जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से जुड़े मामले में सात दिन की न्यायिक हिरासत के बाद कानूनी कार्रवाई तेज। CJP ने हिरासत की प्रक्रिया पर उठाए सवाल; पुलिस ने सार्वजनिक व्यवस्था को लेकर जताई थी चिंता।
नई दिल्ली | 20 अक्टूबर 2026 | हिंदी विंडो ब्यूरो
दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से जुड़े मामले में Cockroach Janta Party (CJP) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका ने अपनी हिरासत को चुनौती देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया है। दोनों नेताओं ने विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट (Special Executive Magistrate—SEM) के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसके तहत 19 अक्टूबर को उनकी न्यायिक हिरासत दो दिन और बढ़ा दी गई थी। इसके साथ ही उनकी कुल हिरासत अवधि सात दिन हो गई।
The Indian Express की 20 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, याचिका में हिरासत की प्रक्रिया, जमानतदारों की अस्वीकृति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि दशहरा अवकाश के कारण दिल्ली हाई कोर्ट 26 अक्टूबर तक नियमित रूप से नहीं बैठ रहा था और उस समय तक किसी विशेष अवकाश पीठ की बैठक की सूचना नहीं थी। इसलिए याचिका दायर होने का अर्थ यह नहीं है कि तत्काल सुनवाई या रिहाई का आदेश मिल चुका है।
क्या है पूरा मामला ?
यह मामला दिल्ली के जंतर-मंतर प्रदर्शन स्थल से जुड़ा है। रिपोर्टों के अनुसार, 13 अक्टूबर को हुए घटनाक्रम के बाद सौरव दास और आशुतोष रांका को 14 अक्टूबर को गिरफ्तार किया गया। पुलिस का आरोप था कि प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने सुरक्षा अवरोधों को पार कर ऐसे स्थान में प्रवेश किया, जिसे उस समय अधिकृत प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाया जा चुका था।
Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, इस समूह में 14 लोग शामिल थे। रिपोर्ट में बताया गया कि प्रदर्शनकारियों ने भारतीय तिरंगा फहराया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए नारे लगाए। इसके बाद पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया। दोनों CJP नेताओं को पहले पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया था।
इस प्रदर्शन की पृष्ठभूमि में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर चल रहा विवाद है। CJP और कुछ अन्य प्रदर्शनकारी संगठनों ने मतदाता सूची में बदलावों पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि इन बदलावों से चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।
दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग ने राजनीतिक पक्षपात के आरोपों को खारिज किया है। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, आयोग का कहना है कि जिन पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हट गए हैं, वे दोबारा पंजीकरण करा सकते हैं। भारतीय जनता पार्टी ने भी चुनावी प्रक्रिया पर लगाए जा रहे आरोपों का विरोध किया है।
हिरासत दो दिन और क्यों बढ़ाई गई ?
19 अक्टूबर को विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट ने दोनों नेताओं की न्यायिक हिरासत दो दिन और बढ़ा दी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने आशंका जताई थी कि उनकी रिहाई से सार्वजनिक शांति और व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। पुलिस ने यह भी कहा कि दोनों नेताओं ने पहले दिए गए बांड की शर्तों का कथित उल्लंघन किया।
विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के आदेश में उनके आचरण और प्रतिबंधित प्रदर्शन स्थल पर बार-बार प्रदर्शन बुलाने को लेकर प्रतिकूल टिप्पणियां की गईं। यह प्रशासनिक पक्ष का आधार है; इसे किसी आपराधिक मुकदमे में अंतिम दोषसिद्धि नहीं समझा जाना चाहिए।
CJP ने हिरासत की प्रक्रिया पर क्या सवाल उठाए ?
CJP की कानूनी प्रमुख रत्ना सिंह और दोनों नेताओं की ओर से पेश पक्ष ने हिरासत की वैधता और प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। The Indian Express के अनुसार, याचिका में दावा किया गया कि जमानतदार उपलब्ध कराने के बावजूद उन्हें स्वीकार नहीं किया गया और हिरासत बढ़ाने के आदेश में आवश्यक विवरणों तथा स्वतंत्र विचार का अभाव था।
रिपोर्ट के अनुसार, एक जमानतदार के मामले में तस्वीर और आधार कार्ड के विवरण के बीच कथित अंतर बताया गया, जबकि दूसरे के दस्तावेजों में कुछ बुनियादी जानकारियां अधूरी बताई गईं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इन आधारों पर उनकी रिहाई रोकना व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के विपरीत है।
CJP ने अपनी याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हवाला दिया है। पार्टी का पक्ष है कि हिरासत के लिए पर्याप्त और कानूनी रूप से उचित आधार होने चाहिए तथा प्रक्रिया में निष्पक्षता बरती जानी चाहिए।
हालांकि, याचिका में लगाए गए आरोप अभी याचिकाकर्ताओं के दावे हैं। इन पर अंतिम न्यायिक निर्णय की जानकारी इस रिपोर्ट के प्रकाशन के समय उपलब्ध नहीं थी।
अब आगे क्या होगा ?
अब इस मामले में महत्वपूर्ण सवाल यह है कि दिल्ली हाई कोर्ट याचिका पर कब सुनवाई करता है और हिरासत आदेश की वैधता को लेकर क्या निर्णय देता है। अदालत के समक्ष जमानतदारों से संबंधित आपत्तियां, मजिस्ट्रेट के आदेश का आधार और लागू कानूनी प्रावधान महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
यह मामला केवल दो राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हिरासत तक सीमित नहीं है। इससे यह व्यापक सवाल भी जुड़ा है कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन को कौन-सी कानूनी शक्तियां प्राप्त हैं और उन शक्तियों का इस्तेमाल करते समय नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध और सार्वजनिक व्यवस्था, दोनों महत्वपूर्ण हैं। प्रशासन को कानून के अनुसार व्यवस्था बनाए रखनी होती है, जबकि हिरासत में लिए गए लोगों को भी उचित प्रक्रिया और न्यायिक समीक्षा का अधिकार प्राप्त है।
अस्वीकरण: यह समाचार सूचना के उद्देश्य से है, कानूनी सलाह नहीं। किसी पक्ष पर लगाए गए आरोपों को न्यायिक निष्कर्ष के रूप में न पढ़ें।












