देवभूमि के पहाड़ों में रुद्राक्ष को सिर्फ आस्था नहीं, बल्कि ग्रामीण आय और रोजगार से जोड़ने की तैयारी; नेपाल के मॉडल का अध्ययन, कई जिलों को खेती के लिए संभावित क्षेत्र बताया गया
Uttarakhand Rudraksha Farming: पलायन रोकने के लिए रुद्राक्ष की खेती, 2047 तक 10 हजार हेक्टेयर का लक्ष्यउत्तराखंड सरकार रुद्राक्ष की
व्यावसायिक खेती को बढ़ावा देने की तैयारी में है। जानिए रुद्राक्ष खेती से पलायन रोकने की योजना, संभावित जिले, बाजार, चुनौतियां और 2047 का लक्ष्य।
पलायन रोकने के लिए रुद्राक्ष की खेती पर उत्तराखंड का फोकस, 2047 तक 10 हजार हेक्टेयर का लक्ष्य
देहरादून: उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों से लंबे समय से जारी पलायन की चुनौती के बीच राज्य सरकार अब रुद्राक्ष की खेती को ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ने की योजना पर काम कर रही है। सरकार का उद्देश्य रुद्राक्ष को केवल धार्मिक आस्था से जुड़े उत्पाद के रूप में नहीं, बल्कि किसानों के लिए संभावित आय के स्रोत और ग्रामीण रोजगार के साधन के रूप में विकसित करना है।
The Indian Express की 18 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड सरकार ने बागवानी विभाग को रुद्राक्ष की खेती के लिए औपचारिक नीति का मसौदा तैयार करने का निर्देश दिया है। 31 अगस्त को जारी निर्देश में खेती की तकनीक, खेत प्रबंधन, कटाई के बाद प्रसंस्करण, मार्केटिंग और मिट्टी की उपयुक्तता जैसे पहलुओं पर स्पष्ट प्रस्ताव तैयार करने को कहा गया।
नेपाल जाकर किया गया अध्ययन
इस पहल की पृष्ठभूमि में उत्तराखंड के टिहरी विधायक किशोर उपाध्याय के अनुरोध और नेपाल के रुद्राक्ष उत्पादन क्षेत्रों के अध्ययन को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मार्च 2026 में चार सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने नेपाल के भोजपुर जिले के भोटेधार और डिंगला क्षेत्रों का दौरा किया। प्रतिनिधिमंडल ने वहां रुद्राक्ष की खेती, मिट्टी, उत्पादन और बाजार व्यवस्था का अध्ययन किया तथा मिट्टी के नमूने भी लिए।
इस अध्ययन से तैयार तकनीकी रिपोर्ट और प्रस्तुति जुलाई में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने रखी गई थी। रिपोर्ट में उत्तराखंड के कुछ पर्वतीय जिलों में रुद्राक्ष की व्यावसायिक खेती की संभावनाओं का आकलन किया गया।
किन जिलों में मानी गई खेती की संभावना ?
तकनीकी अध्ययन में पौड़ी, टिहरी, रुद्रप्रयाग, चमोली, अल्मोड़ा और बागेश्वर को रुद्राक्ष रोपण के लिए उच्च संभावनाओं वाले जिले बताया गया है।
वहीं नैनीताल, चंपावत, पिथौरागढ़ और देहरादून के पर्वतीय क्षेत्रों को मध्यम संभावनाओं वाले क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार प्रस्तावित खेती वाले क्षेत्रों की ऊंचाई और जलवायु नेपाल के प्रमुख रुद्राक्ष उत्पादक क्षेत्रों से काफी हद तक तुलनीय पाई गई।
रुद्राक्ष को ही क्यों चुना जा रहा है ?
उत्तराखंड में खेती के सामने कई चुनौतियां हैं। इनमें जंगली जानवरों से फसलों को नुकसान, छोटे और बिखरे हुए खेत तथा सीमित कृषि आय प्रमुख समस्याओं में शामिल हैं।
रिपोर्ट में रुद्राक्ष की एक संभावित विशेषता यह बताई गई है कि इसे आम फसलों की तरह वन्यजीवों द्वारा नुकसान पहुंचाने की समस्या अपेक्षाकृत कम हो सकती है। इसके अलावा, पेड़ स्थापित होने के बाद देखभाल की जरूरत अपेक्षाकृत कम होने और घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग होने को भी इसकी संभावनाओं से जोड़ा गया है।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि रुद्राक्ष की खेती तत्काल किसानों की आय बढ़ाने लगेगी। रुद्राक्ष के पेड़ों को फल देना शुरू करने में लगभग छह से आठ वर्ष लग सकते हैं और करीब दस वर्ष में वे अधिकतम उत्पादन स्तर तक पहुंचते हैं। यही इस योजना की सबसे बड़ी व्यावहारिक चुनौतियों में से एक है।
चीन और अंतरराष्ट्रीय बाजार पर नजर
तकनीकी प्रस्तुति में रुद्राक्ष के अंतरराष्ट्रीय बाजार को भी योजना का महत्वपूर्ण आधार बताया गया है। रिपोर्ट में कस्टम डेटा का हवाला देते हुए चीन को रुद्राक्ष का बड़ा आयातक बताया गया है।
प्रस्तुति के अनुसार 2025 में दर्ज रुद्राक्ष निर्यात में चीन की हिस्सेदारी 63.7 प्रतिशत और अमेरिका की 19.3 प्रतिशत बताई गई। इसी प्रस्तुति में चीन के 2025 के रुद्राक्ष आयात का अनुमान करीब 100.8 मिलियन डॉलर लगाया गया, जबकि भारत का आयात बिल करीब 20.14 मिलियन डॉलर बताया गया।
भारत में खपत होने वाले रुद्राक्ष का बड़ा हिस्सा फिलहाल नेपाल और इंडोनेशिया से आयात होने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है। ऐसे में घरेलू उत्पादन बढ़ाने से आयात पर निर्भरता कम करने की संभावना पर भी जोर दिया जा रहा है।
किसानों की आय बढ़ाने की संभावनाएं
तकनीकी रिपोर्ट में एक परिपक्व रुद्राक्ष पेड़ से सालाना लगभग 1,000 से 2,000 बीज मिलने का अनुमान दिया गया है। सामान्य पांचमुखी रुद्राक्ष के लिए रिपोर्ट ने 10 से 20 रुपये प्रति बीज के थोक मूल्य को उदाहरण के तौर पर इस्तेमाल किया है।
इसी आधार पर रिपोर्ट ने 20 परिपक्व पेड़ों वाले परिवार के लिए सालाना 2 लाख से 8 लाख रुपये तक की सकल आय का एक अनुमान प्रस्तुत किया है। यह रिपोर्ट का अनुमान है, किसानों की सुनिश्चित आय नहीं। वास्तविक आय उत्पादन, गुणवत्ता, बाजार मूल्य, पेड़ों की उम्र और बिक्री व्यवस्था पर निर्भर करेगी।
शुरुआती वर्षों की चुनौती का समाधान कैसे ?
रुद्राक्ष में फल आने में कई साल लगने के कारण शुरुआती अवधि किसानों के लिए आर्थिक चुनौती बन सकती है। रिपोर्ट में प्रस्तावित योजना के तहत शुरुआती तीन वर्षों में गड्ढे खोदने, पौधरोपण और बाड़ लगाने जैसे कामों के लिए ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के माध्यम से मजदूरी उपलब्ध कराने का सुझाव दिया गया है।
बागवानी विभाग द्वारा पौध उपलब्ध कराने की भी योजना प्रस्तावित की गई है। आगे चलकर महिला स्वयं सहायता समूहों को रुद्राक्ष की सफाई, ग्रेडिंग और तेल लगाने जैसे कामों का प्रशिक्षण देने तथा युवाओं को माला बनाने, सिल्वर कैपिंग और पैकेजिंग जैसी वैल्यू-एडेड गतिविधियों से जोड़ने का प्रस्ताव है।
नकली या अलग प्रजाति की चुनौती
रुद्राक्ष की खेती में सिर्फ बाजार और उत्पादन ही चुनौती नहीं हैं। रिपोर्ट में भद्राक्ष नाम की अलग प्रजाति को लेकर भी सावधानी की जरूरत बताई गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार शुरुआती अवस्था में भद्राक्ष और रुद्राक्ष के पौधे एक जैसे दिखाई दे सकते हैं। अंतर बाद की अवस्था में, फल आने के समय स्पष्ट हो सकता है। इसलिए प्रमाणित पौध, वैज्ञानिक मार्गदर्शन और गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री इस योजना की सफलता के लिए महत्वपूर्ण होगी।
2047 तक बड़ा लक्ष्य
तकनीकी रिपोर्ट में 2047 तक उत्तराखंड में 10,000 हेक्टेयर क्षेत्र में रुद्राक्ष की खेती, करीब 1 करोड़ पेड़ लगाने, 50,000 से 70,000 किसानों को जोड़ने और अधिकतम 1.5 लाख ग्रामीण रोजगार सृजित करने का लक्ष्य प्रस्तावित किया गया है।
हालांकि, ये लक्ष्य वर्तमान उपलब्धियां नहीं बल्कि प्रस्तावित दीर्घकालिक योजना के लक्ष्य हैं। इनके वास्तविक परिणाम इस बात पर निर्भर करेंगे कि नीति कब लागू होती है, किसानों को किस स्तर की तकनीकी और वित्तीय सहायता मिलती है तथा बाजार और प्रसंस्करण का ढांचा कितना मजबूत बनाया जाता है।
पलायन रोकने की कोशिश में कितना कारगर होगा मॉडल ?
उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में खेती से कम आय, वन्यजीवों से फसल नुकसान और छोटे-बिखरे खेतों को पलायन की वजहों में गिना जाता रहा है। ऐसे में रुद्राक्ष जैसी दीर्घकालिक फसल एक वैकल्पिक आर्थिक गतिविधि बन सकती है।
लेकिन इसका परिणाम तुरंत नहीं मिलेगा। पेड़ों को उत्पादन में आने में वर्षों का समय लगना, प्रमाणित पौध सामग्री की जरूरत, बाजार मूल्य में उतार-चढ़ाव और किसानों को शुरुआती वर्षों में आय का विकल्प उपलब्ध कराना इस मॉडल की सफलता के लिए महत्वपूर्ण कारक होंगे।
इसलिए रुद्राक्ष की खेती को उत्तराखंड के पलायन की एकमात्र समस्या का समाधान मानने के बजाय ग्रामीण आय बढ़ाने की एक संभावित रणनीति के रूप में देखना अधिक उपयुक्त होगा।












