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ट्रंप-मोदी के ‘बेहद अच्छे रिश्ते’ से सुलझेगा रूसी तेल पर टैरिफ विवाद? अमेरिकी सलाहकार नवारो ने दिया बड़ा संकेत

नई दिल्ली/वॉशिंगटन | 12 अगस्त 2026

भारत और अमेरिका के रिश्तों में रूस से तेल खरीद को लेकर पैदा हुए तनाव के बीच वॉशिंगटन से एक अपेक्षाकृत नरम संकेत सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सलाहकार पीटर नवारो ने कहा है कि ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच “बहुत अच्छे कार्य संबंध” हैं और दोनों नेता रूस से तेल खरीद के मुद्दे पर पैदा हुए मतभेद को स्वयं सुलझा सकते हैं।

नवारो की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब अमेरिका में एक प्रस्तावित कानून के जरिए रूस से तेल और गैस खरीदने वाले कुछ बड़े देशों पर भारी टैरिफ लगाने की संभावना चर्चा में है। अमेरिकी सीनेट ने 7 अगस्त को Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 को 86-11 के मत से पारित किया था। प्रस्तावित कानून राष्ट्रपति को रूस के प्रमुख ऊर्जा खरीदार देशों से आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का विवेकाधिकार दे सकता है।

नवारो ने क्या कहा ?

समाचार एजेंसी ANI के एक सवाल के जवाब में पीटर नवारो ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति और भारतीय प्रधानमंत्री के बीच अच्छे कार्य संबंध हैं और रूस से तेल खरीद तथा उससे जुड़े टैरिफ विवाद को दोनों नेता सीधे मिलकर सुलझाएंगे।

उनका संकेत यह था कि इस संवेदनशील मुद्दे पर दूसरे अधिकारियों या समूहों के बजाय अंतिम बातचीत दोनों शीर्ष नेताओं के स्तर पर हो सकती है।

विवाद की जड़ क्या है ?

रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रूसी कच्चे तेल की खरीद काफी बढ़ाई। रूसी तेल कई बार अन्य विकल्पों की तुलना में छूट पर उपलब्ध रहा, जिससे भारतीय रिफाइनरियों को वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उतार-चढ़ाव के बीच अपेक्षाकृत कम लागत पर कच्चा तेल हासिल करने में मदद मिली।

भारत का तर्क रहा है कि उसकी ऊर्जा खरीद राष्ट्रीय हित, बाजार की परिस्थितियों और देश की विशाल ऊर्जा जरूरतों के आधार पर की जाती है। वहीं अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का आरोप रहा है कि रूसी ऊर्जा की खरीद से मॉस्को को राजस्व मिलता है, जिसका इस्तेमाल युद्ध के लिए किया जा सकता है।

100 प्रतिशत टैरिफ की बात कितनी पक्की है ?

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। अभी यह कहना सही नहीं होगा कि भारत पर 100 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ लागू हो गया है।

अमेरिकी सीनेट द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति को कुछ परिस्थितियों में रूस के बड़े ऊर्जा खरीदार देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रस्ताव करता है। भारत और चीन रूस के प्रमुख कच्चे तेल खरीदारों में शामिल हैं। अंतिम कार्रवाई राष्ट्रपति के निर्णय और संबंधित कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।

भारत-अमेरिका व्यापार पर क्या असर हो सकता है?

यदि भविष्य में भारी अतिरिक्त टैरिफ लागू होता है, तो अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति प्रभावित हो सकती है। इससे निर्यातकों की लागत, कीमत और अमेरिकी बाजार में मांग पर दबाव पड़ने की आशंका रहेगी।

लेकिन फिलहाल नवारो का बयान यह संकेत देता है कि वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच संवाद का रास्ता खुला हुआ है और शीर्ष नेतृत्व स्तर पर समाधान तलाशने की संभावना बनी हुई है।

भारत और अमेरिका ने फरवरी 2026 में एक अंतरिम व्यापार समझौते के लिए रूपरेखा की घोषणा भी की थी, जिसमें दोनों देशों ने पारस्परिक बाजार पहुंच, व्यापार बाधाओं को कम करने और व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते की दिशा में आगे बढ़ने की प्रतिबद्धता जताई थी।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह घटनाक्रम ?

भारत के लिए चुनौती दो स्तरों पर है—एक तरफ सस्ती और विश्वसनीय ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करना और दूसरी तरफ अमेरिका जैसे बड़े निर्यात बाजार के साथ व्यापारिक संबंधों को स्थिर रखना।

यही वजह है कि नवारो का ताजा बयान सिर्फ एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि भारत-अमेरिका संबंधों में संभावित बातचीत की गुंजाइश के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है।

हालांकि, अंतिम तस्वीर अमेरिकी प्रशासन के अगले कदम, प्रस्तावित कानून की प्रक्रिया और भारत-अमेरिका के बीच होने वाली बातचीत के बाद ही स्पष्ट होगी।

निष्कर्ष:
फिलहाल भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लागू होने की पुष्टि नहीं है। लेकिन रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिकी दबाव वास्तविक है। ऐसे में ट्रंप और मोदी के बीच सीधे संवाद की संभावना भारत के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक और आर्थिक विकल्प बनी हुई है।