खालिस्तान का मुद्दा भारत में नहीं :
भारतीय उच्चायुक्त ने शांतिपूर्ण राजनीतिक अभिव्यक्ति और हिंसक चरमपंथ के बीच अंतर करने की अपील की; निज्जर हत्याकांड को लेकर भारत-कनाडा के पुराने विवाद और सुधरते द्विपक्षीय संबंध फिर चर्चा में।
नई दिल्ली/ओटावा, 11 अक्टूबर 2026।
खालिस्तान का मुद्दा भारत :
भारत के कनाडा में उच्चायुक्त दिनेश के. पटनायक ने खालिस्तान से जुड़े विवाद पर भारत का पक्ष रखते हुए कहा है कि इस मुद्दे से जुड़ी चरमपंथी गतिविधियों की चुनौती कनाडा की धरती पर है। उन्होंने कनाडा से अपील की कि शांतिपूर्ण राजनीतिक विचार व्यक्त करने के अधिकार और हिंसा, जबरन वसूली तथा संगठित अपराध जैसी गतिविधियों को अलग-अलग नजरिए से देखा जाना चाहिए।
कनाडा के सार्वजनिक प्रसारक सीपीएसी को दिए एक साक्षात्कार में पटनायक ने कहा कि किसी अलग राष्ट्र की शांतिपूर्ण वकालत करने वाले लोगों को हिंसक गतिविधियों में शामिल तत्वों के बराबर नहीं माना जाना चाहिए। उनके मुताबिक, भारत को शांतिपूर्ण राजनीतिक अभिव्यक्ति से आपत्ति नहीं है, लेकिन हिंसा, हत्याओं और आतंकवाद का महिमामंडन स्वीकार्य नहीं है।
उच्चायुक्त का यह बयान ऐसे समय आया है, जब भारत और कनाडा वर्ष 2023 में पैदा हुए गंभीर कूटनीतिक तनाव के बाद द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इस विवाद का एक प्रमुख कारण कनाडा में खालिस्तान समर्थक अलगाववादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या और उसमें कथित भारतीय संबंधों को लेकर लगाए गए आरोप रहे हैं। भारत ने इन आरोपों को खारिज किया है।
शांतिपूर्ण विचार और चरमपंथ के बीच अंतर पर जोर
पटनायक ने अपने साक्षात्कार में कहा कि कनाडा में रहने वाले सिखों, भारतीयों और अन्य नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से अपने राजनीतिक विचार रखने का अधिकार है। उन्होंने तर्क दिया कि किसी समुदाय के सभी सदस्यों को कुछ लोगों की गतिविधियों के आधार पर परिभाषित करना उचित नहीं है।
इस संदर्भ में उन्होंने टोरंटो में पंजाबी गायक दिलजीत दोसांझ के एक संगीत कार्यक्रम का उदाहरण दिया। पटनायक के अनुसार, कार्यक्रम में करीब 45,000 लोग मौजूद थे, जबकि खालिस्तान समर्थक चरमपंथी बताए गए लगभग 15 लोगों के एक समूह ने बाहर विरोध प्रदर्शन किया और आयोजन स्थल में प्रवेश करने की कोशिश की।
उच्चायुक्त ने इस उदाहरण के जरिए कहा कि एक छोटे समूह की गतिविधियों को पूरे समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं माना जाना चाहिए। हालांकि, कार्यक्रम में लोगों की संख्या और प्रदर्शनकारियों की भूमिका संबंधी ये विवरण उनके साक्षात्कार में प्रस्तुत किए गए दावे हैं; इन्हें स्वतंत्र रूप से पुष्ट आंकड़ों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
संगठित अपराध और सुरक्षा संबंधी चिंताएं
भारतीय उच्चायुक्त ने खालिस्तान से जुड़े विवाद को केवल राजनीतिक विचारधारा का प्रश्न मानने के बजाय हिंसा और संगठित अपराध से संबंधित चिंताओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने नशीले पदार्थों की तस्करी, हथियारों की तस्करी, मानव तस्करी और जबरन वसूली जैसी गतिविधियों का जिक्र करते हुए कहा कि इनकी जांच राजनीतिक समर्थन या शांतिपूर्ण विरोध से अलग आधार पर होनी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत और कनाडा के अधिकारियों के बीच संगठित आपराधिक नेटवर्क से निपटने के लिए सहयोग बढ़ा है। हालांकि, इस बयान के आधार पर किसी विशिष्ट अभियान की सफलता, गिरफ्तारियों की संख्या या किसी व्यक्ति की आपराधिक संलिप्तता के बारे में अलग से पुष्टि के बिना निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी आंदोलन के समर्थक, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी और हिंसक अपराधों में शामिल व्यक्ति एक ही श्रेणी में नहीं रखे जा सकते। किसी व्यक्ति या संगठन के विरुद्ध आपराधिक आरोपों का मूल्यांकन उपलब्ध साक्ष्यों, जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए।
निज्जर हत्याकांड से बिगड़े थे संबंध
भारत और कनाडा के संबंधों में तनाव वर्ष 2023 में बढ़ा, जब तत्कालीन कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने कनाडाई नागरिक और खालिस्तान समर्थक अलगाववादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारतीय सरकारी एजेंटों की संभावित भूमिका से जुड़े आरोप सार्वजनिक किए। निज्जर की जून 2023 में ब्रिटिश कोलंबिया में हत्या कर दी गई थी।
भारत ने इन आरोपों को खारिज किया और मामले में भारत से जुड़े किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोपों के समर्थन में साक्ष्य की मांग की। पटनायक ने भी अपने हालिया साक्षात्कार में कहा कि भारत ने अपनी संलिप्तता से इनकार किया है और यदि भारतीय पक्ष से जुड़े किसी व्यक्ति के खिलाफ प्रमाण उपलब्ध हों, तो उन्हें साझा किया जाना चाहिए।
इस मामले में आरोप, जांच और न्यायिक निष्कर्ष अलग-अलग चरण हैं। किसी आरोप को केवल उसके लगाए जाने के आधार पर सिद्ध अपराध नहीं माना जा सकता। इसी तरह, भारत के इनकार को भी मामले के सभी पहलुओं पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। संबंधित अदालतों की कार्यवाही और आधिकारिक जांच से प्राप्त सत्यापित जानकारी ही किसी निष्कर्ष का आधार होनी चाहिए।
कनाडा के सुरक्षा आकलन और भारत का पक्ष
इस विवाद को समझने के लिए कनाडा के आधिकारिक सुरक्षा आकलनों को भी ध्यान में रखना जरूरी है। कनाडाई सुरक्षा खुफिया सेवा की 2024 की सार्वजनिक रिपोर्ट में भारत को उन देशों में शामिल किया गया है, जिन पर कनाडा में विदेशी हस्तक्षेप और जासूसी गतिविधियों से संबंधित चिंताएं जताई गईं। रिपोर्ट में कनाडा की सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की गई है।
दूसरी ओर, भारत ने विदेशी हस्तक्षेप संबंधी आरोपों पर आपत्ति जताई है और कनाडा में मौजूद खालिस्तान समर्थक चरमपंथी तत्वों से जुड़ी सुरक्षा चिंताओं को भी उठाया है। इसलिए दोनों देशों के आधिकारिक दृष्टिकोणों को अलग-अलग समझना जरूरी है। किसी एक सरकार का आकलन अपने आप में दूसरे पक्ष के खिलाफ प्रत्येक आरोप का न्यायिक प्रमाण नहीं बन जाता।
कनाडा की सुरक्षा एजेंसियां भी शांतिपूर्ण राजनीतिक गतिविधियों और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए वास्तविक खतरा पैदा करने वाली गतिविधियों के बीच अंतर करती हैं। ऐसे में विवाद का समाधान राजनीतिक बयानबाजी के बजाय विश्वसनीय साक्ष्यों, कानून के निष्पक्ष प्रवर्तन और दोनों देशों के बीच प्रभावी संवाद से जुड़ा है।
संबंध सुधारने की कोशिश और व्यापार समझौते पर नजर
भारत और कनाडा ने हाल के महीनों में राजनयिक संपर्क बढ़ाए हैं। 2 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में दोनों देशों के अधिकारियों के बीच विदेश कार्यालय स्तर की वार्ता हुई। इस दौरान ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, शिक्षा, सुरक्षा, रक्षा सहयोग, संस्कृति और लोगों के बीच संपर्क जैसे विषयों पर चर्चा हुई।
कनाडा के विदेश विभाग के अनुसार, दोनों पक्ष व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते की वार्ता को वर्ष के अंत से पहले पूरा करने के साझा लक्ष्य पर भी सहमत हुए। इस समझौते से व्यापार और आर्थिक सहयोग बढ़ाने की संभावनाएं जुड़ी हैं।
पटनायक ने भी कहा कि दोनों देशों के बीच संवाद और राजनीतिक संपर्क में सुधार हुआ है, हालांकि आपसी विश्वास बहाल करना एक कठिन प्रक्रिया है। भारत और कनाडा के बीच व्यापार, शिक्षा, प्रवासन और पारिवारिक संबंधों का व्यापक दायरा होने के कारण द्विपक्षीय संबंधों की स्थिरता दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण है।
आगे क्या ?
खालिस्तान से जुड़ा विवाद भारत-कनाडा संबंधों की सबसे संवेदनशील चुनौतियों में बना हुआ है। इस मुद्दे पर स्थायी प्रगति के लिए शांतिपूर्ण राजनीतिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, हिंसक गतिविधियों के विरुद्ध कार्रवाई, आपराधिक आरोपों की निष्पक्ष जांच और राजनयिक संवाद के बीच संतुलन आवश्यक है।
भारतीय उच्चायुक्त का ताजा बयान कनाडा में मौजूद अलगाववादी चरमपंथी तत्वों को लेकर भारत की चिंताओं को सामने रखता है। दूसरी ओर, कनाडा के सुरक्षा आकलनों और निज्जर हत्याकांड से जुड़े आरोपों को भी उनकी वास्तविक कानूनी और तथ्यात्मक स्थिति के संदर्भ में समझना होगा।
अंततः, दोनों देशों के संबंध केवल एक विवाद से निर्धारित नहीं होते। व्यापार, शिक्षा, सुरक्षा और लोगों के बीच संपर्क में सहयोग बढ़ाने के लिए जरूरी होगा कि दोनों सरकारें राजनीतिक मतभेदों को साक्ष्य-आधारित जांच, पारदर्शिता और कूटनीतिक बातचीत के जरिए सुलझाने का प्रयास जारी रखें।
निष्कर्ष: खालिस्तान विवाद पर भारत का रुख स्पष्ट है कि शांतिपूर्ण राजनीतिक विचारों और हिंसक चरमपंथ को एक जैसा नहीं माना जाना चाहिए। भारत-कनाडा संबंधों का भविष्य इस बात पर भी निर्भर करेगा कि दोनों देश सुरक्षा संबंधी चिंताओं, कानूनी प्रक्रियाओं और आपसी विश्वास की बहाली को कितनी प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाते हैं।












