हिंदी विंडो रिसर्च डेस्क | स्पेशल एक्सप्लेनर
अपडेट: 27 अगस्त 2026
भारत में समान नागरिक संहिता यानी Uniform Civil Code—UCC एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि UCC क्या है। बड़ा सवाल यह है कि भारत में इसे लागू करने की दिशा में अब तक कितनी प्रगति हुई है, किन राज्यों ने कानून बनाया है, किन राज्यों में प्रक्रिया चल रही है और उत्तराखंड के UCC में आखिर ऐसा क्या है जिसने इसे देश के लिए एक मॉडल और विवाद—दोनों बना दिया है ?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य से नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करने की अपेक्षा की गई है। यह प्रावधान संविधान के Directive Principles of State Policy का हिस्सा है।
UCC का मूल विचार यह है कि विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति, गोद लेने और कुछ अन्य व्यक्तिगत नागरिक मामलों में कानून व्यक्ति के धर्म के आधार पर अलग-अलग न होकर एक समान नागरिक ढांचे में संचालित हो।
लेकिन ध्यान रहे—UCC का मतलब धार्मिक पूजा-पद्धति या धार्मिक पहचान को खत्म करना नहीं है। उत्तराखंड के कानून में भी विवाह समारोहों के लिए अलग-अलग धार्मिक और customary ceremonies को मान्यता दी गई है; समानता मुख्यतः कानूनी अधिकारों और नागरिक प्रक्रियाओं में लाई गई है।
🏔️ उत्तराखंड: UCC लागू करने वाला पहला राज्य
उत्तराखंड विधानसभा ने UCC विधेयक 7 फरवरी 2024 को पारित किया।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 11 मार्च 2024 को इसे मंजूरी दी और कानून को 12 मार्च 2024 को अधिसूचित किया गया। उत्तराखंड सरकार ने इसे 27 जनवरी 2025 से लागू किया। इस तरह स्वतंत्र भारत में विधानसभा के जरिए UCC लागू करने वाला उत्तराखंड पहला राज्य बना।
उत्तराखंड UCC का ढांचा विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे विषयों को एक समान कानूनी व्यवस्था में लाता है।
सरकार ने इसके लिए ऑनलाइन पोर्टल भी बनाया है, जहाँ विवाह पंजीकरण, तलाक/नलिटी, लिव-इन पंजीकरण, उत्तराधिकार, वसीयत और अपील जैसी सेवाएँ उपलब्ध हैं।
और यह केवल कागज पर कानून नहीं रह गया है। सरकारी पोर्टल पर अगस्त 2026 तक लाखों विवाह पंजीकरण और अन्य आवेदन दर्ज दिखाई दे रहे हैं।
⚖️ उत्तराखंड UCC में क्या बदला ?
विवाह
पुरुष के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिला के लिए 18 वर्ष है।
बहुविवाह पर रोक लगाई गई है और विवाह के लिए यह महत्वपूर्ण शर्त रखी गई है कि किसी पक्ष का पहले से जीवित पति या पत्नी न हो।
विवाह पंजीकरण
UCC Rules के तहत 27 जनवरी 2025 के बाद हुए विवाह का memorandum सामान्यतः 60 दिनों के भीतर जमा करना है। देर होने पर अतिरिक्त शुल्क/दंड की व्यवस्था हो सकती है।
एक महत्वपूर्ण बात—विवाह का पंजीकरण न होने मात्र से विवाह स्वतः अवैध नहीं हो जाता। UCC Act में स्पष्ट किया गया है कि केवल non-registration के कारण विवाह invalid नहीं माना जाएगा।
समान उत्तराधिकार
उत्तराधिकार के क्षेत्र में महिला और पुरुष को समान कानूनी अधिकार देने की दिशा में एक समान ढांचा बनाया गया है।
बहुविवाह और विवाह-विच्छेद
UCC बहुविवाह को प्रतिबंधित करता है। इसके अलावा विवाह को समाप्त करने की प्रक्रिया को भी Code के अनुसार ही पूरा करना होगा।
किसी विवाह को Code के प्रावधानों के बाहर भंग करने पर तीन वर्ष तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
हलाला, इद्दत और तीन तलाक
उत्तराखंड UCC ने विवाह-विच्छेद से जुड़ी कुछ प्रथाओं को दंडनीय बनाया है। विशेष रूप से निकाह हलाला जैसी स्थिति में किसी महिला को पुनर्विवाह से पहले किसी शर्त का पालन करने के लिए बाध्य करने पर तीन वर्ष तक की सजा और ₹1 लाख तक जुर्माने का प्रावधान है।
2026 में उत्तराखंड में कथित निकाह हलाला से जुड़े एक मामले में पुलिस ने आरोप-पत्र भी दाखिल किया, जिससे UCC के दंडात्मक प्रावधान पहली बार व्यावहारिक कानूनी कार्रवाई के केंद्र में आए।
❤️ सबसे ज्यादा चर्चा: Live-in Relationship
उत्तराखंड UCC की सबसे चर्चित विशेषताओं में से एक है—लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य पंजीकरण।
राज्य के भीतर रहने वाले पात्र live-in partners को अपना relationship Registrar के समक्ष घोषित करना होता है। UCC पोर्टल पर इसके लिए अलग ऑनलाइन सेवा उपलब्ध है।
लेकिन यहां कानून का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है penalty।
अगर live-in relationship register नहीं कराया तो ?
UCC Act की धारा 387 के अनुसार—
- एक महीने से अधिक समय तक बिना declaration के live-in relationship में रहने पर तीन महीने तक की जेल, या
- ₹10,000 तक जुर्माना, या
- दोनों हो सकते हैं।
अगर Registrar के नोटिस के बाद भी declaration जमा नहीं किया जाता, तो—
- छह महीने तक की जेल, या
- ₹25,000 तक जुर्माना, या
- दोनों हो सकते हैं।
झूठी जानकारी दी तो?
Live-in declaration में जानबूझकर गलत जानकारी देने या महत्वपूर्ण तथ्य छिपाने पर—
तीन महीने तक की जेल या ₹25,000 तक जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
लेकिन कानून में एक अधिकार भी है
अगर किसी महिला को उसका live-in partner छोड़ देता है, तो वह सक्षम न्यायालय में maintenance की मांग कर सकती है।
👥 किन लोगों पर उत्तराखंड UCC लागू नहीं होता ?
यह भी बहुत महत्वपूर्ण तथ्य है।
उत्तराखंड UCC में Scheduled Tribes को इसके दायरे से बाहर रखा गया है। संविधान के Article 366(25) और Article 342 के संदर्भ में ST समुदाय तथा संविधान के Part XXI के तहत संरक्षित कुछ customary rights वाले समूहों को छूट दी गई है।
इसलिए यह कहना कि “उत्तराखंड में हर व्यक्ति पर बिल्कुल बिना किसी अपवाद के UCC लागू है”—अधूरा दावा होगा।
🗺️ अब देश के दूसरे राज्यों की स्थिति क्या है ?
यहां आपके मूल मसौदे में सबसे बड़ा अपडेट जरूरी है।
🟢 गोवा — अलग ऐतिहासिक मॉडल
गोवा में लंबे समय से एक समान civil-law framework मौजूद है, जो पुर्तगाली शासनकाल से चली आ रही Portuguese Civil Code व्यवस्था से जुड़ा है।
आज भी गोवा सरकार के दस्तावेजों में इसे marriage, divorce, adoption और inheritance जैसे मामलों में common civil framework के रूप में वर्णित किया जाता है।
इसलिए गोवा को उत्तराखंड जैसे 2024-25 में पारित UCC Act के समान समझना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा। गोवा का मॉडल ऐतिहासिक रूप से अलग है।
🟢 गुजरात — विधानसभा से UCC Bill पास
मार्च 2026 में गुजरात विधानसभा ने Gujarat Uniform Civil Code Bill, 2026 पारित किया।
इसमें विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और live-in relationships को एक समान civil framework में लाने का प्रस्ताव है और Scheduled Tribes को दायरे से बाहर रखा गया है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण पत्रकारिता सावधानी जरूरी है:
विधानसभा से Bill पास होना और कानून का प्रभावी रूप से लागू हो जाना एक ही बात नहीं है।
राष्ट्रपति भवन की 22 अगस्त 2026 तक की उपलब्ध state-bills सूची में गुजरात UCC की राष्ट्रपति मंजूरी दर्ज नहीं दिखाई देती। इसलिए हिंदी विंडो को इसे फिलहाल “विधानसभा से पारित विधेयक” के रूप में लिखना चाहिए, न कि बिना शर्त “गुजरात में UCC लागू हो गया”।
🟡 असम — Northeast में पहला UCC Bill
27 मई 2026 को असम विधानसभा ने Uniform Civil Code, Assam Bill, 2026 पारित किया।
इससे असम Northeast का पहला और देश का तीसरा ऐसा राज्य बना जिसने विधानसभा के जरिए UCC legislation को मंजूरी दी—उत्तराखंड और गुजरात के बाद।
असम के प्रस्तावित कानून में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और live-in relationships को शामिल किया गया है।
यहां भी Scheduled Tribes को UCC से बाहर रखा गया है।
हालांकि, विधानसभा से पारित होने के बाद इसे राज्यपाल और फिर राष्ट्रपति की संवैधानिक प्रक्रिया से गुजरना है। इसलिए अगस्त 2026 तक इसे पूरी तरह लागू UCC कहना सावधानीपूर्ण नहीं होगा।
🟡 मध्य प्रदेश — चौथा बड़ा UCC कदम
मध्य प्रदेश ने भी 2026 में तेजी दिखाई।
21 जुलाई 2026 को मध्य प्रदेश विधानसभा ने Madhya Pradesh Uniform Civil Code Bill, 2026 पारित किया।
इसमें विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और live-in relationships के लिए समान ढांचा प्रस्तावित है। Scheduled Tribes को इसके दायरे से बाहर रखा गया है।
लेकिन अगस्त 2026 तक यह भी लागू कानून नहीं है।
हालिया रिपोर्टों के अनुसार Bill राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जा चुका है और मंजूरी लंबित है।
🟡 राजस्थान — अब विधायी प्रक्रिया में
राजस्थान भी अब इस सूची में तेजी से आगे आया है।
13 अगस्त 2026 को राजस्थान कैबिनेट ने Rajasthan Uniform Civil Code Bill, 2026 के draft को मंजूरी दी। इसमें विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, maintenance और live-in relationships से जुड़े समान प्रावधान प्रस्तावित हैं। आदिवासी समुदायों के customs को draft के दायरे से बाहर रखने की बात कही गई है।
और अगस्त के विधानसभा सत्र में Bill पेश भी किया गया, लेकिन विपक्ष के हंगामे के कारण उस पर पर्याप्त चर्चा नहीं हो सकी।
यानी राजस्थान की स्थिति अभी “draft/bill stage” की है।
🟡 पश्चिम बंगाल — अभी तैयारी और समीक्षा के चरण में
पश्चिम बंगाल में भी UCC की प्रक्रिया शुरू की गई है।
राज्य सरकार ने पूर्व Supreme Court judge Justice Ranjana Prakash Desai की अध्यक्षता में नौ सदस्यीय समिति बनाई है, जो प्रस्तावित UCC framework की समीक्षा कर रही है।
जून 2026 में राज्य सरकार ने draft को आगे बढ़ाने और विधानसभा में पेश करने की योजना की घोषणा की थी। हालांकि अगस्त 2026 तक इसे लागू कानून कहना सही नहीं होगा।
📊 UCC की वर्तमान स्थिति — एक नजर में
| राज्य | अगस्त 2026 की स्थिति |
|---|---|
| उत्तराखंड | 🟢 UCC लागू — 27 जनवरी 2025 |
| गोवा | 🟢 ऐतिहासिक common civil-law व्यवस्था |
| गुजरात | 🟡 विधानसभा से Bill पास; प्रवर्तन की संवैधानिक प्रक्रिया अलग |
| असम | 🟡 विधानसभा से Bill पास; assent/commencement बाकी |
| मध्य प्रदेश | 🟡 विधानसभा से Bill पास; राष्ट्रपति की मंजूरी लंबित |
| राजस्थान | 🟡 Draft/Bill प्रक्रिया में |
| पश्चिम बंगाल | 🟡 Committee/draft प्रक्रिया में |
इसलिए “भारत में अभी चार राज्यों में UCC पूरी तरह लागू है” कहना सही नहीं होगा। अगस्त 2026 की स्थिति में उत्तराखंड ही वह स्पष्ट उदाहरण है जहाँ राज्य-स्तरीय UCC कानून लागू होकर operational framework में आ चुका है; गोवा की व्यवस्था ऐतिहासिक रूप से अलग है। गुजरात, असम और मध्य प्रदेश में विधायी मंजूरी हो चुकी है लेकिन अंतिम संवैधानिक/प्रवर्तन स्थिति अलग है।
🎯 बड़ा सवाल: UCC आखिर क्यों ?
UCC के समर्थकों का तर्क है कि—
एक देश में नागरिक अधिकारों से जुड़े समान मामलों के लिए अलग-अलग personal laws क्यों हों ?
उनके अनुसार समान कानून से gender equality, legal certainty और administrative simplicity बढ़ सकती है।
दूसरी ओर आलोचकों का सवाल है—
क्या अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक समुदायों की विविध परंपराओं को एक समान civil framework में लाना संवैधानिक संतुलन, धार्मिक स्वतंत्रता और privacy से जुड़े सवाल पैदा नहीं करेगा?
यही कारण है कि UCC सिर्फ कानूनी सुधार का विषय नहीं है। यह संविधान, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, धार्मिक अधिकार, लैंगिक न्याय और भारत की विविध सामाजिक संरचना से जुड़ी बहस भी है।
और यहीं से असली सवाल निकलता है—
क्या समान नागरिक संहिता भारत को कानूनी समानता की ओर ले जाएगी, या भारत जैसे बहुलतावादी समाज में समानता और विविधता के बीच नया संवैधानिक संतुलन तलाशना पड़ेगा?
‘हिंदी विंडो न्यूज़’ एक्सप्लेनर का निष्कर्ष यही है—UCC को समझने के लिए केवल “एक कानून” कहना पर्याप्त नहीं है। असली कहानी है—कानून क्या कहता है, किस पर लागू होता है, क्या दंड है, किन्हें छूट है और विधानसभा से पारित होने के बाद वह वास्तव में कब लागू होता है।
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