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लिव-इन रिश्ते में वयस्कों की पसंद सर्वोपरि, माता-पिता भी नहीं कर सकते दखल: दिल्ली हाईकोर्ट

नई दिल्ली | 20 अगस्त 2026

लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि दो वयस्क अपनी इच्छा और आपसी सहमति से साथ रह रहे हैं, तो उनके निजी रिश्ते में माता-पिता, रिश्तेदार या दोस्त हस्तक्षेप नहीं कर सकते। अदालत ने ऐसे रिश्ते को “शादी के समान” (akin to marriage) बताते हुए परिवार की ओर से धमकियों का सामना कर रहे एक कपल को पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।

यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने 13 अगस्त को एक याचिका पर सुनाया। अदालत के सामने मौजूद याचिकाकर्ता 30 वर्ष से अधिक उम्र के वयस्क थे। दोनों ने बताया कि वे कुछ समय से साथ रह रहे हैं और भविष्य में एक-दूसरे से विवाह करने का इरादा भी रखते हैं।

परिवार की ओर से धमकियों का आरोप

याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि महिला के पिता और भाई उनके रिश्ते से सहमत नहीं थे और कथित तौर पर दोनों को हिंसा की धमकियां दी जा रही थीं। कपल ने स्थानीय पुलिस से संपर्क भी किया था, लेकिन उनकी शिकायत पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई।

इसके बाद उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया और अपनी जान तथा स्वतंत्रता की सुरक्षा की मांग की।

‘किसी को दखल देने का अधिकार नहीं’

अदालत ने कहा कि जब दो वयस्क अपनी इच्छा, सहमति और जिम्मेदारी के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने का निर्णय लेते हैं, तो किसी तीसरे व्यक्ति को उनके फैसले में बाधा डालने या हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।

अदालत ने विशेष रूप से स्पष्ट किया कि माता-पिता, रिश्तेदार या दोस्त भी उनकी पसंद में हस्तक्षेप नहीं कर सकते और न ही उनकी जान या स्वतंत्रता को खतरा पहुंचा सकते हैं।

क्या लिव-इन को विवाह की कानूनी मान्यता मिल गई ?

यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है। हाईकोर्ट ने इस मामले में लिव-इन रिश्ते को कानूनी विवाह घोषित नहीं किया है। अदालत ने कहा कि दोनों पक्ष कानूनी रूप से विवाहित नहीं हैं, लेकिन जब वे वयस्क और सहमति से साथ रह रहे हैं, तो उनके रिश्ते को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों के संदर्भ में विवाह के समान संरक्षण प्राप्त हो सकता है।

संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 का संदर्भ

अदालत की टिप्पणी का आधार व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार से जुड़ा संवैधानिक ढांचा है। अदालत ने कहा कि सामाजिक नैतिकता और पूर्वाग्रहों के आधार पर किसी वयस्क के मौलिक अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का भी उल्लेख किया जिनमें वयस्कों को अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने और अपने जीवन के महत्वपूर्ण निजी फैसले लेने के अधिकार को मान्यता दी गई है।

लिव-इन और ‘रिश्ते की प्रकृति में विवाह’ का अंतर

कानून में हर लिव-इन रिलेशनशिप को स्वतः विवाह नहीं माना जाता। सुप्रीम कोर्ट ने भी पहले स्पष्ट किया है कि “relationship in the nature of marriage” के लिए कुछ परिस्थितियों और तथ्यों का मौजूद होना जरूरी हो सकता है। ऐसे मामलों में साथ रहना, सामाजिक रूप से दंपती के रूप में प्रस्तुत होना और साझा घरेलू जीवन जैसे तथ्य महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट की मौजूदा टिप्पणी को इस रूप में समझना अधिक सही होगा कि सहमति से साथ रह रहे वयस्कों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सुरक्षा को केवल सामाजिक असहमति के आधार पर छीना नहीं जा सकता।

कपल को पुलिस सुरक्षा

हाईकोर्ट ने संबंधित पुलिस अधिकारियों को कपल को आवश्यक सहायता और सुरक्षा उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी कहा कि यदि दोनों किसी दूसरे पुलिस थाना क्षेत्र में रहने लगते हैं, तो संबंधित थाने को अपने नए पते की जानकारी देनी होगी, जिसके बाद वहां की पुलिस भी आवश्यक सुरक्षा उपलब्ध कराएगी।

निष्कर्ष: दिल्ली हाईकोर्ट की यह टिप्पणी वयस्कों की व्यक्तिगत पसंद, जीवन और स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकारों को रेखांकित करती है। हालांकि, इसे लिव-इन रिलेशनशिप को विवाह का पूर्ण कानूनी दर्जा मिलने के रूप में पढ़ना सही नहीं होगा।