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आतंकियों तक न पहुंचे सामूहिक विनाश के हथियार, भारत ने वैश्विक सतर्कता और सख्त नियंत्रण पर दिया जोर

आतंकियों तक न पहुंचे विनाशकारी हथियारों की तकनीक
Weapons of Mass Destruction :

रासायनिक और जैविक हथियारों पर अंतरराष्ट्रीय संधियों के प्रभावी क्रियान्वयन की वकालत; दोहरे उपयोग वाली संवेदनशील तकनीक के प्रसार को रोकने पर जोर।

भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस बात की वकालत करता रहा है कि सामूहिक विनाश के हथियार और उनसे जुड़ी संवेदनशील तकनीक आतंकवादी संगठनों या अन्य गैर-राज्य तत्वों के हाथों में नहीं पहुंचनी चाहिए। इस मुद्दे का महत्व केवल परमाणु हथियारों तक सीमित नहीं है। रासायनिक और जैविक हथियारों, उनके निर्माण में इस्तेमाल हो सकने वाली सामग्री तथा दोहरे उपयोग वाली तकनीकों का अवैध हस्तांतरण भी वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती है।

नई दिल्ली/संयुक्त राष्ट्र। सामूहिक विनाश के हथियार ‘Weapons of Mass Destruction’ और उनसे जुड़ी संवेदनशील तकनीक के आतंकवादी संगठनों तक पहुंचने का खतरा अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के सामने एक गंभीर चुनौती बना हुआ है। भारत लंबे समय से इस खतरे से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग, प्रभावी निर्यात नियंत्रण और बहुपक्षीय निरस्त्रीकरण समझौतों के पालन पर जोर देता रहा है।

भारत की इस नीति का एक महत्वपूर्ण आधार संयुक्त राष्ट्र महासभा का वह प्रस्ताव है, जिसे वर्ष 2002 में आतंकवादियों को सामूहिक विनाश के हथियार हासिल करने से रोकने के उद्देश्य से अपनाया गया था। प्रस्ताव में सदस्य देशों से ऐसे हथियारों, उन्हें ले जाने वाली प्रणालियों और उनके निर्माण से संबंधित सामग्री एवं तकनीक तक आतंकवादियों की पहुंच रोकने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कदम मजबूत करने का आग्रह किया गया था।

इस मुद्दे का दायरा केवल परमाणु हथियारों तक सीमित नहीं है। रासायनिक और जैविक हथियारों से जुड़ी सामग्री, उपकरण तथा वैज्ञानिक तकनीक का दुरुपयोग भी बड़े पैमाने पर जनहानि और सीमा-पार सुरक्षा संकट पैदा कर सकता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि विज्ञान और तकनीक का इस्तेमाल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए हो और संवेदनशील क्षमताओं का अवैध हस्तांतरण रोका जा सके।

दोहरे उपयोग वाली तकनीक पर निगरानी क्यों जरूरी ?

आधुनिक विज्ञान में अनेक ऐसी तकनीकें हैं, जिनका इस्तेमाल नागरिक और सैन्य, दोनों क्षेत्रों में हो सकता है। इन्हें दोहरे उपयोग वाली तकनीक (Dual-use Technology) कहा जाता है।

उदाहरण के तौर पर, रसायन उद्योग, जैविक अनुसंधान, प्रयोगशाला उपकरण और कुछ उन्नत विनिर्माण तकनीकों का इस्तेमाल चिकित्सा, कृषि तथा औद्योगिक विकास में किया जा सकता है। लेकिन कुछ परिस्थितियों में ऐसी सामग्री या विशेषज्ञता का दुरुपयोग प्रतिबंधित हथियारों के विकास में भी हो सकता है।

इसलिए प्रभावी नियंत्रण का अर्थ सभी वैज्ञानिक गतिविधियों या अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर प्रतिबंध लगाना नहीं है। इसका उद्देश्य जोखिम वाली वस्तुओं और तकनीकों के हस्तांतरण की निगरानी करना, अंतिम उपयोगकर्ता की पहचान सुनिश्चित करना और अवैध गतिविधियों को रोकना है। रासायनिक हथियार सम्मेलन भी प्रतिबंधित गतिविधियों पर रोक के साथ उन रासायनिक गतिविधियों की अनुमति देता है, जिनका उद्देश्य संधि के तहत निषिद्ध नहीं है।

रासायनिक हथियार सम्मेलन: प्रतिबंध और सत्यापन की व्यवस्था

रासायनिक हथियार सम्मेलन (Chemical Weapons Convention—CWC) रासायनिक हथियारों के विकास, उत्पादन, अधिग्रहण, भंडारण, हस्तांतरण और उपयोग पर प्रतिबंध लगाने वाला प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समझौता है। इसके अंतर्गत सदस्य देशों पर अपने नियंत्रण में मौजूद रासायनिक हथियारों और संबंधित उत्पादन सुविधाओं को निर्धारित प्रावधानों के अनुसार नष्ट करने की जिम्मेदारी भी है।

इस संधि के क्रियान्वयन में रासायनिक हथियारों के निषेध के लिए संगठन (Organisation for the Prohibition of Chemical Weapons—OPCW) की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह संगठन संधि के अनुपालन की निगरानी और सत्यापन से जुड़ी व्यवस्थाओं को लागू करता है।

भारत सहित अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए इस व्यवस्था को प्रभावी बनाए रखना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि रासायनिक पदार्थों का वैध औद्योगिक इस्तेमाल और उनका अवैध हथियार-निर्माण में इस्तेमाल—इन दोनों के बीच अंतर करने के लिए विश्वसनीय निगरानी और राष्ट्रीय स्तर पर उचित नियंत्रण आवश्यक हैं।

जैविक हथियार सम्मेलन: अनुपालन की निगरानी एक बड़ी चुनौती

जैविक हथियार सम्मेलन (Biological Weapons Convention—BWC) का उद्देश्य जैविक और विषाक्त हथियारों के विकास, उत्पादन, अधिग्रहण, हस्तांतरण, भंडारण और उपयोग को प्रतिबंधित करना है।

हालांकि, इस संधि के अंतर्गत रासायनिक हथियार सम्मेलन जैसी कोई स्थायी, स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय सत्यापन संस्था स्थापित नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के आधिकारिक विवरणों में भी इस कमी को जैविक हथियार सम्मेलन के अनुपालन की निगरानी से जुड़ी एक प्रमुख चुनौती बताया गया है। संधि के सदस्य देश परामर्श, सहयोग और विश्वास-निर्माण उपायों के माध्यम से अनुपालन संबंधी चिंताओं को दूर करने का प्रयास कर सकते हैं।

यह चुनौती विज्ञान और प्रौद्योगिकी में तेजी से हो रहे बदलावों के बीच और महत्वपूर्ण हो जाती है। जैविक अनुसंधान का उपयोग बीमारियों की पहचान, टीकों के विकास और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार के लिए होता है। इसलिए सुरक्षा उपायों को मजबूत करते समय शांतिपूर्ण वैज्ञानिक अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को भी सुरक्षित रखना जरूरी है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव 1540 और अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी

सामूहिक विनाश के हथियारों के प्रसार को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव 1540 भी महत्वपूर्ण है। यह सदस्य देशों को ऐसे घरेलू कानून और नियंत्रण व्यवस्था स्थापित करने की जिम्मेदारी देता है, जिनसे गैर-राज्य तत्वों को परमाणु, रासायनिक या जैविक हथियार तथा उनसे संबंधित सामग्री हासिल करने से रोका जा सके।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र को प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में प्रस्ताव 1540 के क्रियान्वयन और निर्यात नियंत्रण से संबंधित कदमों का उल्लेख किया है। भारत ने इस व्यवस्था को आतंकवादियों को सामूहिक विनाश के हथियार हासिल करने से रोकने के व्यापक अंतरराष्ट्रीय प्रयासों से भी जोड़ा है।

इसके साथ ही, भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक अभिसमय (Comprehensive Convention on International Terrorism—CCIT) को अंतिम रूप देने और अपनाने की वकालत करता रहा है। इस पहल का व्यापक उद्देश्य आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कानूनी सहयोग को मजबूत करना है।

आतंकियों तक न पहुंचे विनाशकारी हथियारों की तकनीक

आतंकियों तक न पहुंचे विनाशकारी हथियारों की तकनीक

भारत के लिए इसका क्या महत्व है ?

भारत की भौगोलिक स्थिति, आतंकवाद से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियां और उभरती तकनीकों का तेजी से विस्तार ऐसे विषय हैं, जिनके कारण हथियारों के अवैध प्रसार पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग उसके लिए महत्वपूर्ण बना रहता है।

इस संदर्भ में तीन प्राथमिकताएं विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं:

  • प्रभावी निर्यात नियंत्रण: संवेदनशील वस्तुओं और तकनीकों के अंतिम उपयोगकर्ता तथा संभावित दुरुपयोग की जांच।

  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग: खुफिया जानकारी, तकनीकी विशेषज्ञता और नियामकीय प्रक्रियाओं में देशों के बीच समन्वय।

  • संधियों का समान और प्रभावी क्रियान्वयन: यह सुनिश्चित करना कि रासायनिक और जैविक हथियारों पर प्रतिबंध सभी संबंधित देशों पर समान रूप से लागू हों और अनुपालन की जांच विश्वसनीय हो।

हालांकि, किसी विशेष देश या संस्था पर अवैध हथियार हस्तांतरण में शामिल होने का आरोप लगाने के लिए स्वतंत्र और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक हैं। इसलिए किसी आधिकारिक बयान में देश का नाम लिए बिना व्यक्त की गई चिंता को किसी खास देश के खिलाफ प्रत्यक्ष आरोप के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

वैश्विक सुरक्षा के लिए सतर्कता के साथ जवाबदेही भी जरूरी

सामूहिक विनाश के हथियारों का आतंकवादी संगठनों तक पहुंचना ऐसा जोखिम है, जिसके प्रभाव किसी एक देश की सीमाओं तक सीमित नहीं रहेंगे। इससे निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय संधियों का पालन, प्रभावी सत्यापन, संवेदनशील तकनीक के हस्तांतरण पर निगरानी और देशों के बीच भरोसेमंद सहयोग आवश्यक हैं।

भारत की लंबे समय से चली आ रही नीति इस दिशा में बहुपक्षीय प्रयासों और आतंकवादियों की हथियारों तक पहुंच रोकने पर जोर देती है। अब चुनौती यह है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इन प्रतिबद्धताओं को व्यावहारिक सुरक्षा उपायों में बदले—ताकि वैज्ञानिक प्रगति मानव कल्याण का माध्यम बनी रहे, न कि विनाशकारी हथियारों के प्रसार का।