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यूरोप को रक्षा निर्यात में भारत तीसरे स्थान पर? रक्षा सचिव के बयान से बढ़ी चर्चा

यूरोप में भारत तीसरे स्थान पर? ₹38,424 करोड़ का रिकॉर्ड रक्षा निर्यात

भारत का रक्षा निर्यात वित्त वर्ष 2025–26 में रिकॉर्ड ₹38,424 करोड़ तक पहुंचा। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने यूरोप में भारतीय रक्षा उत्पादों की बढ़ती मांग का उल्लेख किया। हालांकि, यूरोप में तीसरे स्थान की रैंकिंग के लिए मूल रिपोर्ट और उसके आंकड़ों को समझना जरूरी है।

नई दिल्ली | हिंदी विंडो समाचार

भारत के रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को लेकर एक महत्वपूर्ण दावा सामने आया है। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह के अनुसार, भारत पिछले एक वर्ष के दौरान यूरोप को हथियारों का निर्यात करने वाले प्रमुख देशों में शामिल होकर तीसरे स्थान पर पहुंचा है। उन्होंने इस संबंध में ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट का हवाला दिया और यूरोप की ‘रीआर्म यूरोप’ पहल के तहत रक्षा सामग्री की बढ़ती मांग को इसका प्रमुख कारण बताया।

डीडी न्यूज़ की 24 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, रक्षा सचिव ने कहा कि भारत के रक्षा निर्यात का कुल मूल्य रिकॉर्ड ₹38,424 करोड़ तक पहुंच गया है। उन्होंने बताया कि यूरोपीय बाजार में विभिन्न प्रकार के गोला-बारूद, तोप के गोले तथा छोटे और बड़े कैलिबर के अन्य सैन्य उत्पादों की मांग बढ़ी है।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। ₹38,424 करोड़ भारत के कुल रक्षा निर्यात का आंकड़ा है, जबकि यूरोप को निर्यात में तीसरे स्थान पर होने का दावा एक अलग रैंकिंग से संबंधित है। दोनों आंकड़ों को एक ही अर्थ में नहीं लिया जाना चाहिए। तीसरे स्थान की पुष्टि के लिए संबंधित ब्लूमबर्ग रिपोर्ट, उसमें शामिल देशों और आंकड़ों की समयावधि की जांच आवश्यक है।

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‘रीआर्म यूरोप’ पहल और भारतीय रक्षा उद्योग

यूरोप में रक्षा तैयारियों और सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में बढ़ते प्रयासों ने रक्षा उपकरणों की मांग पर ध्यान केंद्रित किया है। इसी संदर्भ में ‘रीआर्म यूरोप’ पहल का उल्लेख किया जा रहा है।

रक्षा सचिव के बयान के अनुसार, यूरोपीय बाजार में मानक गोला-बारूद और तोपखाने से संबंधित उत्पादों की बढ़ती मांग ने भारतीय निर्माताओं के लिए अवसर पैदा किए हैं। हालांकि, इस मांग का दीर्घकालीन लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि भारतीय कंपनियां गुणवत्ता, उत्पादन क्षमता, लागत, समय पर आपूर्ति और संबंधित देशों के निर्यात नियमों की शर्तें कितनी अच्छी तरह पूरी कर पाती हैं।

रक्षा उत्पादों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार में केवल उत्पादन क्षमता पर्याप्त नहीं होती। तकनीकी मानक, प्रमाणन, आपूर्ति की विश्वसनीयता और दीर्घकालीन अनुबंधों को पूरा करने की क्षमता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

पिछले दशक में रक्षा विनिर्माण का विस्तार

रक्षा सचिव ने भारत के रक्षा औद्योगिक ढांचे में पिछले दस वर्षों के दौरान हुए विस्तार का उल्लेख किया। उनके अनुसार, देश में 16 बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा कंपनियों के साथ लगभग 840 बड़ी और मध्यम आकार की निजी कंपनियां तथा स्टार्टअप सहित करीब 17,000 छोटे उद्यम इस क्षेत्र से जुड़े हैं।

इस व्यापक औद्योगिक आधार का महत्व इसलिए है क्योंकि रक्षा उत्पादन में अनेक प्रकार के पुर्जों, उपकरणों, सामग्रियों, इंजीनियरिंग सेवाओं और तकनीकी समाधानों की जरूरत होती है। निजी कंपनियों और छोटे उद्यमों की भागीदारी बढ़ने से उत्पादन के विभिन्न चरणों में घरेलू आपूर्तिकर्ताओं के लिए अवसर पैदा हो सकते हैं।

फिर भी, इन कंपनियों की संख्या को अपने आप में तकनीकी आत्मनिर्भरता या वैश्विक प्रतिस्पर्धा का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसके लिए घरेलू मूल्यवर्धन, स्वदेशी तकनीक, अनुसंधान एवं विकास, पेटेंट, गुणवत्ता और निर्यात प्रदर्शन जैसे संकेतकों का भी आकलन जरूरी है।

₹38,424 करोड़ का निर्यात: क्या बताते हैं आंकड़े ?

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, वित्त वर्ष 2025–26 में भारत का रक्षा निर्यात ₹38,424 करोड़ रहा। वित्त वर्ष 2024–25 के ₹23,622 करोड़ की तुलना में यह लगभग 62.66 प्रतिशत की वृद्धि है।

यह आंकड़ा भारतीय रक्षा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि निर्यात बढ़ने से निर्माताओं को घरेलू मांग के अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी अवसर मिल सकते हैं। इससे उत्पादन क्षमता के विस्तार, रोजगार, आपूर्तिकर्ता नेटवर्क और तकनीकी विकास को प्रोत्साहन मिलने की संभावना है।

हालांकि, कुल रक्षा निर्यात और यूरोप को होने वाले निर्यात के आंकड़े अलग-अलग हैं। कुल निर्यात में कितनी हिस्सेदारी यूरोप की है, किन देशों को कितना सामान भेजा गया और उसमें किस प्रकार के उत्पाद शामिल हैं—इन सवालों के उत्तर के लिए अलग-अलग बाजारों के आंकड़ों की आवश्यकता होगी।

80 से अधिक देशों तक पहुंच

रक्षा सचिव के अनुसार, भारत अब 80 से अधिक देशों को रक्षा सामग्री निर्यात करता है। इन उत्पादों में भारी सैन्य उपकरणों और गोला-बारूद के अलावा छोटे हथियार, हेलमेट, बुलेटप्रूफ जैकेट और अन्य सामरिक सुरक्षा उपकरण भी शामिल हैं।

निर्यात बाजारों का विस्तार भारतीय कंपनियों को अलग-अलग देशों की जरूरतों के अनुरूप उत्पाद विकसित करने का अवसर दे सकता है। साथ ही, व्यापक बाजार तक पहुंच बनाए रखने के लिए निर्यात नियंत्रण, अंतिम उपयोगकर्ता की जांच और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का पालन भी जरूरी है।

स्वदेशी उत्पादन और तकनीकी आत्मनिर्भरता

रक्षा सचिव ने बताया कि सरकार का उद्देश्य रक्षा क्षेत्र में पूंजीगत खर्च का बड़ा हिस्सा देश के भीतर करना है। उन्होंने प्रतिवर्ष लगभग 20 से 25 अरब डॉलर के रक्षा पूंजीगत व्यय का 75 प्रतिशत घरेलू स्तर पर खर्च करने की नीति का उल्लेख किया।

इस संदर्भ में IDDM का अर्थ है—Indian Designed, Developed and Manufactured, यानी भारत में डिजाइन किए गए, विकसित किए गए और निर्मित उत्पाद। इस व्यवस्था का उद्देश्य केवल देश में उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि स्वदेशी डिजाइन और तकनीकी क्षमता को भी प्रोत्साहित करना है।

वास्तविक तकनीकी आत्मनिर्भरता का आकलन करने के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि किसी उपकरण की डिजाइन, महत्वपूर्ण तकनीक, सॉफ्टवेयर, इंजन, इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों और अन्य प्रमुख घटकों पर कितना घरेलू नियंत्रण है।

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यूरोपीय कंपनियों के साथ संयुक्त उद्यम की योजना

रक्षा सचिव के बयान के अनुसार, भारत यूरोप के रक्षा खरीद कार्यक्रमों में अपनी भागीदारी बढ़ाना चाहता है। इसके लिए यूरोपीय देशों में भारतीय कंपनियों के संयुक्त उद्यम स्थापित करने और यूरोपीय साझेदारों को भारत में उत्पादन संबंधी साझेदारी के लिए प्रोत्साहित करने की संभावनाओं पर काम किया जा रहा है।

ऐसे संयुक्त उद्यम भारतीय कंपनियों को स्थानीय बाजार, तकनीकी सहयोग और आपूर्ति श्रृंखलाओं तक पहुंच दिला सकते हैं। दूसरी ओर, यूरोपीय कंपनियों को भारत के बड़े रक्षा बाजार और विनिर्माण आधार से जुड़ने का अवसर मिल सकता है।

हालांकि, इन योजनाओं की सफलता निवेश, तकनीकी हस्तांतरण की शर्तों, बौद्धिक संपदा अधिकारों, सरकारी खरीद नियमों और वास्तविक व्यावसायिक अनुबंधों पर निर्भर करेगी। प्रस्तावित सहयोग और हस्ताक्षरित या लागू हो चुके अनुबंधों के बीच अंतर स्पष्ट रखना भी जरूरी है।

आगे की चुनौती क्या होगी ?

भारत के रक्षा निर्यात में वृद्धि एक महत्वपूर्ण आर्थिक और औद्योगिक घटनाक्रम है। लेकिन निर्यात का रिकॉर्ड और किसी क्षेत्रीय बाजार में तीसरा स्थान हासिल करने का दावा, दोनों अलग-अलग प्रश्न हैं। रैंकिंग की पुष्टि के लिए मूल स्रोत के आंकड़ों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है।

इसके अलावा, यह देखना होगा कि यूरोप में मांग बढ़ने के बाद भारतीय कंपनियां कितने समय तक नियमित आपूर्ति बनाए रख पाती हैं, क्या उन्हें नए दीर्घकालीन अनुबंध मिलते हैं और क्या निर्यात में वृद्धि से घरेलू तकनीकी क्षमता भी मजबूत होती है।

निष्कर्ष: भारत का ₹38,424 करोड़ का रिकॉर्ड रक्षा निर्यात देश के रक्षा विनिर्माण क्षेत्र के विस्तार का महत्वपूर्ण संकेत है। रक्षा सचिव ने यूरोप में बढ़ती मांग और भारत की संभावित तीसरी रैंकिंग का उल्लेख किया है। अब इस दावे का व्यापक मूल्यांकन करने के लिए यूरोप-विशिष्ट व्यापार आंकड़ों, मूल रैंकिंग रिपोर्ट और भविष्य के वास्तविक अनुबंधों पर नजर रखना जरूरी होगा।