत्या के मामले में दोषसिद्धि और सजा न्यायिक प्रक्रिया का परिणाम है, वहीं दूसरी ओर परिवार कथित VIP एंगल पर और स्पष्टता चाहता है। परिवार की मांगों का मूल्यांकन किसी राजनीतिक बयान के बजाय दस्तावेजों, जांच की स्थिति और कानूनी तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।

आगे क्या महत्वपूर्ण होगा ?

इस घटनाक्रम के बाद तीन प्रमुख प्रश्न सामने हैं। पहला, परिवार की CBI जांच संबंधी मांग पर आधिकारिक स्तर पर क्या निर्णय और प्रगति होती है। दूसरा, कथित VIP एंगल से जुड़े सवालों की जांच की वास्तविक स्थिति क्या है। तीसरा, पीड़ित परिवार को अपनी बात रखने और शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराने के लिए किस प्रकार का कानूनी तथा प्रशासनिक अवसर मिलता है।

अंकिता भंडारी का मामला केवल एक आपराधिक मुकदमे तक सीमित नहीं रहा है। इसने महिला सुरक्षा, कार्यस्थल पर महिलाओं के अधिकार, संस्थागत जवाबदेही और न्यायिक प्रक्रिया में जनता के भरोसे जैसे व्यापक प्रश्न उठाए हैं।

अंकिता के माता-पिता की मांगों पर अंतिम स्थिति स्पष्ट करने के लिए जांच से संबंधित आधिकारिक दस्तावेजों और सक्षम प्राधिकारियों के बयानों का महत्व बना रहेगा। साथ ही, सभी संबंधित व्यक्तियों के अधिकारों और कानूनी प्रक्रिया का सम्मान करते हुए तथ्यों पर आधारित रिपोर्टिंग ही जनहित में होगी।

हिंदी विंडो का निष्कर्ष: अंकिता भंडारी के माता-पिता की हिरासत और रिहाई ने न्याय की उनकी मांग को फिर राष्ट्रीय विमर्श में ला दिया है। हत्याकांड में तीन दोषियों को आजीवन कारावास की सजा मिल चुकी है, लेकिन परिवार कथित VIP एंगल से जुड़े सवालों के स्पष्ट जवाब चाहता है। अब सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जांच की वास्तविक स्थिति पारदर्शी रूप से सामने आए और किसी भी निष्कर्ष का आधार आरोप नहीं, बल्कि प्रमाण और कानून हों।

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