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पाकिस्तान में हिंदुओं को ‘सहन’ करने की बात पर घिरे राष्ट्रपति जरदारी, जनगणना के आंकड़े भी उनके दावे से अलग

इस्लामाबाद/नई दिल्ली, 15 अगस्त 2026:
पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की एक टिप्पणी ने वहां के अल्पसंख्यकों के अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर नई बहस छेड़ दी है। पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस पर 14 अगस्त को इस्लामाबाद में आयोजित एक कार्यक्रम में जरदारी ने भारत और ‘अखंड भारत’ का जिक्र करते हुए पाकिस्तान में हिंदू आबादी को लेकर कहा कि मुस्लिम बहुसंख्यक हिंदुओं को “tolerate” यानी “सहन” करते हैं। उन्होंने पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी करीब 3 से 4 प्रतिशत बताई।

जरदारी ने यह भी कहा कि पाकिस्तान में हिंदू उतने ही स्वतंत्र हैं और वहां रहना पसंद करते हैं। उनके बयान के अनुसार, पाकिस्तान में हिंदुओं के साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है कि वे भारत की तुलना में पाकिस्तान में रहना पसंद करेंगे।

लेकिन आधिकारिक जनगणना क्या कहती है?

जरदारी के 3–4 प्रतिशत के अनुमान की तुलना पाकिस्तान की आधिकारिक 2023 जनगणना से करने पर तस्वीर अलग दिखाई देती है।

पाकिस्तान ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स की 2023 जनगणना तालिका के अनुसार देश की कुल आबादी 24,04,58,089 दर्ज की गई। इनमें 38,67,729 लोग ‘Hindu Jati’ और 13,49,487 लोग ‘Scheduled Castes’ के रूप में दर्ज हैं। दोनों श्रेणियों को जोड़ने पर संख्या करीब 52.17 लाख बैठती है, जो कुल आबादी का लगभग 2.17 प्रतिशत है।

इसलिए राष्ट्रपति जरदारी द्वारा बताई गई 3–4 प्रतिशत की संख्या आधिकारिक 2023 जनगणना के आंकड़े से मेल नहीं खाती।

‘Tolerance’ शब्द पर क्यों उठे सवाल?

पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा केवल आबादी का आंकड़ा नहीं, बल्कि राष्ट्रपति द्वारा इस्तेमाल किया गया “tolerate” शब्द है।

किसी देश के राष्ट्रपति द्वारा किसी धार्मिक अल्पसंख्यक के संदर्भ में यह कहना कि बहुसंख्यक समुदाय उसे “सहन” करता है, नागरिकों की समानता और धार्मिक स्वतंत्रता के सवाल को सामने लाता है।

पाकिस्तान का संवैधानिक ढांचा धार्मिक स्वतंत्रता और नागरिकों के अधिकारों की बात करता है, लेकिन देश की धार्मिक स्वतंत्रता की वास्तविक स्थिति को लेकर अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं लंबे समय से चिंता जताती रही हैं।

धार्मिक स्वतंत्रता पर अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में क्या कहा गया?

अमेरिकी US Commission on International Religious Freedom (USCIRF) पाकिस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति पर लगातार चिंता व्यक्त करता रहा है।

USCIRF के अनुसार पाकिस्तान में ईशनिंदा कानूनों का इस्तेमाल धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ गंभीर समस्याएं पैदा करता है। संस्था ने हिंदुओं, ईसाइयों और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा, जबरन धर्म परिवर्तन और भीड़ की हिंसा जैसे मामलों का उल्लेख किया है।

USCIRF की 2025 पाकिस्तान अपडेट में हिंदू और ईसाई लड़कियों के कथित अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और जबरन विवाह के मामलों का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट में पाकिस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता की परिस्थितियों को बेहद खराब बताया गया।

2025 की USCIRF रिपोर्ट ने पाकिस्तान में हिंदुओं, ईसाइयों तथा अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के सामने मौजूद गंभीर चुनौतियों और ईशनिंदा कानून से जुड़े मामलों को भी रेखांकित किया था।

क्या 1947 में हिंदू आबादी 14.6 प्रतिशत थी? सावधानी जरूरी

इस मुद्दे पर एक और तथ्य को समझना जरूरी है।

पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी के ऐतिहासिक आंकड़ों को सीधे 1947 से आज तक तुलना करते समय क्षेत्रीय बदलावों को ध्यान में रखना होगा। 1941 की जनगणना का 14.6 प्रतिशत आंकड़ा उन क्षेत्रों से जुड़ा था जो आज पाकिस्तान का हिस्सा हैं। वहीं 1971 से पहले पाकिस्तान में पूर्वी पाकिस्तान भी शामिल था, जो बाद में बांग्लादेश बना और जहां हिंदू आबादी काफी बड़ी थी। इसलिए 1947 के पाकिस्तान की तुलना आज के पाकिस्तान से सीधे करना भ्रामक हो सकता है।

मुद्दा सिर्फ संख्या का नहीं, समान नागरिकता का है

जरदारी का बयान इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि किसी अल्पसंख्यक समुदाय की मौजूदगी अपने आप में धार्मिक स्वतंत्रता का प्रमाण नहीं मानी जा सकती।

सवाल यह है कि क्या अल्पसंख्यकों को केवल “सहन” किया जाता है या उन्हें समान नागरिक अधिकार, सुरक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता और कानून के सामने समान संरक्षण मिलता है?

यही वह बिंदु है जहां राष्ट्रपति के बयान और पाकिस्तान के धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी रिकॉर्ड के बीच बहस खड़ी होती है।

हिंदी विंडो का निष्कर्ष:
राष्ट्रपति जरदारी की टिप्पणी का तथ्यात्मक परीक्षण दो स्तरों पर किया जा सकता है—पहला, हिंदू आबादी के संबंध में उनका 3–4 प्रतिशत का अनुमान पाकिस्तान की 2023 आधिकारिक जनगणना के लगभग 2.17 प्रतिशत के आंकड़े से मेल नहीं खाता। दूसरा, “सहन करने” जैसी भाषा को समान नागरिकता और धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक सिद्धांतों के संदर्भ में देखना जरूरी है। वहीं पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर USCIRF जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्टें गंभीर चिंताएं दर्ज करती रही हैं।