अरुणाचल प्रदेश में 11,200 मेगावाट की सियांग अपर मल्टीपर्पज़ परियोजना का विरोध क्यों हो रहा है? जानिए चीन के मेगा बांध, आदि समुदाय की चिंताओं, विस्थापन, पर्यावरणीय जोखिम और सरकार के तर्क की पूरी कहानी।
पासीघाट/ईटानगर | हिंदी विंडो विशेष रिपोर्ट
अरुणाचल प्रदेश की सियांग घाटी में प्रस्तावित एक विशाल जलविद्युत परियोजना ने राष्ट्रीय सुरक्षा, ऊर्जा उत्पादन, पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी अधिकारों से जुड़ी बहस को तेज कर दिया है। चीन की ओर से तिब्बत में यारलुंग सांगपो नदी पर दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक विकसित किए जाने के बीच भारत की 11,200 मेगावाट क्षमता वाली सियांग अपर मल्टीपर्पज़ परियोजना (SUMP) को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लेकिन जिस परियोजना को जल और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से अहम बताया जा रहा है, उसके खिलाफ स्थानीय समुदायों का विरोध भी गहराता जा रहा है।
23 अक्टूबर 2026 को अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी सियांग जिले के पासीघाट में विरोध प्रदर्शन के बाद हिंसा भड़क उठी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने राष्ट्रीय जलविद्युत निगम (NHPC) के कार्यालय और एक पुलिस थाने में आग लगा दी। पुलिस वाहनों को नुकसान पहुंचाने तथा राजनीतिक प्रतिनिधियों से जुड़े आवासों में तोड़फोड़ की खबरें भी सामने आईं। झड़पों में पुलिसकर्मियों और प्रदर्शनकारियों के घायल होने की सूचना मिली। अधिकारियों ने हिंसा के सिलसिले में गिरफ्तारियों और आपराधिक मामलों की जानकारी भी दी।
यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है, जब परियोजना के शुरुआती सर्वेक्षण और व्यवहार्यता आकलन को लेकर स्थानीय संगठनों और प्रशासन के बीच तनाव बना हुआ है। हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाओं की निष्पक्ष जांच जरूरी है। साथ ही, यह समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि परियोजना के खिलाफ विरोध के पीछे कौन-सी सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय चिंताएं हैं।
आखिर क्या है सियांग अपर मल्टीपर्पज़ परियोजना ?
प्रस्तावित सियांग अपर मल्टीपर्पज़ प्रोजेक्ट की क्षमता 11,200 मेगावाट बताई गई है। यह अरुणाचल प्रदेश के अपर सियांग, सियांग और ईस्ट सियांग जिलों से जुड़े क्षेत्र में प्रस्तावित है। परियोजना को विकसित करने में NHPC की भूमिका है।
राज्य और केंद्र सरकार के पक्ष में दिया जाने वाला प्रमुख तर्क यह है कि परियोजना से बड़े पैमाने पर बिजली उत्पादन के साथ-साथ जल भंडारण और बाढ़ प्रबंधन की संभावनाओं का आकलन किया जा सकता है। चीन की ओर से ऊपरी धारा में विशाल बांध बनाए जाने के कारण भारत के लिए नदी के प्रवाह, जल उपलब्धता और संभावित आपात स्थितियों को लेकर रणनीतिक तैयारी भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।
हालांकि, परियोजना की घोषित क्षमता को उसके अंतिम निर्माण, स्वीकृति या सभी लाभों की गारंटी नहीं समझना चाहिए। शुरुआती व्यवहार्यता अध्ययन से यह पता लगाने की कोशिश की जाती है कि कोई प्रस्तावित परियोजना तकनीकी और अन्य पहलुओं से आगे बढ़ाने योग्य है या नहीं।
स्थानीय आदि समुदाय क्यों कर रहा है विरोध ?
सियांग घाटी में रहने वाले आदि समुदाय और अन्य स्थानीय समूहों की चिंता केवल एक बांध के निर्माण तक सीमित नहीं है। उनके लिए नदी, जमीन, जंगल, खेती और पारंपरिक जीवन-पद्धति आपस में गहराई से जुड़े हैं।
स्थानीय विरोध से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार, लोगों को आशंका है कि विशाल जलाशय बनने की स्थिति में नदी के किनारे बसे गांव, धान के खेत और पारंपरिक उपयोग वाली जमीनें डूब सकती हैं। इससे लोगों को अपने घरों और आजीविका से विस्थापित होना पड़ सकता है। नदी के साथ जुड़ी सांस्कृतिक परंपराओं, ऐतिहासिक स्थलों और सामुदायिक पहचान पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
स्थानीय किसान संगठनों ने 27 गांवों के डूबने और डेढ़ लाख से अधिक लोगों के विस्थापन की आशंका व्यक्त की है। यह विरोध करने वाले समूहों का दावा है; इसे अंतिम सरकारी विस्थापन आकलन नहीं माना जाना चाहिए। वास्तविक प्रभावित गांवों, परिवारों, कृषि भूमि और सांस्कृतिक स्थलों की संख्या का निर्धारण विस्तृत परियोजना दस्तावेजों तथा स्वतंत्र सामाजिक प्रभाव आकलन से ही किया जा सकता है।
विरोध कर रहे संगठनों ने सर्वेक्षण के दौरान स्थानीय सहमति, सुरक्षा बलों की तैनाती और प्रभावित लोगों को पर्याप्त जानकारी दिए जाने पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि किसी भी बड़े फैसले से पहले समुदायों की आशंकाओं को सुना जाना चाहिए और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए।
Photo Credit : The Telegraph
चीन के बांध से क्या है इसका संबंध ?
तिब्बत में यारलुंग सांगपो नदी पर चीन की विशाल जलविद्युत परियोजना इस विवाद का रणनीतिक पक्ष है। यही नदी भारत में अरुणाचल प्रदेश में सियांग के नाम से प्रवेश करती है और आगे चलकर असम में ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र का हिस्सा बनती है। इसके बाद नदी बांग्लादेश की ओर बढ़ती है।
चीन की परियोजना की प्रस्तावित क्षमता लगभग 60,000 मेगावाट बताई जाती है। भारत में इस परियोजना को लेकर चिंता यह है कि ऊपरी धारा में बड़े पैमाने पर जलविद्युत ढांचा बनने से नदी के प्रवाह, जल प्रबंधन, पारिस्थितिकी और आपातकालीन परिस्थितियों पर संभावित प्रभाव पड़ सकता है।
भारतीय पक्ष के रणनीतिक तर्क के अनुसार, सियांग परियोजना जल भंडारण की क्षमता विकसित करने और बाढ़ के जोखिमों से निपटने की दीर्घकालीन योजना का हिस्सा हो सकती है। लेकिन किसी बांध का होना अपने आप यह सुनिश्चित नहीं करता कि अचानक आने वाली हर बाढ़ या चीन की ओर से पानी छोड़े जाने की किसी भी स्थिति को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकेगा। इसके लिए नदी के वास्तविक प्रवाह, जलाशय की क्षमता, मौसम संबंधी पूर्वानुमान, संचालन नियमों और दोनों देशों के बीच समय पर सूचना साझा किए जाने जैसे पहलुओं का मूल्यांकन आवश्यक है।
यहां एक अहम अंतर समझना चाहिए: बिजली उत्पादन क्षमता और जल भंडारण क्षमता दो अलग-अलग माप हैं। अधिक मेगावाट क्षमता वाला बांध जरूरी नहीं कि उतना ही अधिक पानी जमा करे। इसलिए दोनों परियोजनाओं की तुलना केवल उनकी बिजली उत्पादन क्षमता से करना पर्याप्त नहीं है।
क्या अभी बांध निर्माण की मंजूरी मिल चुकी है ?
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, परियोजना से जुड़ा प्री-फिजिबिलिटी आकलन चर्चा का प्रमुख विषय है। मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने कहा है कि प्री-फिजिबिलिटी रिपोर्ट किसी परियोजना की तकनीकी व्यवहार्यता और संभावित प्रभावों का शुरुआती आकलन होती है; यह अपने आप निर्माण की अंतिम मंजूरी नहीं है।
यदि परियोजना इस शुरुआती चरण में आगे बढ़ने योग्य पाई जाती है, तो आगे विस्तृत परियोजना रिपोर्ट, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, सामाजिक प्रभाव आकलन और लागू कानूनी तथा नियामकीय प्रक्रियाओं की जरूरत हो सकती है। किन चरणों में कौन-सी मंजूरी अनिवार्य होगी, यह परियोजना के स्वरूप और लागू नियमों के अनुसार निर्धारित किया जाना चाहिए।
इसलिए वर्तमान बहस में यह स्पष्ट रखना जरूरी है कि सर्वेक्षण, व्यवहार्यता आकलन, पर्यावरणीय स्वीकृति और वास्तविक निर्माण अलग-अलग चरण हैं। किसी एक चरण को पूरा होना बाकी सभी चरणों की मंजूरी के बराबर नहीं माना जा सकता।
पर्यावरण और भूकंप से जुड़े जोखिम
सियांग घाटी हिमालय के संवेदनशील भौगोलिक क्षेत्र में स्थित है। इस कारण बड़े बांध के संभावित प्रभावों का आकलन करते समय भूकंपीय जोखिम, भूस्खलन, भारी वर्षा, अचानक बाढ़, नदी में तलछट के प्रवाह और जलवायु परिवर्तन से जुड़े जोखिमों को गंभीरता से देखना होगा।
परियोजना पर चिंता जताने वाले वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पीछे हटने, हिमनदीय झीलों के अचानक फटने से आने वाली बाढ़ तथा चरम मौसमी घटनाओं की चुनौतियों की ओर ध्यान दिलाया है। इन परिस्थितियों में बड़े जलाशय की सुरक्षा और संचालन के लिए क्षेत्र-विशिष्ट वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी होंगे।
इसका अर्थ यह नहीं है कि परियोजना निश्चित रूप से असुरक्षित है। इसका अर्थ यह है कि सुरक्षा के पक्ष में निर्णय लेने से पहले जोखिमों का स्वतंत्र, पारदर्शी और वैज्ञानिक मूल्यांकन होना चाहिए। भूकंप, भूगर्भीय संरचना, जलविज्ञान और जलाशय से जुड़े प्रभावों के निष्कर्ष सार्वजनिक होने चाहिए, ताकि विशेषज्ञों और प्रभावित समुदायों के सवालों का उत्तर दिया जा सके।
हिंसा के बाद सरकार और प्रशासन की चुनौती
पासीघाट में आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाओं के बाद प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था बहाल करने और सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने की चुनौती है। मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने हिंसा की आलोचना करते हुए प्रदर्शनकारियों से बातचीत का रास्ता अपनाने की अपील की है। सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि परियोजना को लेकर लोगों की शंकाओं पर चर्चा की जा सकती है।
लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध और सरकार से जवाब मांगना नागरिकों का महत्वपूर्ण अधिकार है। वहीं, आगजनी, हमले और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाओं की जांच कानून के अनुसार होनी चाहिए। किसी भी पक्ष की जिम्मेदारी तय करते समय व्यक्तिगत भूमिका, साक्ष्य और निष्पक्ष जांच महत्वपूर्ण हैं।
सरकार और परियोजना एजेंसियों के लिए केवल प्रचार या आश्वासन पर्याप्त नहीं होंगे। उन्हें स्थानीय लोगों के सवालों के जवाब, सर्वेक्षण की जानकारी, संभावित विस्थापन का आकलन, पर्यावरणीय अध्ययन और शिकायतों के समाधान की स्पष्ट व्यवस्था सामने रखनी होगी। समुदायों की सार्थक भागीदारी के बिना इतने बड़े प्रोजेक्ट पर भरोसा कायम करना कठिन हो सकता है।
आगे का रास्ता क्या हो सकता है ?
सियांग परियोजना से जुड़ा विवाद भारत की ऊर्जा और जल सुरक्षा की जरूरतों तथा स्थानीय समुदायों के अधिकारों के बीच संतुलन की कठिन चुनौती को सामने लाता है। चीन की ऊपरी धारा में बन रही परियोजना को लेकर भारत की रणनीतिक चिंताएं महत्वपूर्ण हैं। लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क अपने आप स्थानीय विस्थापन, पर्यावरणीय प्रभाव या सुरक्षा संबंधी सवालों का उत्तर नहीं बन जाता।
आगे बढ़ने के लिए कम-से-कम पांच कदम महत्वपूर्ण होंगे: प्रभावित गांवों और परिवारों की स्वतंत्र पहचान; स्थानीय भाषाओं में परियोजना संबंधी दस्तावेजों और जोखिमों की जानकारी; वैज्ञानिक तथा पर्यावरणीय आकलन की पारदर्शिता; उचित पुनर्वास और आजीविका सुरक्षा की स्पष्ट योजना; तथा समुदायों, प्रशासन और परियोजना एजेंसियों के बीच नियमित संवाद।
सियांग नदी केवल बिजली उत्पादन या रणनीतिक योजना का विषय नहीं है। यह स्थानीय लोगों के जीवन, संस्कृति और भविष्य से भी जुड़ी है। इसलिए किसी भी अंतिम निर्णय में राष्ट्रीय हित, पर्यावरणीय सुरक्षा और स्थानीय समुदायों के अधिकारों को साथ रखकर विचार करना आवश्यक होगा।
हिंदी विंडो का निष्कर्ष: सियांग परियोजना पर फैसला केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि वह चीन की परियोजना का जवाब दे सकती है या नहीं। असली कसौटी यह होगी कि क्या भारत जल और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करते हुए प्रभावित समुदायों के अधिकारों, पर्यावरणीय जोखिमों और वैज्ञानिक प्रमाणों के प्रति भी पूरी जवाबदेही निभा सकता है।













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