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SIR और वोटर लिस्ट विवाद : चुनाव आयोग पर राहुल गांधी के तीखे आरोप, बोले- “वोट चोरी” देश के खिलाफ अपराध; आयोग बोला- सभी फैसले सर्वसम्मति से

चुनाव आयोग पर राहुल गांधी के तीखे आरोप

SIR और वोटर लिस्ट विवाद : राहुल गांधी के गंभीर आरोप, चुनाव आयोग ने खारिज किया औपचारिक मतभेद का दावा

नई दिल्ली, 23 सितंबर 2026: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर देश की राजनीति में एक बार फिर तीखी बहस शुरू हो गई है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने बुधवार को चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि मतदाताओं के अधिकारों से जुड़ी प्रक्रिया में अनियमितताएं हो रही हैं। दूसरी ओर, चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों ने आयोग के भीतर किसी औपचारिक मतभेद की बात से इनकार करते हुए कहा है कि SIR समेत आयोग के सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए हैं।

राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर साझा किए गए एक वीडियो और पोस्ट में चुनाव आयोग तथा उसके अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि जो कुछ किया जा रहा है, वह गलत है और देश के खिलाफ है। उन्होंने कथित “वोट चोरी” को भारतीय नागरिकों के खिलाफ अपराध और संविधान पर हमला बताया। अपने बयान में उन्होंने भाजपा, आरएसएस और चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए और कहा कि समय आने पर जिम्मेदारी तय की जाएगी। ये राहुल गांधी के राजनीतिक आरोप हैं; उपलब्ध रिपोर्टों में इन आरोपों को किसी न्यायिक निष्कर्ष के रूप में स्थापित नहीं किया गया है।

राहुल गांधी का यह बयान ऐसे समय आया है जब द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले लगभग 10 महीनों के दौरान चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट के अनुसार, इनमें मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने, नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6, तथा मतदाता डेटाबेस और उसके तकनीकी नियंत्रण से जुड़े मुद्दे शामिल थे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि चार आपत्तियां एक ही दिन दर्ज की गई थीं।

इन कथित आपत्तियों में Form-6 में SIR से जुड़ी घोषणा जोड़ने और मतदाता डेटाबेस के नियंत्रण को लेकर भी सवाल उठाए जाने की बात सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ प्रक्रियाओं को लेकर “अनधिकृत” या “गैरकानूनी” होने की चिंता व्यक्त की थी। वहीं, मतदाता डेटा और सॉफ्टवेयर के केंद्रीकरण को लेकर भी सवाल उठाए गए।

विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू चुनाव आयोग का आधिकारिक पक्ष है। आयोग से जुड़े सूत्रों ने कहा कि किसी विषय पर अलग-अलग राय, टिप्पणी या सुझाव देना संस्थागत कामकाज का हिस्सा है और इसे अपने-आप में औपचारिक असहमति नहीं माना जा सकता। आयोग का कहना है कि SIR सहित उसके सभी निर्णय तीनों चुनाव आयुक्तों—मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

इस विवाद के बीच पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत की टिप्पणियां भी सामने आई हैं। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, रावत ने Form-6 में बदलाव को लेकर सवाल उठाए और कहा कि वैधानिक फॉर्म में परिवर्तन के लिए संबंधित नियमों में संशोधन की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। उन्होंने मतदाता सूची के डेटाबेस और सॉफ्टवेयर नियंत्रण को लेकर भी केंद्रीकरण की चिंता व्यक्त की।

SIR स्वयं भी इस पूरे विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक यह प्रक्रिया जून 2025 में बिहार से शुरू हुई और बाद में 30 राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों तक पहुंची। रिपोर्ट में दावा किया गया कि मसौदा मतदाता सूचियों में 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए। इस बड़े पैमाने की प्रक्रिया ने मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और पात्र मतदाताओं की स्थिति को लेकर राजनीतिक तथा सार्वजनिक बहस को तेज किया है।

हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। किसी चुनाव आयुक्त द्वारा किसी प्रक्रिया पर आपत्ति या टिप्पणी दर्ज करना और चुनाव आयोग के अंतिम निर्णय को औपचारिक रूप से असहमति वाला निर्णय मानना अलग-अलग बातें हैं। उपलब्ध रिपोर्टों में एक तरफ आंतरिक आपत्तियों का दावा है, जबकि आयोग दूसरी तरफ कह रहा है कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से हुए। इसलिए इस पूरे मामले में सार्वजनिक रूप से उपलब्ध दस्तावेजों, आयोग के आदेशों और संबंधित कानूनी प्रक्रियाओं को अलग-अलग देखना आवश्यक होगा।

चुनाव आयोग भारत में चुनाव प्रक्रिया के संचालन के लिए संवैधानिक संस्था है। आयोग की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार वह लोकसभा, राज्यसभा, राज्य विधानसभाओं तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों का प्रशासन करता है। आयोग मतदाता पंजीकरण, मतदाता सूची, E-EPIC और SIR से संबंधित सेवाएं भी उपलब्ध कराता है।

फिलहाल इस पूरे विवाद में दो अलग-अलग पक्ष सामने हैं—विपक्ष चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और SIR से जुड़े निर्णयों पर सवाल उठा रहा है, जबकि चुनाव आयोग अपने फैसलों को संस्थागत और सर्वसम्मत बता रहा है। ऐसे में आगे की बहस इस बात पर केंद्रित रहने की संभावना है कि कथित आपत्तियों का वास्तविक स्वरूप क्या था, संबंधित दस्तावेजों में क्या दर्ज है और SIR के तहत मतदाता सूची में हुए बदलावों की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रही।

Hindi Window Fact Note: राहुल गांधी, कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं के आरोपों को इस रिपोर्ट में आरोप/राजनीतिक दावे के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इन्हें स्वतंत्र रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में नहीं लिखा गया है। चुनाव आयोग का पक्ष भी समान रूप से शामिल किया गया है।